Sunday, 26 January 2014

अब 'आप' ने दुखी कर दिया है… दीपक कुमार

पिछले साल के अंत में जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो मेरे जैसे तमाम लोगों ने अरविंद केजरीवाल में अपने हर सपने देखें या यूं कहें संजोए भी। तभी तो अचानक  आम आदमी का जनसैलाब 'आप' की टोपी पहनने के लिए बेताब हो गया । जिसमें समाज के हर तबके ने आम आदमी पार्टी में देश के सुनहरे भविष्य की उम्मीद से खुद को 'आप' से जोड़ा। लेकिन जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता को अपने ढ़ग से चलाना शुरू किया तो एक  ही झटके में आम आदमी के सारे अरमान बिखर गएं। अब यह चर्चा का विषय हो सकता है कि यह  'आप' की अनुभवहीनता का रिजल्ट है या अति उत्साह का। 
बहरहाल हमें यह समझना जरूरी है कि आखिर क्यों 'आप' ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी है ? क्या वजह है कि आम आदमी पार्टी से लोगों का भरोसा डिगने लगा है?  या फिर क्यों आम आदमी पार्टी सड़कों से सत्ता को चलाने में विश्वास कर रही है? अगर 'आप' के नजर में लोकतंत्र का मतलब सड़क से सत्ता चलाना होता है तो यह गलत नहीं है। लेकिन  साथ ही लोकतंत्र का मतलब यह भी  बिल्कुल नहीं होता कि सत्ताधारी अपनी ग​लतीयों, अपनी नाकामयाबियों, अपनी असफलता को छुपाने के लिए सड़क पर आकर जनता को बेवकुफ बनाना शुरू कर दे।
जिस तरीके से अपने ही कानून मंत्री सोमनाथ भारती मंत्री को बचाने के लिए अरविंद केजरीवाल सड़क पर आए उसके बाद से यह सवाल उठने लगा है कि क्या अरविंद केजरीवाल की ईमानदार, जनता के हित में सोचने वाले नेता की गढ़ी हुई छवि को नुकसान पहुंचा है? क्या दिल्ली पुलिस के कुछ कर्मियों पर कार्रवाई की मांग करते हुए दो दिनों तक धरने पर बैठने की वजह से 'ब्रैंड केजरीवाल' को झटका लगा है?

