Tuesday, 14 June 2016

बॉलीवुड की बिसात पर विद्या की उल्टी चाल!

विद्या बालन, अमिताभ बच्चन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी स्टाररइ हालिया फिल्म 'तीन'को समीक्षकों से सराहना तो मिल रही है लेकिन कमाई के मामले में यह औंधे मुंह गिरती नजर आ रही है। हालांकि इस फिल्म में विद्या का कैमियो रोल है बावजूद इसके जानकारों का मानना है कि इसकी असफलता उनके कैरियर को प्रभावित कर सकती है।
 


कुछ वर्ष पहले अभिनेत्री विद्या बालन ‘द डर्टी पिक्चर’, ‘कहानी’ जैसी फिल्मों के साथ अपने कैरियर के शीर्ष पर थीं और फिर उसके बाद एक ऐसा दौर आया जब उनकी फिल्में कुछ खास कमाल नहीं कर पाईं। विद्या को अपनी हालिया फिल्म 'तीन'से बहुत उम्मीद थी लेकिन कमाई में यह फिल्म भी फिसड्डी साबित हो रही है। विद्या के अलावा अमिताभ बच्चन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे बड़े सितारों के होने के बावजूद इस फिल्म ने पहले दिन 2.70 करोड़ रुपये की कमाई की है। जबकि दूसरे दिन की बात करें तो 3.90 करोड़ कमा सकी है। वीकेंड खत्म होने के बावजूद फिल्म दस करोड़ के आंकड़े को भी पार करने में नाकाम रही।  मतलब साफ है कि इस असफलता ने विद्या की राह को एक बार फिर से कठिन कर दी है। इससे पहले विद्या की रोमांटिक फिल्म ‘हमारी अधूरी कहानी’ की ओपनिंग भी बेहद खराब रही थी। पहले दिन फिल्म ने सिर्फ पांच करोड़ का बिजनेस किया था। उस फिल्म को तो आलोचकों ने भी कुछ अच्छा नहीं कहा था। दरअसल, हर फिल्म के साथ विद्या कुछ नया तो करने की कोशिश कर रही हैं लेकिन बॉक्स ऑफिस की बिसात पर हर चाल सही बैठे ऐसा कहां हो पाता है।  ‘घनचक्कर’ में पंजाबी बीवी का रोल, ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ में भी पत्नी का रोल और बॉबी जासूस में जबरदस्त गेटअप के साथ दर्शकों को चौंका चुकी विद्या की ये फिल्में आखिरकार फ्लॉप रही थीं। फिर विद्या ने ‘हमारी अधूरी कहानी’ के जरिए लव स्टोरी पर सीधे-सीधे दांव खेला था। प्रमोशन के दौरान विद्या ने फिल्म की तुलना ‘सिलसिला’ और ‘आंधी’ जैसी ‘मैचयोर लवस्टोरी’ से की थी लेकिन दर्शकों की उम्मीद पर न तो विद्या की अदाकारी खरी उतर पाई और न ही कहानी। ऐस ही कुछ हाल फिल्म 'तीन' के साथ भी हो रहा है। इस फिल्म में विद्या बालन ने इंस्पेक्टर सरिता का किरदार निभाया है। जानकारों की मानें तो विद्या ने जब-जब कमर्शियल फिल्मों में हाथ आज़माना चाहा उन्हें असफलता मिली। किस्मत कनेक्शन, हे बेबी, थैंक्यू, सलाम-ए-इश्क, एकलव्य जैसी फिल्मों में उनकी सतही भूमिका को लेकर सवाल उठे थे हालांकि उनके अभिनय की तारीफ पहली फिल्म परिणिता से ही शुरू हो गई थी। परिणिता के बाद गुरु, पा, भूल भुल्लैया, इश्किया से लेकर द डर्टी पिक्चर..कहा जाने लगा था कि विद्या महिलाप्रधान फिल्में ही करती हैं और इन्हीं में उनकी अदाकारी निखरकर आती है लेकिन एक के बाद एक फ्लॉप ने सारे समीकरण बिगाड़ कर रख दिए हैं। विद्या का मुकाबला न सिर्फ अपने समकक्ष हीरोइनों से है बल्कि खुद से भी है। विद्या को अब फिल्म ‘कहानी’ के सीक्वल से उम्मीद है । इसके अलावा उनकी पहली मराठी फिल्म एक अलबेला भी इसी महीने रिलीज होने वाली है। फिल्म एक अलबेला में विद्या बालन ऐक्ट्रेस गीता बाली का किरदार निभा रही हैं। विद्या का कहना है कि इस फिल्म में गीता बाली के रूप में गेस्ट अपियरेंस के तौर पर नजर आने का कारण था कि मुझे वह बहुत ही चार्मिंग लगती हैं।'बहरहाल, देखना अहम होगा कि विद्या को सफलता कब हाथ लगती है।

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पूरे किए 11 साल
विद्या बालन को बॉलीवुड में लंबे स्ट्रगल के बाद साल 2005 में रिलीज हुई फिल्म परिणीता से पहचान मिली थी। अब जबकि विद्या को फिल्म इंडस्ट्री में 11 साल पूरे हो चुके हैं। विद्या का कहना है कि उन्हें बॉलीवुड से उम्मीद से भी ज्यादा मिला है और उन्हें जितने भी अवसर मिले हैं, उसके लिए वह हमेशा शुक्रगुजार रहेंगी।  विद्या बताती हैं कि 'एक वक्त था, जब मैं चाहती थी कि मेरी एक फिल्म रिलीज हो जाए। अब मुझे भरोसा नहीं हो रहा है कि मैंने इंडस्ट्री में 11 साल बिता दिए।



Sunday, 12 June 2016

अनुराग, अब लुढ़कता बिहार भी बना लो..


