Friday, 24 June 2016

13 लाख वोटों ने बदला ब्रिटेन का भविष्य

 ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन (ईयू) से अलग हो गया है। गुरुवार को कराए गए जनमत संग्रह में 52 फीसदी लोगों ने ‘ब्रेग्जिट’ के पक्ष में मतदान किया, वहीं 48 फीसदी वोट ‘रीमेन’ के पक्ष में पड़े। शुक्रवार को नतीजे साफ होने के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने इस्तीफे की घोषणा कर दी। पीएम ने कहा कि वह जनता के फैसले का सम्मान करते हैं और अक्तूबर में उनके कार्यालय में एक नया प्रधानमंत्री आ जाएगा। कैमरन ने उम्मीद जताई कि ईयू से अलग होने के फैसले से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। उन्होंने कहा कि देश के आर्थिक हालात अच्छे हैं। हालांकि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने की प्रक्रिया में पूरे दो साल लग जाएंगे। ब्रिटिश मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन ने इस जनमत संग्रह के जरिए 43 साल बाद ईयू की सदस्यता छोड़ने का निर्णय लिया है। मतदान प्रक्रिया में 4.6 करोड़ लोगों ने भाग लिया। ईयू में रहने को लेकर जहां 1.16 करोड़ वोट पड़े, वहीं ईयू छोड़ने के पक्ष में 1.74 लोगों ने मतदान किया। करीब 4 फीसदी के अंतर के साथ ब्रिटेन के 13 लाख लोगों ने अपने देश का भविष्य बदल डाला।  

बाजार में हाहाकार, पाउंड में 31 साल की बड़ी गिरावट
जनमत संग्रह के नतीजों के बाद दुनिया और खासतौर से एशियाई शेयर बाजार में हाहाकार मच गया। यूरोप के सभी बाजार गिरावट के साथ बंद हुए तो जापान का निक्कई काफी नीचे चला गया। वहीं पाउंड में 31 साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। यह 1.3229 डॉलर तक पहुंच गया। पाउंड के अलावा ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, न्यूजीलैंड डॉलर, मैक्सिकन पैसो, दक्षिण अफ्रीका के रेंड और स्विटजरलैंड, नार्वे, पोलेंड की मुद्रा में भी गिरावट देखी गई। वहीं, भारतीय शेयर बाजार में बीएसई 604.51 अंकों की गिरावट के साथ 26,397.71 पर बंद हुआ। एनएसई 181.85 अंकों की गिरावट के साथ 8,088.60 पर बंद हुआ। 

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क्या है यूरोपियन यूनियन
यूरोपियन यूनियन 28 देशों का महासंघ है, जिसकी संसद में यूरोप के सभी देश अपने चुने हुए सदस्यों को भेजते हैं। इसकी कार्यपालिका में यूरोपियन कमीशन का एक अध्यक्ष होता है, और एक कैबिनेट भी, जिसमें सदस्य देशों के प्रतिनिधि होते हैं। ब्रिटेन वर्ष 1973 से यूरोपियन यूनियन का हिस्सा है, लेकिन इसके बावजूद वह शेष यूरोप से हमेशा आशंकित ही रहा है, जहां बाकी यूरोपीय देशों ने शेनजेन एग्रीमेंट के बाद अपनी सीमाओं से आना-जाना काफी आसान कर दिया, वहीं ब्रिटेन इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इसके अलावा बाकी यूरोपीय देशों ने एक ही मुद्रा ‘यूरो’ को अपना लिया, जबकि ब्रिटेन इससे भी बाहर रहा। वह यूरो के लिए अपनी मुद्रा पाउंड स्टर्लिंग को छोड़ने के लिए कभी राजी नहीं हुआ। जिन देशों ने यूरो को अपनाया उनकी इमिग्रेशन पॉलिसी भी एक जैसी तय हुई। रक्षा, आर्थिक क्षेत्र और विदेश नीति पर भी एक राय में फैसले लिए जाने लगे। एक वीजा से पूरे यूरोपीय यूनियन में एंट्री हो सकती है।

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ब्रेक्जिट
‘ब्रेक्जिट’ शब्द दो शब्दों ‘ब्रिटेन’ और ‘एक्जिट’ से मिलकर बनाया गया। लेकिन इसे लेकर ब्रिटेन में दो गुट बन गए। एक का मत ‘रीमेन’ यानी ईयू में बने रहना था, जबकि दूसरे गुट का मत ‘लीव’ यानी ईयू छोड़ देना था।

‘रीमेन’ बनाम ‘लीव’
यूरोपियन यूनियन से बाहर होने यानी ‘लीव’ गुट की दलील थी कि देश की पहचान, आजादी और संस्कृति खतरे में हैं। इसे बचाने के लिए ईयू से अलग होना चाहिए। गुट प्रवासियों पर भी सवाल उठा रहा था। एक दलील यह भी थी कि ईयू ब्रिटिश करदाताओं के अरबों पाउंड ले लेता है, जबकि बदले में उस पर अलोकतांत्रिक फैसले थोपता है। यूरोपियन यूनियन में बने रहने के पक्षधर ‘रीमेन’ गुट की दलील थी कि ऐसा करना अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद होगा। प्रवासियों का मुद्दा बेहद छोटा है।

