Friday, 2 September 2016

यही हाल रहा तो कंधे पर कई और जिंदगियां दम तोड़ेंगी


बीते दो हफ्तों में देश के अलग-अलग इलाकों से मानवता को शर्मसार कर देने वाली तस्वीरें सामने आईं। फिर चाहे वह ओडिशा के कालाहांडी में पत्नी की लाश को कंधे पर रखकर मीलों चलने वाला माझी हो या कानपुर में इलाज के लिए बेटे को कंधे पर रखकर एक अस्पताल से दूसरे तक दौड़ता पिता। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और खत्म होती इंसानियत खुलकर सामने आई। आंकड़े तो और भी भयावहता दिखाते हैं। 


- 01 हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार, लेकिन भारत में 03 हजार लोगों पर एक है।
- 14 लाख डॉक्टरों की कमी है देश में। यह संख्या आगे और बढ़ेगी क्योंकि हर साल सिर्फ 5500 डॉक्टर ही तैयार हो पा रहे हैं।
- 50 फीसदी डॉक्टरों की कमी है सर्जरी, स्त्री रोग और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में। 
- 82 फीसदी सर्जरी, स्त्री रोग और शिशु रोग के डॉक्टरों की कमी है देश के ग्रामीण क्षेत्रों में।

विदेशों में नौकरी की चाहत
- 56 हजार भारतीय डॉक्टर विदेशों में कार्यरत थे साल 2000 में। 2010 में यह संख्या 55 फीसदी बढ़कर 86,680 पहुंच गई।
- 60 फीसदी भारतीय डॉक्टर सिर्फ अमेरिका में ही सेवाएं दे रहे हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा भारतीय डॉक्टर विदेशों में कार्यरत हैं।

मेडिकल कॉलेजों का हाल
- 412 मेडिकल कॉलेज हैं इस समय देश में। 45 फीसदी सरकारी और 55 प्रतिशत प्राइवेट।
- 640 जिलों में से देश के 193 जिलों में ही मेडिकल कॉलेज हैं।
- 447 जिलों में चिकित्सा की पढ़ाई के लिए कोई बुनियादी व्यवस्था नहीं है।
- 02 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का डोनेशन।

बेहिसाब बढ़ा स्वास्थ्य खर्च
- 1947 से 2015 के बीच प्राइवेट अस्पतालों में 93 फीसदी महंगा हुआ इलाज।
- 58 फीसदी ग्रामीण और 68 फीसदी शहरी जनता प्राइवेट अस्पतालों में इलाज को मजबूर।
- 3.9 करोड़ लोग हर साल बीमारी पर होने वाले बेहिसाब खर्च से गरीबी में चले जाते हैं।

- सरकार की मंशा भी कमजोर
- 04 फीसदी खर्च करती है भारत सरकार अपने राष्ट्रीय बजट का स्वास्थ्य के क्षेत्र में। अमेरिका 18 फीसदी खर्च करता है। 

स्रोत: विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, एसोचैम, इंटरनेशनल माइग्रेशन आउटलुक  2015

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