प्रिय अनुराग कश्यप,
सबसे पहले तो आप  पिछले कुछ दिनों से फिल्म उड़ता पंजाब के लिए जो संघर्ष कर रहे हैं उसकी मैं सराहना करता हूं लेकिन एक बात मैं भी कहना चाहता हूं कि आप भी बेवजह की गालियां ठूसते रहते हो। अब गैंग्स ऑफ बासेपुर को ही ले लो उसमें तो आपने गालियों की नई - नई प्रजाति का निजात किया है। बहरहाल, मैं आपको एक सलाह देना चाहता था। सलाह यह है कि आप अब फिल्म 'लुढ़कता बिहार' बनाइए। यकीं मानिए यह बंगाली बाबा के चूरन से भी ज्यादा लाभकारी होगा । आपको तो पता भी होगा कि आज - कल बिहार में एक गोली से ही इंसान लुढ़क जाता है। लुढ़काने वाला आपको कभी भी लुढ़का सकता है । इसके लिए कोई दिशा-निदेश नहीं है। बस बंदूक होनी जरूरी है और अगर नहीं भी है तो आप राजद के किसी छुटभैये नेता को जानते हैं तो समझो यही काफी है।  अच्छा, खास बात यह है कि लुढ़काने वाले सीना ताने घूम रहे हैं यानी आपको अभिनेता ढंढूने की भी दिक्कत नहीं होगी। अब बात एक और लुढ़कन की कर लेते हैं तो आज कल अपने यहां के टॉपर्स भी खूब लुढ़क रहे हैं। अगर आपकी फिल्म उड़ता पंजाब बिहार विद्यालय परीक्षा समिति देखती तो यकीं मानिए वहां के होनहार लोग फिल्म को टॉपर बना देते। वैसे आपकी छवि सोशल मीडिया में बेवड़ा की बना दी गई है ऐसे में हमारे राज्य के बेवड़े समाज के लोग भी आपसे एक फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं। दरअसल, जब से शराबबंदी हुई है तब से बेवड़े लोग बंगाल, नेपाल, यूपी से शराब लाने की जद्दोजहद में लगे हैं और लाते भी हैं लेकिन खास बात यह है कि वह बोतल लाकर लुढ़कते अपने बिहार में ही हैं। लुढ़कने के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आपको एक और कहानी की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं । सुना है कि आजकल राज्य की विकास गति भी लुढ़क रही है लेकिन हां इसकी जांच जरूर कर लीजिएगा क्योंकि मेरे पास इसके पुख्ता सबूत नहीं हैं।

यह जानते हुए भी कि मेरी बात आप तक नहीँ पहुंचेगी, उम्मीद करता हूं कि मेरी सलाह पर ध्यान देंगे।

Sunday, 5 June 2016

एक योद्घा जो शांतिदूत था

यह फोटो शूट तब की है जब अली पर नस्लीय हमले हो रहे थे।
 जिस जमाने में अश्वेतों को खुल कर बोलने तक की इजाजत नहीं थी, उस जमाने में महान मोहम्मद अली का मुक्का उठा था और यह यूं ही थम जाने को नहीं उठा था बल्कि सदी का मुक्का बन जाने को उठा था।  अली सिर्फ एक मुक्केबाज ही नहीं थे, उनमें कवि, दार्शनिक, समाजसेवी, लेखक स‌हित तमाम बड़े गुण मौजूद थे।    