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इसलिए हुआ जनमत संग्रह
ब्रिटेन में लंबे समय से यह कहा जा रहा था कि यूरोपियन यूनियन (ईयू) अपने सिद्धांतों से भटक गया है। दलील दी जा रही थी कि यूनियन में शामिल होने के कारण ब्रिटेन अपनी आर्थिक और विदेशी नीति को लेकर आजादी के साथ फैसले नहीं ले पा रहा है। ईयू से अलग होने पर ब्रिटेन अपनी इमिग्रेशन पॉलिसी को लेकर भी खुद फैसले ले सकेगा। डेविड कैमरन जब पीएम बने तो उन्होंने घोषणा की थी कि वह जनमत संग्रह कराएंगे। ब्रिटेन में इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड शामिल हैं।

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फायदा
99 हजार 300 करोड़ की सालाना बचत होगी

ईयू में बने रहने के लिए ब्रिटेन को सालाना 99 हजार 300 करोड़ रुपये फीस चुकानी होती है। यह बचेगी। ईयू में दस हजार अधिकारी काम करते हैं। इसमें कई पूर्व राजनेता है, जो राजनीतिक पारी खत्म होने के बाद वहां प्रवेश कर जाते हैं। इन्हें मोटी रकम सैलरी के तौर पर मिलती है, जो ब्रिटिश पीएम की सैलरी से भी ज्यादा है। ईयू के देशों के मुकाबले ब्रिटेन दुनिया को दोगुना निर्यात करता है। ईयू से बाहर आने पर उसके लिए मुक्त व्यापार के दरवाजे खुलेंगे। सबसे अहम कि ब्रिटेन प्रवासियों के आने पर रोक लगा सकेगा, जिनकी पूर्वी यूरोप में संख्या 20 लाख के करीब है।

नुकसान
लेकिन 100 अरब पौंड तो तुरंत ही डूब जाएंगे

ईयू से बाहर होने पर ब्रिटेन को 100 अरब पौंड का नुकसान हो सकता है। दस लाख नौकरियां डूबने का भी खतरा है। फन्फेडरेशन ऑफ ब्रिटिश इंडस्ट्री के अध्ययन के मुताबिक, ब्रिटेन लंबे समय तक आर्थिक मुश्किल से जूझेगा। घरेलू आय 2100 पौंड और 3700 पौंड के बीच घट जाएगी। बेरोजगारी की दर 5.1 फीसदी से बढ़कर आठ फीसदी तक जा सकती है।


05वीं बड़ी अर्थव्यवस्था है ब्रिटेन दुनिया की, दायरा ती हजार अरब डॉलर।

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भारत पर असर
रुपया
- परिणाम आते ही 60 पैसे लुढ़क कर डॉलर के मुकाबले 68.85 पर पहुंचा रुपया। आरबीआई ने दखल दिया, तब सुधरा। रुपया और गिरा तो भारत के लिए कच्चा तेल खरीदना महंगा हो जाएगा।

इंडस्ट्री
ब्रिटेन में 800 भारतीय कंपनियां हैं। ब्रिटेन से ईयू से बाहर होने पर इन कंपनियों के कारोबार पर असर होगा, क्योंकि ज्यादातर यूरोप के खुले बाजार में बिजनेस कर रही है। 1.1 लाख लोगों को रोजगार देने वाली इन कंपनियों को ईयू और ब्रिटेन को अलग-अलग टैक्स देना होगा। टाटा मोटर्स, एयरटेल और कई फार्मा कंपनियों की चुनौती बढ़ सकती है।

नौकरी
भारत के अलग-अलग हिस्सों से लोग यूरोप में नौकरी के लिए जाते हैं। आंकड़ों के मुतबिक, ब्रिटेन में 20 हजार गोवा के लोग पुर्तगाल के पासपोर्ट पर काम कर रहे हैं। ईयू से अलग होने के बाद इन लोगों के लिए वहां काम करना मुश्किल हो जाएगा। पुड्डुचेरी के लोगों के पास भी पुर्तगाल का पासपोर्ट है, वह भी मुश्किल में आएंगे। पंजाब के लोगों की चुनौती भी बढ़ेगी।

शिक्षा
ईयू से समझौतों के कारण ब्रिटेन के स्कूल, कॉलेजों में अभी तक यूरोपीय छात्रों को छात्रवृत्ति और दाखिले में प्राथमिकता दी जाती है। अब ऐसा नहीं होगा। इससे भारतीय छात्रों के लिए ब्रिटेन में पढ़ाई के अवसर बढ़ेंगे।

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