Sunday, 29 May 2016

चश्मा तो उतार लीजिए..

किसी भी राज्य सरकार को इस बात का अधिकार है कि वह अफसरों की तैनाती किस पद पर करे। सरकारों को इस बात का भी अधिकार है कि वह अनुशासनहीनता की लक्ष्मण रेखा को पार करते हैं और सियासी गतिविधियों में भाग लेते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन महज इस बिना पर कि कोई अफसर जवाहर लाल नेहरू की नीतियों की तारीफ करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई कर दी जाए, न्यायसंगत नहीं है। मध्यप्रदेश के बड़वानी जिला के कलेक्टर अजय गंगवार के साथ यही हुआ। गंगवार ने अपनी फेसबुक पोस्ट में नेहरू की प्रशंसा करते हुए लिखा था -  जरा गलतियां बता दीजिए जो नेहरू को नहीं करनी चाहिए थी। उन्होंने आईआईटी, इसरो, आईआईएम, भेल स्टील प्लांट, बांध, थर्मल पावर लगवाने की पहल की तो क्या ये उनकी गलती थी? इस पोस्ट के बाद गंगवार को कलेक्टर के पद से हटा कर कम महत्व के पद पर भेज दिया गया। आज भले ही सियासी तौर पर कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे की राजनीति प्रतिद्वंद्वी हों लेकिन भूल जाते हैं कि नेहरू सिर्फ कांग्रेस के नेता नहीं हैं। नेहरू पहले प्रधानमंत्री तो थे ही, देश को आजाद कराने में उनकी भूमिका नेतृत्व कारी थी। लंदन से बैरिस्टरी पास करने के बाद उन्होंने सड़क पर संघर्ष करने , पुलिस की लाठियां खाने और सालों घर परिवार से दूर जेल में बिताने का बीहड़ रास्ता चुना। निसंदेह प्रधानमंत्री रहते हुए नेहरू से कश्मीर समस्या के समाधान और चीन से रिश्तों जैसे मुद्दों पर फैसला लेने में गलतियां हुईं लेकिन हमें याद रखना होगा कि नेहरू भी आखिर एक इंसान थे। इन गलतियों के बावजूद उनकी मंशा पर सवाल उनके विरोधी भी नहीं उठाते तो फिर नेहरू की प्रशंसा को अनुशासनहीनता के दायरे में कैसे माना जा सकता है। राज्य सरकारों को फैसले लेते वक्त हर कदम को सियासी चश्मे से नहीं देखना चाहिए। उनसे सहज ये अपेक्षा की जाती है कि देश के लिए समर्पित रहे ऐसे राजनीति प्रतिद्वंद्वियों, जिनके साथ उनकी वैचारिक सहमति नहीं है, का भी वह उतना ही सम्मान करें। लोकतंत्र सबको साथ लेकर चलने का दूसरा नाम है। 


   

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