मोहम्मद अली का असली नाम क्या था, शायद बताने की जरूरत नहीं और न ही किसी को जानने में ज्यादा दिलचस्पी हो। दिलचस्पी तो उस शख्सियत को जानने में होनी चाहिए जो बैनर पोस्टर रंगने वाले का बेटा था और अपनी साइकिल चोरी हो जाने से दुनिया का सबसे बड़ा मुक्केबाज बन बैठा। दिलचस्पी तो इस बात को जानने में होनी चाहिए कि घूंसे के जोर पर नाम कमाने वाला ‌वह शख्स जीवन भर शांति का प्रतीक 'कबूतर' क्यों पालता रहा ? जब इस 'कबूतर' पालने के पीछे की वजह पूछा गया तो अली ने बताया था कि इस पक्षी से शांत रहने की प्रेरणा मिलती है। मोहम्मद अली वह शख्स हैं जिन्होंने खुद को महान भी बताया तो सनकी भी। जब एक बार पत्रकार ने अली से पूछा कि वह खुद को कैसे याद किया जाना पसंद करेंगे। उन्होंने कहा था कि एक ऐसे इंसान की तरह जिसने कभी अपने लोगों का सौदा नहीं किया लेकिन अगर वह बहुत ज्यादा है तो आप कह सकते हैं कि मैं महज एक अच्छा बॉक्सर था और तब मैं इस बात का भी बुरा नहीं मानूंगा कि आपने मुझे सुंदर नहीं कहा।  साठ के दशक में जो अश्वेतों के लिए मार्टिन लूथर किंग ने सपना देखा, उस सपने को सबसे पहले मोहम्मद अली ने ही सच किया। कहते हैं कि अली 1960 में रोम ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर जब अमेरिका में एक रेस्टोरेंट में डिनर करने गए तो वेटर नेएक अश्वेत को सर्व करने से मना कर दिया। इस अपमान से आहत अली ने बाहर आकर गुस्से में अपना गोल्ड मेडल यह कहते हुए फेंक दिया कि जिस देश में इस कदर रंगभेद हो, वहां का मेडल मुझे नहीं पहनना है। अली के इस कदम ने अमेरिका में अश्वेतों के खिलाफ हो रहे अत्याचार को एक ही झटके में सार्वजनिक मंच पर ला दिया। पूरी दुनिया में अमेरिका की थू-थू हुई तो अली की वाहवाही। अली ने अश्वेतों के लिए दक्षिण अफ्रीका के गांधी नेल्सन मंडेला से भी मदद ली।  जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी अली ने सामाजिक द्वेष के खिलाफ आवाज उठाई। कुछ माह पहले ही उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप के मुसलमानों पर घृणित बयान की आलोचना की थी।  ट्रंप का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि मुसलमानों को उन लोगों के खिलाफ खड़े होना पड़ेगा जो इस्लाम का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए करते हैं।'  ट्रंप के बयान की ओर इशारा करते हुए कहा था कि ऐसा करके ट्रंप ने कइयों को इस्लाम के बारे में जानने से रोक दिया है। उन्होंने इस्लामिक स्टेट के जिहादियों की हिंसक गतिविधियों की भी कड़ी आलोचना की। वह कहते थे कि वह मुकाबला जीतेंगे और जीत भी जाते। वह यहां तक कह देते कि किस राउंड में जीतेंगे और उस राउंड तक उनकी जीत भी हो जाती लेकिन दुनिया उन्हें समझ चुकी थी। वह जान चुकी थी कि छह फीट तीन इंच का यह नौजवान यूं ही दावे नहीं करता।  दस्ताने टांगने के बाद जब भी ये हाथ उठते थे या तो दुआ के लिए या फिर समाज के लिए।  गरीब देशों की बात हो या उनके अपने लूजियाना प्रांत की, गरीबों की मदद करने से वह जरा भी नहीं हिचकिचाते थे।  जिस वक्त वह अपने कैरियर के सर्वश्रेष्ठ दौर में थे, उनकी बॉक्सिंग पर प्रतिबंध लगा दिया गया क्योंकि वह फौज में  शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे। अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ लड़ाई खोल दी थी, जिसका वह खुल कर विरोध कर रहे थे। 1971 में उनकी अपील पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ये बैन हटाया। उनके मुक्के पर ताला जड़ दिया गया लेकिन भला हिम्मत को कौन रोक सकता था।  वह रिंग में लौटे, तो जबरदस्त विस्फोट हुआ। साठ के दशक का मोहम्मद अली सत्तर के दशक में भी चैंपियन बन बैठेद। इस दौरान 1971 में सदी की सबसे बड़ी मुक्केबाजी जंग भी हुई, जब वह जो फ्रेजियर से भिड़े। उस बार हार गए लेकिन दूसरी बार में जीत हासिल की। कई संस्थाओं ने 1999 में मोहम्मद अली को पिछली सदी का महानतम खिलाड़ी घोषित किया। अमेरिका ने झुक कर उन्हें सलाम किया। अली की जिंदादिली का अंदाजा इस बात से लगता है कि इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने 1990 में कुवैत पर हमला करके 2000 से ज्यादा विदेशियों को बंधक बना लिया था। बंधकों को छुड़ाने के लिए मोहम्मद अली सद्दाम से बातचीत करने बगदाद पहुंचे। अली के साथ 50 मिनट की बातचीत के बाद सद्दाम ने 15 अमेरिकी बंधकों को छोड़ दिया था। वह अगली पीढ़ी के  मैजिक जॉनसन, कार्ल लुइस और टाइगर वुड्स के लिए मसीहा साबित हुए। अली ने खेल की दुनिया में अश्वेतों के लिए जो दरवाजे खोले, उसे भला कौन भूल सकता है। खेल की दुनिया उनका स्वागत करती है।

फाइट से पहले नहीं करते थे सेक्‍स
सदी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के खिताब से नवाजे जा चुके मुक्केबाज मोहम्मद अली के विषय में कहा जाता था कि वह रिंग में अपनी किसी भी बड़ी फाइट के पहले सेक्स करना बंद कर देते थे। यह समय कुछ लोगों के हिसाब से दो महीनों का होता था जबकि कुछ लोग मानते हैं कि बॉक्सर अली सिर्फ छ: हफ्तों के लिए ही खुद पर नियंत्रण रखते थे। मोहम्मद अली ने अपनी सेक्स अपील के लिए भी खास प्रसि‌‌िद्ध पाई और यहीं से इस विचार ने बहस को जन्म दिया कि क्या सेक्स और खिलाड़ियों के प्रदर्शन में कोई संबंध है?



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अली के अनमोल वचन
मोहम्मद अली एक महान मुक्केबाज होने के साथ-साथ एक अच्‍छे समाजसेवी भी थे। प्रस्‍तुत है ऐसे महान व्‍यक्ति द्वारा कहे गए कुछ अनमोल वचन –

दोस्ती कुछ ऐसा नहीं है जो आप स्कूल में सीखते है। लेकिन यदि आपने दोस्ती का मतलब नहीं सीखा तो दरअसल आपने कुछ नहीं सीखा।
मैं ट्रैनिंग के हर एक मिनट से नफरत करता था, लेकिन मैंने कहा , हार मत मानो। अभी सह लो और अपनी बाकी की जिंदगी एक चैंपियन की तरह जियो।
मुझे पता है मैं कहां जा रहा हूं और मुझे सच पता है, और मुझे वह नहीं होना है जो तुम चाहते हो। मैं वह होने के लिए स्वतंत्र हूं जो मैं चाहता हूं।
नदियां , तालाब , झीलें और धाराएं – इनके अलग-अलग नाम हैं, लेकिन इन सबमे पानी होता है ठीक वैसे ही जैसे धर्म होते हैं- उन सभी में सत्य होता है ।
मैं सबसे महान हूं, मैंने ये तब कहा जब मुझे पता भी नहीं था कि मैं हूं।
वह जो जोखिम उठाने का साहस नहीं रखता अपने जीवन में कुछ हासिल नहीं कर सकता।
जो आदमी पचास की उम्र में दुनिया को उसी तरह देखता है जैसा कि वह बीस में देखा करता था , ने अपने जीवन के तीस साल बर्बाद कर दिए हैं।
दृढ वचनो की पुनरावृत्ति विश्वास पैदा करती है। और एक बार जब वह विश्वास गहरी आस्था में बदल जाता है तो चीजें होने लगती हैं।
मैं इस्लाम धर्म में यकीन रखता हूं। मैं अल्लाह और शांति में यकीन रखता हूं।
 तितली की तरह उड़ो , मधुमक्खी की तरह काटो।
जिस व्यक्ति के पास कल्पना नहीं है उसके पास पंख नहीं हैं।
जो मुझे चलते रहने देता है वो है मेरा लक्ष्य ।
अपने सपनो को सच करने का सबसे अच्छा तरीका है जाग जाओ ।
 बुद्धिमत्ता ये जानना है कि कब आप बुद्धिमान नहीं हो सकते ।

