Saturday, 28 May 2016

एक मां का संघर्ष


 ‘यूपीएससी किसे कहते हैं, यह मैं जानती तक नहीं थी लेकिन अब मेरे बच्चों की सफलता ने इसके बारे में बहुत कुछ बता दिया है।’  ये शब्द उस मां के हैं जिनके चारों बच्चों ने देश की कठिनतम परीक्षाओं में से एक यूपीएसएसी में अपना परचम लहराया है। प्रतापगढ़ के लालगंज अझारा कस्बे में रहने वाली कृष्णा देवी को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद जरूर थी लेकिन बच्चे अपने भविष्य को इस कदर संवार लेंगे इसका उन्हें जरा भी इल्म नहीं था। कृष्णा देवी कहती हैं,‘ हमें यह पता था कि हमारे बच्चे पढ़ने वाले हैं। वह बचपन में अन्य बच्चों की तरह ही थे। वह भी शरारती थे, उनमें भी आपस में लड़ाई होती थी। कभी दूध के लिए तो कभी मिठाई के लिए लेकिन उन्हें अपने पढ़ने का समय पता होता था। वह तमाम बदमाशियों के बाद भी पढ़ते थे और पढ़ाई लालटेन के आगे गाल पर हाथ रखकर किताब के सामने झपकियां मारने वाली नहीं होती थीं। वह पढ़ाई ईमानदारी की होती थी।’ कृष्णा देवी यह गर्व से कहती हैं कि पढ़ने के मामले में चारों में कोई किसी से कम नहीं था।  कृष्णा देवी की बड़ी बेटी क्षमा और सबसे छोटे बेटे लोकेश ने इस साल यूपीएससी में सफलता हासिल की है जबकि पिछले साल ही माधवी और योगेश इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल हुए थे। कृष्णा देवी बताती हैं कि उनकी सबसे बड़ी बेटी क्षमा बचपन से ही समझदार थी। वह कहती हैं,‘ क्षमा जब पढ़ने के लिए बैठती थी तो उसको देखकर बाकी तीनों भाई - बहन भी खामोशी से अपनी किताब - कॉपी लेकर बैठ जाते थे। उन्हें कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी।  कृष्णा देवी मानती हैं कि सही मायने में क्षमा ही अपने भाई बहनों के लिए मार्गदर्शक बनी। क्षमा का चयन इस बार आईपीएस के लिए हुआ है। इससे पहले उनका चयन यूपीपीसीएस में भी पुलिस उपाधीक्षक पद के लिए हुआ था और इस समय वह मुरादाबाद में प्रशिक्षण ले रही हैं। कृष्णा देवी ने अपनी छोटी बेटी माधवी को पढ़ने के लिए दिल्ली भी भेजा था लेकिन वहां के बिगड़े हुए माहौल से बेहद डरती थीं। कृष्‍णा देवी अस्वस्थ हैं और करीब दस-बारह साल से बच्चे उनसे दूर हैं। उन्हें इच्छा होती है कि बच्चे उनके साथ रहे लेकिन वह यह भी कहती हैं कि मैं अपने स्वार्थ के लिए उन्हें क्यों रोक कर रखूं। कृष्‍णा देवी ने बच्चों के सफल भविष्य के लिए अपनी खुशियों को तिलांजलि दे दी। वह बताती हैं, ‘हमने कभी भी अपनी खुशियों की परवाह नहीं की। बस हमने उन्हें बिना किसी भेदभाव के पढ़ाया। कृष्णा देवी हंसते हुए यह राज भी खोलती हैं कि चारों बच्चे अपने पापा से बहुत डरते थे। वह आगे बताती हैं कि जब वे स्कूटर से आते थे तो सारे बच्चे शांत हो जाते थे फिर ऐसा लगता ही नहीं था कि घर में कोई है। हालांकि वह स्पष्ट करती हैं कि उनमें वो डर संस्कार और तहजीब की है।  कृष्‍णा देवी के पति अनिल प्रकाश मिश्र ग्रामीण बैंक में मैनेजर हैं। वह सहजता से इस सफलता का श्रेय अध्यापकों और अपनी पत्नी को ही देते हैं। अनिल मिश्र पूर्वजों को भी धन्यवाद देना नहीं भूलते।       

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