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कुछ रोचक बातें
- मोहम्मद अली को फ्लाइट में बैठने और ऊंची उड़ान भरने से बहुत डर लगता था। जब वह 1960 के ओलंपिक में रोम जाने के लिए प्लेन में बैठे तो उन्होंने एयर होस्टेस से उन्हें पैराशूट पहनाने का निवेदन किया था।
- शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि मोहम्मद अली एक बेहतरीन बॉक्सर होने के साथ-साथ गायक, ऐक्टर और कवि भी थे।  उन्होंने अपना ऐल्बम ‘आई एम द ग्रेटेस्ट’ रिलीज किया था।
-  अली जब छोटे थे तो उन्होंने उस समय के फेमस बॉक्सर शुगर रे रॉबिंसन से ऑटोग्राफ मांगा था लेकिन रॉबिंसन ने उन्हें झिड़कते हुए कहा, 'मेरे पास समय नहीं है।' इस बात से अली को इतनी चोट पहुंची कि इसके बाद उन्होंने कभी भी अपने किसी फैन को ऑटोग्राफ के लिए मना नहीं किया।
- अली का प्रैक्टिस करने का तरीका बहुत ही निराला था, वह अपने भाई को खुद पर पत्थर फेंकने के लिए कहते थे और उन पत्थरों से खुद को बचाकर प्रैक्टिस करते थे।
- 1981 में मोहम्मद अली ने एक आदमी को मरने से बचाया था। दरअसल बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या की कोशिश कर रहे एक युवक को जब पुलिसकर्मी आत्महत्या न करने के लिए समझाने में असफल रहे तो मोहम्मद अली ने ये काम कर दिखाया। अली उस आदमी के पास वाली खिड़की से उस आदमी से आधे घंटे तक बात की और उसे यह मनाने में कामयाब रहे कि उसकी निजी जिंदगी में चल रही परेशानियां ठीक हो जाएंगी।
- बहुत कम लोगों को पता होगा कि मोहम्मद अली की बेटी लैला अली भी बेहतरी बॉक्सर रही हैं। अली के नौ बच्चों में सबसे छोटी लैला अली ने 24 मुकाबले लड़े और सभी में जीत हासिल की।  वह कभी न हारने वाली बॉक्सर के रूप में रिटायर हुईं।



अमर उजाला में प्रकाशित

Sunday, 29 May 2016

चश्मा तो उतार लीजिए..

किसी भी राज्य सरकार को इस बात का अधिकार है कि वह अफसरों की तैनाती किस पद पर करे। सरकारों को इस बात का भी अधिकार है कि वह अनुशासनहीनता की लक्ष्मण रेखा को पार करते हैं और सियासी गतिविधियों में भाग लेते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन महज इस बिना पर कि कोई अफसर जवाहर लाल नेहरू की नीतियों की तारीफ करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई कर दी जाए, न्यायसंगत नहीं है। मध्यप्रदेश के बड़वानी जिला के कलेक्टर अजय गंगवार के साथ यही हुआ। गंगवार ने अपनी फेसबुक पोस्ट में नेहरू की प्रशंसा करते हुए लिखा था -  जरा गलतियां बता दीजिए जो नेहरू को नहीं करनी चाहिए थी। उन्होंने आईआईटी, इसरो, आईआईएम, भेल स्टील प्लांट, बांध, थर्मल पावर लगवाने की पहल की तो क्या ये उनकी गलती थी? इस पोस्ट के बाद गंगवार को कलेक्टर के पद से हटा कर कम महत्व के पद पर भेज दिया गया। आज भले ही सियासी तौर पर कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे की राजनीति प्रतिद्वंद्वी हों लेकिन भूल जाते हैं कि नेहरू सिर्फ कांग्रेस के नेता नहीं हैं। नेहरू पहले प्रधानमंत्री तो थे ही, देश को आजाद कराने में उनकी भूमिका नेतृत्व कारी थी। लंदन से बैरिस्टरी पास करने के बाद उन्होंने सड़क पर संघर्ष करने , पुलिस की लाठियां खाने और सालों घर परिवार से दूर जेल में बिताने का बीहड़ रास्ता चुना। निसंदेह प्रधानमंत्री रहते हुए नेहरू से कश्मीर समस्या के समाधान और चीन से रिश्तों जैसे मुद्दों पर फैसला लेने में गलतियां हुईं लेकिन हमें याद रखना होगा कि नेहरू भी आखिर एक इंसान थे। इन गलतियों के बावजूद उनकी मंशा पर सवाल उनके विरोधी भी नहीं उठाते तो फिर नेहरू की प्रशंसा को अनुशासनहीनता के दायरे में कैसे माना जा सकता है। राज्य सरकारों को फैसले लेते वक्त हर कदम को सियासी चश्मे से नहीं देखना चाहिए। उनसे सहज ये अपेक्षा की जाती है कि देश के लिए समर्पित रहे ऐसे राजनीति प्रतिद्वंद्वियों, जिनके साथ उनकी वैचारिक सहमति नहीं है, का भी वह उतना ही सम्मान करें। लोकतंत्र सबको साथ लेकर चलने का दूसरा नाम है। 


   

Saturday, 28 May 2016

एक मां का संघर्ष


 ‘यूपीएससी किसे कहते हैं, यह मैं जानती तक नहीं थी लेकिन अब मेरे बच्चों की सफलता ने इसके बारे में बहुत कुछ बता दिया है।’  ये शब्द उस मां के हैं जिनके चारों बच्चों ने देश की कठिनतम परीक्षाओं में से एक यूपीएसएसी में अपना परचम लहराया है। प्रतापगढ़ के लालगंज अझारा कस्बे में रहने वाली कृष्णा देवी को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद जरूर थी लेकिन बच्चे अपने भविष्य को इस कदर संवार लेंगे इसका उन्हें जरा भी इल्म नहीं था। कृष्णा देवी कहती हैं,‘ हमें यह पता था कि हमारे बच्चे पढ़ने वाले हैं। वह बचपन में अन्य बच्चों की तरह ही थे। वह भी शरारती थे, उनमें भी आपस में लड़ाई होती थी। कभी दूध के लिए तो कभी मिठाई के लिए लेकिन उन्हें अपने पढ़ने का समय पता होता था। वह तमाम बदमाशियों के बाद भी पढ़ते थे और पढ़ाई लालटेन के आगे गाल पर हाथ रखकर किताब के सामने झपकियां मारने वाली नहीं होती थीं। वह पढ़ाई ईमानदारी की होती थी।’ कृष्णा देवी यह गर्व से कहती हैं कि पढ़ने के मामले में चारों में कोई किसी से कम नहीं था।  कृष्णा देवी की बड़ी बेटी क्षमा और सबसे छोटे बेटे लोकेश ने इस साल यूपीएससी में सफलता हासिल की है जबकि पिछले साल ही माधवी और योगेश इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल हुए थे। कृष्णा देवी बताती हैं कि उनकी सबसे बड़ी बेटी क्षमा बचपन से ही समझदार थी। वह कहती हैं,‘ क्षमा जब पढ़ने के लिए बैठती थी तो उसको देखकर बाकी तीनों भाई - बहन भी खामोशी से अपनी किताब - कॉपी लेकर बैठ जाते थे। उन्हें कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी।  कृष्णा देवी मानती हैं कि सही मायने में क्षमा ही अपने भाई बहनों के लिए मार्गदर्शक बनी। क्षमा का चयन इस बार आईपीएस के लिए हुआ है। इससे पहले उनका चयन यूपीपीसीएस में भी पुलिस उपाधीक्षक पद के लिए हुआ था और इस समय वह मुरादाबाद में प्रशिक्षण ले रही हैं। कृष्णा देवी ने अपनी छोटी बेटी माधवी को पढ़ने के लिए दिल्ली भी भेजा था लेकिन वहां के बिगड़े हुए माहौल से बेहद डरती थीं। कृष्‍णा देवी अस्वस्थ हैं और करीब दस-बारह साल से बच्चे उनसे दूर हैं। उन्हें इच्छा होती है कि बच्चे उनके साथ रहे लेकिन वह यह भी कहती हैं कि मैं अपने स्वार्थ के लिए उन्हें क्यों रोक कर रखूं। कृष्‍णा देवी ने बच्चों के सफल भविष्य के लिए अपनी खुशियों को तिलांजलि दे दी। वह बताती हैं, ‘हमने कभी भी अपनी खुशियों की परवाह नहीं की। बस हमने उन्हें बिना किसी भेदभाव के पढ़ाया। कृष्णा देवी हंसते हुए यह राज भी खोलती हैं कि चारों बच्चे अपने पापा से बहुत डरते थे। वह आगे बताती हैं कि जब वे स्कूटर से आते थे तो सारे बच्चे शांत हो जाते थे फिर ऐसा लगता ही नहीं था कि घर में कोई है। हालांकि वह स्पष्ट करती हैं कि उनमें वो डर संस्कार और तहजीब की है।  कृष्‍णा देवी के पति अनिल प्रकाश मिश्र ग्रामीण बैंक में मैनेजर हैं। वह सहजता से इस सफलता का श्रेय अध्यापकों और अपनी पत्नी को ही देते हैं। अनिल मिश्र पूर्वजों को भी धन्यवाद देना नहीं भूलते।       

फेसबुक पर गैंगवार

उत्तर प्रदेश की जेलें ही अराजकता की शिकार नहीं हैं। पंजाब का और बुरा हाल है। दरअसल, यहां सजा काट रहे गैंगेस्टर फेसबुक के जरिए अपने विरोधियों की हत्या की जिम्मेदारी लेने के साथ ही पुलिस प्रशासन को चुनौती भी दे रहे हैं।



फेसबुक पर पंजाब की 'नाभा जेल' को टाइप करके सर्च करें तो आपके सामने राज्य के सबसे अधिक सुरक्षा वाली जेल की 150 से अधिक तस्‍वीरें सामने आ जाएंगी। खास बात यह है कि इन तस्‍वीरों को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कैदियों ने डाला है। यह मामला सिर्फ नाभा जेल का नहीं है। ऐसा ही हाल पटियाला और फरीदकोट जेल का भी है, जहां के कैदी नियमित रूप से जेल के अंदर की तस्‍वीरें फेसबुक पर अपडेट करते रहते हैं।  फेसबुक और ट्विटर पर ये अपराधी खुद को 'रॉबिन हुड' और 'लायंय ऑफ पंजाब' के रूप में पेश कर रहे हैं । कइयों ने तो अपने फेसबुक प्रोफाइल कवर पिक्चर में खालिस्तानी आइकन जरनैल सिंह भिंडरनवाले की तस्वीर भी लगा रखी है। उनके मुताबिक किसी की हत्या कर देना मात्र उनके लिए काम खत्म करने वाला नहीं माना जाता, खासकर जब तक फेसबुक पर वे इसका श्रेय नहीं ले लेते और उनके उस पोस्ट पर उन्हें बड़ी संख्या में 'लाइक्स' नहीं मिल जाते।  पंजाब की जेलों में बंद गैंग और उनसे जुड़े बदमाश किस कदर बेखौफ हैं इसका पता इस बात से चलता है कि अप्रैल 2015 को गुरजीत सिंह भाटी ने संगरूर जेल से फेसबुक पर अपनी तस्वीर अपलोड की। संगरूर जेल में बंद गुरजीत भाटी गैंग पर एक व्यापारी से आठ लाख फिरौती मांगने का आरोप है। उससे पहले मार्च 2015 में नरवाना गैंग के कुलबीर सिंह ने अपनी तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट की थीं। जबकि कपूरथला जेल में बंद सुक्खा कहलों गैंग के बदमाश अक्सर फेसबुक का इस्तेमाल करते आए हैं। खास बात यह है कि ऐसे अपराधियों की सोशल मीडिया पर प्रशंसकों की भी तादाद बढ़ रही है। मसलन, अभी हाल ही में कई आपराधिक मामलों में नामजद और 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव में फाजिल्का से खड़े हुए गैंगस्टर-पॉलिटिशियन जसविंदर सिंह रॉकी की हिमाचल प्रदेश में हत्या हुई तब अपराध के इस ऑनलाइन बाजार में मानो आग लग गई हो। राॅकी के दोस्तों और फॉलोअर्स ने उसके फेसबुक वॉल पर #RIPजसविंदर सिंह रॉकी का संदेश पोस्ट कर खूब ट्रॉल कराया और साथ ही उसे प्रसिद्ध व्यक्ति बताया। कुछ प्रशंसकों ने तो गाली-गलौच करते हुए लिखा कि वे उसकी मौत का बदला जरूर लेंगे।  वहीं रॉकी हत्या के ठीक एक दिन बाद फिरोजपुर के पुलिस अधिकारी के भगोड़े बेटे व  गैंगस्टर जयपाल ने अपने प्रतिद्वंद्वी गैंग्स और पुलिस अधिकारियों के लिए फेसबुक पर एक पोस्ट करते हुए लिखा, 'गेम तो अभी शुरू हुआ है। (जस्ट वेट एंड वॉच।) आगे-आगे देखिए, होता है क्या?'।  सोशल मीडिया के जरिए जिम्मेदारी लेने की होड़ यही नहीं खत्म होती है। इसमें नया मोड़ तब आया जब पंजाब के 'शेरा खुबान गैंग' के गुंडे 'विक्की गाउंडर' ने जेल के अंदर से 'रॉकी गैंग्स्टर' के शव की तस्वीरें अपने फेसबुक पेज पर शेयर कीं और साथ में लिखा, 'ये पड़ा है रॉकी शूटर, इतना बड़ा शूटर, मेरे शेर भाई का बदला पूरा हुआ- विक्की गाउंडर।'  ग्राउंडर ने साथ ही बठिंडा के एसएसपी स्वपन शर्मा को चुनौती दी है कि वह उसके खिलाफ कार्यवाही करके दिखाएं। उसने फेसबुक पर मर्डर की फोटो के साथ स्टेट्स अपडेट किया। कई मामलों में तो यह भी देखा गया कि गैंगस्टर की मौत के वर्षों बीत जाने के बावजूद आज भी उसका फेसबुक प्रोफाइल अपडेट किया जा रहा है। उसके गुर्गे किसी भी कीमत पर उसे मरने नहीं दे रहे और उसकी मौत का बदला लेने के लिए लोगों को उकसा रहे हैं। आज भी उसके प्रोफाइल में उसकी आत्मा को शांति देने संबंधी संदेश लिखे जा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अपराधियों के इस सोशल वार से अन्य यूजर्स भी प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि सोशल मीडिया का असर लोगों के दिमाग पर सबसे ज्यादा पड़ता है। यह भी सच है कि इन हत्यारों ने अपने फेसबुक पोस्ट पर शेखी बघार कर प्रतिद्वंद्वी गैंग के लोगों को बदला लेने के लिए उकसाने का काम किया।
21 जनवरी 2015: पंजाब के फागवारा में गैंगस्टर सुक्खा कहलो को उसके प्रतिद्वंद्वी गैंग ने गोली से उड़ा दिया। उसके बाद खून से लथपथ उसकी बॉडी के चारों ओर घूम-घूमकर हत्यारा डांस करने लगा। इस डांस का वीडियो तैयार कर उसे ऑनलाइन कर दिया गया। 40 अलग-अलग आपराधिक मामलों में नामजद कहलो के फेसबुक पेज पर RIP  संदेशों की झड़ी लग गई। कइयों ने तो अपने संदेशों में यह भी कहा कि वह उसकी मौत का बदला जरूर लेगा।

28 जनवरी2016 को फरीदकोट मॉडर्न जेल में कुख्यात अपराधी काका फरीदकोटिया का बर्थडे मनाया गया। बाकायदा बैरक में केक मंगवाकर काटा और कैदियों ने अपने मोबाइल से फोटो भी लिए। इस सेलिब्रेशन में बटाला और अमृतसर का गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया, लुधियाना में पुलिस पर फायरिंग करने वाला गैंगस्टर गोरु बच्चा भी था। सेलिब्रेशन के फोटो जग्गू ने रात 8.12 बजे फेसबुक आईडी पर अपलोड किए।

30 जनवरी 2016 को फरीदकोट जेल की ही बैरक की एक फोटो दोपहर 12 बजे जग्गू भगवानपुरिया ने फेसबुक पर अपडेट की। इस तस्वीर में बैरक में मौजूद एक कैदी मोबाइल पर बात कर रहा है और दूसरा मोबाइल पकड़ फेसबुक चला रहा है। जग्गू पर 24 से ज्यादा केस हैं। वह जेल से गैंग को ऑपरेट कर रहा है।

20 फरवरी 2016: रवि ख्वाजके, एक सरपंच को लुधियाना के एक विवाह समारोह में गोली मार दी गई। कुख्यात हिटलैन दविंदर बंबिहा ने अपने फेसबुक पेज पर उसकी हत्या की बात कबूली और उसके इस पोस्ट को 500 से ज्यादा लाइक्स मिले।
30 अप्रैल 2016: गैंगस्टर और राजनीति से तालुल्क रखने वाले जसविंदर सिंह रॉकी को हिमाचल के परवानू के निकट गोली मार दी गई और इसका श्रेय लेने के लिए अपराधियों के बीच ऑनलाइन जंग शुरू हो गई।






25 फीसदी से ज्यादा यूजर्स फेसबुक के किसी भी तरह के प्राइवेसी कंट्रोल को नहीं मानते।
130 लोग जुड़े हैं हर व्यक्ति से औसत रूप से फेसबुक पर
850 लाख सक्रिय मासिक यूजर्स फेसबुक के साथ जुड़े हुए हैं।
21 प्रतिशत एशिया के यूजर्स हैं इस नेटवर्किंग वेबसाइट के कुल यूजर्स में से।
488 लाख यूजर्स लगभग रोज मोबाइल पर फेसबुक चलाते हैं।
86 हजार पोस्ट किए जाते हैं ब्राजील से हर माह, जो सबसे अधिक हैं। 
23 प्रतिशत यूजर्स रोज पांच या उससे अधिक बार अपना फेसबुक अकाउंट चेक करते हैं।
10 या उससे अधिक लाइक्स वाले 42 लाख के करीब पेज हैं फेसबुक पर
01 लाख से अधिक वेबसाइट्स अलग अलग तरह से फेसबुक से जुड़ी हुई है।
85 प्रतिशत महिलाएं फेसबुक पर अपने दोस्तों से परेशान हैं।








भारत के कुछ खास जेल


1.तिहाड़ जेल
देश की राजधानी दिल्ली में बनी ये जेल बड़ी खतरनाक लगती है, लेकिन शायद आपको यकीन न हो यहां पुस्तकालय और पढ़ाई की भी सुविधा है। यहां के रेस्तरां में आपको अच्छा खाना मिलता है और कैदी लोगों को समय-समय पर काम दिया जाता है। ये साउथ एशिया की सबसे बड़ी जेलों में से एक है। यहां बेकरी प्रोडक्ट, हैंडलूम और टेक्स्टाईल की चीजें बनाना कैदियों को सिखाया जाता है ताकि वह जेल से बाहर जाने के बाद अपने हाथ के हुनर से कमा-खा सकें। तिहाड़ जेल में अच्छी प्लेसमेंट भी होती हैं।

2.येरवडा जेल
 यहां के कैदी खेती में भी अव्वल आते हैं और यहां कई तरह के बीज़ों की उपज भी की जाती है। इस जेल में पढ़ाई के लिए एक बढ़िया माहौल मिलता है। यहां गऊ पालन के साथ-साथ कैदियों द्वारा बनाये गये दूध के बने उत्पाद बाजार में बेचे जाते हैं। येरवडा जेल में एक रेडियो स्टेशन भी है जिसके सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।

3.पुझल जेल
ये जेल तमिलनाडु के चेन्नई में स्थित है। ये जेल 2006 में बनाई गई थी। इसमें कैदियों को रखने के लिए सबसे बड़ा और अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कॉम्प्लेक्स है। यहां मेडिटेशन हॉल, पब्लिक म्यूजिक सिस्टम, जिम और योगा की क्लास भी लगती है। रसोई और अस्पताल में भी सुविधा अच्छी है।

4.नैनी जेल
इलाहाबाद के पास स्थित ये जेल ब्रिटिश राज के दौरान की है। राज्य में सबसे ज्यादा ऑर्गेनिक खेती इसी जेल में होती है, जो इसे एक विशेष ख्याति दिलाता है। यहां के कैदियों को खेती की आधुनिक विधाओं से समय-समय पर रूबरू करवाया जाता है, ताकि वह भविष्य में खेती को एक नई दिशा और नए आयाम दे सकें।

5.राजामुंदरी जेल
ये जेल आंध्र प्रदेश के राजामुंदरी में है। ये सबसे बड़ी और सबसे पुरानी जेलों में से एक है। यहां कैदियों की सुरक्षा का खासा ध्यान रखा जाता है। कैदियों के खेलने के लिए एक स्टेडियम भी है। यहां के कैदी लकड़ी का अच्छा सामान बनाते हैं और साक्षरता दर भी अधिक है। वर्कशॉप और अस्पताल की भी सुविधा है।

6. आर्थर रोड जेल

भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में ये जेल है। यहां समय-समय पर कैदियों के लिए योगा कैंप लगते रहते हैं। मुंबई में होने के कारण जगह की थोड़ी कमी है, लेकिन कैदियों को हाथ के हुनर सिखाए जाते हैं ताकि भविष्य में वो अपना जीवनयापन कर सकें।


यहां बार - बार आना चाहेंगे अपराधी

कई ऐसे देश भी हैं जहां की कुछ जेलों में अपराधियों को हर तरह के ऐशो-आराम की सुविधाएं दी जाती है और कैदी यहां आने के बाद किसी चीज की कमी महसूस नहीं करते।

1. सैन पेड्रो जेल

अमेरिकी प्रांत बोलीविया में स्थित सैन पेड्रो जेल एक ऐसी जेल है जो कि कुछ सेक्शन और क्लास में बंटी हुई है। इसमें हर कैदी का अपना प्राइवेट कमरा भी होता है। यहां पर कैदी को प्राइवेट सेल खरीदने के लिए 1,000 डॉलर से लेकर 1,500 डॉलर तक देना पड़ता है। इसमें सामान लेने के लिए दुकानें भी है। इस जेल में बच्चें भी कैदी होते हैं।

2. हाल्डेन प्रिजन 
नार्वे के इस जेल में हर अपराधी को घर के जैसा अच्छा खाना, बड़े-बड़े कमरे, मोबाईल, प्राइवेट बाथरूम, टेलीविजन अदि तरह की हर सुविधा मिलती है। नार्वे में इस जेल को शांतिपूर्ण और आरामदायक जेल माना जाता है। यहां पर कैदीयों के लिए  सिक्योरिटी का इंतजाम भी किया गया है।

3. डोल्लोन प्रिजन
स्विट्जरलैंड की स्थित इस डोल्लोन प्रिजन जेल में कैदियों को जो कमरा दिया जाता है वह बहुत ही बड़ा है। कमरे में उन्हें अलमारी, बीएड, टेबल, सोने के लिए बिस्तर अदि तक दिया जाता है। यहां कैदियों को मोबाईल के जरिए सोशल मीडिया से जुड़े रहने की छुट है।

4. एचएमपी एडीवेल

स्कॉटलैंड की इस जेल में कैदियों के लिए एक हॉल बनाया गया है जिसमे वह रहते है। देखने में इसके अंदर का नजारा किसी कंपनी के सेमिनार हॉल की तरह लगता है।

5.बैस्टॉय प्रिजन

नॉर्वे की इस जेल में कैदीयों को रहते के लिए सनबाथ, टेनिस, घुड़सवारी जैसे सभी ऐशो-आराम दिए जाते है जो कि अपराध करने पर मिलते है न कि पैसों से।

6. ओटागो कॉरेक्‍शन

न्यूजीलैंड की इस जेल में जैसे कमरे हैं वैसे कमरे हमें किसी भी साधारण होटल में मिल जाते है। यहां पर हर व्यक्ति का कमरा पर्सनल होता है। जिसमें एक ही व्यक्ति रह सकता है।

7. जस्टिस सेंटर लेबॉन

ऑस्ट्रिया की इस जेल में कैदियों के कमरे काल कोठरी की तरह छोटे-छोटे है। इस छोटे से कमरे में उनहे हर तरह की सुविधा जैसे कि कुर्सी, सोफा अादि दी गई है लेकिन यह सब कमरे एयरकंडिशन भी हैं।

8. सौलेंटन प्रिसन

स्वीडन की इस जेल में रहने वाले कैदियों के पास घर में हर तरह की सुविधा उपलब्‍ध रहती है। खास बात यह है कि सरकार मुफ्त में सुविधा मुह‌ैया कराती है।

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Sunday, 15 May 2016

भोजपुरी को मिली नई झुलनी!



अभी हाल ही की बात है, मैं भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार ‌दिनेश लाल यादव की फिल्म  निरहुआ हिन्दुस्तानी
देख रहा था। भोजपुरी पृष्ठिभूमि से होने के बावजूद फिल्म देखने से कुछ मिनट पहले तक इस कलेवर की फिल्मों को लेकर मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं था। यहां यह बताने में भी हिचक नहीं है कि भोजपुरी के  रवि किशन, दिनेश लाल, मनोज तिवारी जैसे शीर्षस्‍थ अभिनेताओं के नाम के अलावा मुझे ज्यादा कुछ पता भी नहीं रहा है।  लेकिन पिछले कुछ समय से मेरे अंदर भोजपुरी फिल्मों को जानने की जिज्ञासा सी होने लगी है। दरअसल, यह असर फिल्म निरहुआ हिन्दुस्तानी का ही है। ऐसा नहीं है कि मैं फिल्म का प्रमोशन कर रहा ह‌ूं क्योंकि और न ही किसी की भक्‍ति कर रहा हूं क्योंकि यह फिल्म काफी दिनों पहले ही रिलीज हो चुकी है। फिल्म जिन्होंने नहीं देखी है उन्हें बता दूं कि फिल्म में गरीब दिनेश लाल खूबसूरत लड़की से शादी के सपने लेकर मुंबई आता है और यहां परिस्थिति और वसीयत की मजबूरी से बंधी अमीर आम्रपाली दुबे से उसकी  शादी हो जाती है। खास बात यह है कि आम्रपाली दुबे यह जानते हुए भी अनजान दिनेशलाल से शादी करती है कि कुछ दिनों में ही उसके पति को फांसी हो जाएगी और वह दिनेश की इस सजा से बेहद खुश भी है लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर होता है और आम्रपाली को दिनेश के साथ गांव जाना पड़ता है। वहीं इन दोनों में प्यार हो जाता है।  फिल्म में कई गाने हैं लेकिन उनमें से "नी झुलनी के छईयां बलम  .."  गाने की मिठास ने कहीं न कहीं इस सिनेमा की मिठास को सामने लाने का काम किया है। यह गाना इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहा है। इस गाने को यूट्यूब पर अब तक 12 लाख से भी ज्यादा लोग देख चुके है। कल्पना और दिनेश लाल की आवाज में लगभग चार मिनट के इस गाने में अश्लीलता का कोई नामोनिशान नही है। दरअसल, इस गाने ने मेरे जैसे लोगों की सोच को बदलने का काम किया है और भोजपुरी फिल्मों और गानों पर फिर से विश्वास की अलख जगाने की कोशिश भी की है।  शायद यह मेरे अस्थिर व्यवहार का परिचय रहा हो लेकिन सच यह है कि निरहुआ और पवन सिंह जैसे कलाकारों के जरिए भोजपुरी फिल्म अपने आप को बदल भी रहा है और गढ़ भी रहा है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि दो साल पहले तक गुडु रंगीला, राधेश्याम रसिया और बादल बवाली या फिर कल्लुआ, दिपक दिलदार जैसे गायकों ने अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी थीं । यही वजह है कि भोजपुरी गानों की विश्वसनीयता भी कठघरे में आई। भोजपुरी गानों का नाम सुनते ही हमरा हऊ चाहीं, सात आईटम, चुए लागल और चढ़ल जवानी रसगुल्ला बा जैसे गाने दिमाग में आते थे लेकिन अब 'नी झुलनी के छईयां' जैसे गाने की वजह से भोजपुरी को नई झुलनी यानी नया गहना मिल गया है।  


https://www.youtube.com/watch?v=FmEgQYzcAns