इन सवालों के जवाबों की उम्मीद न करते हुए यह मानना ही होगा कि वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनीति को रोल मॉडल के रूप में अब तक देखते रहे कई लोग अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया, मीडिया और सार्वजनिक बहसों में कई लोग जो 'केजरीवाल छाप' राजनीति के समर्थक रहे हैं, अब निराश हैं। अब कई बुद्धिजीवि अरविंद केजरीवाल के धरने पर बैठने के फैसले की तीखी आलोचना कर रहे हैं। इतना ही नही अब तो अरविंद केजरीवाल को 'राजनीति का लंपटवाद' या 'अराजकतावादी' , 'येड़ा', 'शहरी नक्सली' जैसे नामों से भी नवाजा जाने लगा है।
अरविंद केजरीवाल का धरना खत्म तो हो चुका है। लेकिन सवाल यह है कि जनता को इसे धरने से परेशानी के अलावा मिला क्या है? क्योंकि केजरीवाल का धरना 'आप' के दो मंत्रियों सोमनाथ भारती और राखी बिड़ला की दिल्ली पुलिस से हुई नोंकझोंक को लेकर था। हालांकि, उन्होंने इसे दिल्ली पुलिस पर दिल्ली सरकार के नियंत्रण का मुद्दा बना कर बड़ा रूप देने की कोशिश जरूर की। लेकिन, जिस तरह मांग पूरी हुए बिना धरना खत्म कर दिया और इसे जनता की जीत बता दिया, उससे उनकी आलोचना ही हो रही है। क्योंकि जनता भी समझ रही है कि यह लड़ाई जनता की नहीं थी  बल्कि यह लड़ाई अरविंद केजरीवाल की अपने मंत्रियों को बचाने के लिए थी। एक बात यह भी है कि केजरीवाल की अपील के बावजूद उतनी बड़ी संख्या में लोग धरने में शामिल नहीं हुए। जिस वजह से भी केजरीवाल को धरना खत्म करनी पड़ी।
अब सवाल यहां यह भी है कि सोमनाथ भारती की पुलिस से झड़प हुई क्यों? दरअसल, दिल्ली के कानून मंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती के मुताबिक दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन इलाके में अफ्रीकी मूल के लोग सेक्स रैकेट और ड्रग्स का धंधा चलाते है लेकिन पुलिस कार्रवाई नहीं करती है, जिससे स्थानीय नागरिक परेशान हैं। लेकिन स्थानीय नागरिकों की परेशानी कुछ और ही है। दरअसल, हमारे देश में अफ्रीकी मूल के लोगों के प्रति नाराजगी बहुत पुरानी है। होता यह है कि अफ्रीकी मूल के निवासी अपने तौर तरीकों से लाइफ को जीना पसंद करते हैं, जो जायज भी है। लेकिन हमारे यहां के नागरिकों को उनके चालचलन बिल्कुल जंगली जानवरों जैसे लगते हैं। हमारे यहां  उन्हें गुलाब जामून, रसगुल्ले, सुअर जैसे शब्दों से नवाजा जाता है और उन्हें चिढ़ाया जाता है। ​उनके लाइफ स्टाईल से लोग चिढ़ते हैं और शायद इसी वजह से खिड़की एक्सटेंशन के स्थानीय निवासियों का समर्थन सोमनाथ भारती के साथ है। लेकिन क्या यह सही है?  क्योकि हर देश में, हर समाज में अच्छे-बुरे लोग रहते हैं । कई देशों में हमारे देश के लोगों की भी आलोचना होती है। दुर्भाग्य तो यह है कि हमारे देश में ही हमारे लोगों को पराया बनाया जाता है। बावजूद इसके हम 'वसुधैव कुटुम्बकम्' जैसे जुमलों से अपना मन बहलाते हैं। लेकिन सत्ता में बैठे लोग भी जब इस तरह से विदेशी मूल के लोगों के प्रति दुर्व्यवहार करेंगे तो क्या यह जायज है? एक अच्छे राजा का प्रजा को समानता की नजर से देखने का जो धर्म होता है, उसे निभाना ही चाहिए। लेकिन सोमनाथ भारती के साथ- साथ दिल्ली की 'आप' सरकार भी इस धर्म को निभाने में नाकामयाब रही है।
 सबसे अलग की छवि के साथ राजनीति में शानदार शुरुआत करने वाले 'आप' के नेताओं की ऐसी कई हरकतें सामने आई हैं, जिनकी उम्मीद 'आप' से नहीं थी। पहले ही 'आप' के कई नेता और मंत्री विवादित बयानों को लेकर दिल्ली पुलिस ही नहीं, जनता के निशाने पर भी आ चुके हैं। अब सवाल है कि केजरीवाल ने तो अपना धरना अपनी मांग पूरी हुए बिना ही खत्म कर दिया, लेकिन धरना खत्म होने की असली वजह क्या है ? असली वजह कुछ और ही है। इस धरने को लेकर खुद को अराजक कहने वाले केजरीवाल ने सबसे पहले दिल्ली के कुछ पुलिसवालों  को सस्पेंड करनी की मांग की थी। लेकिन बाद में उन्होंने इसमें ढील देते हुए कहा कि इन पुलिसवालों का तबादला कर दिया जाए। लेकिन केंद्र सरकार ने इनमें से कोई भी मांग नहीं मानी। तो ऐसे में क्यों न मान लिया जाए की केजरीवाल ने यह धरना जनता को गुमराह करने के लिए किया था।
क्योंकि यह सच है कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल हर मोर्चे पर फेल नजर आने लगे हैं। मसलन, अपने कहे अनुसार उन्होंने बिजली के दाम 50 प्रतिशत घटाएं जरूर लेकिन साथ ही बिजली के सप्लाई को भी घटाया है। उसी तरह पानी के साथ भी ऐसा ही हुआ है। यानि घोषणाएं तो बहुत कर चुके हैं लेकिन उन सब को अमली जामा पहनाने में वह अब भी नाकामयाब हैं।
तो ऐसे में यह मानना ही पड़ेगा कि केजरीवाल जनता को बेवकुफ बना रहे हैं। क्योंकि उनको पता है कि लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही चुनाव आचार संहिता का बहाना लेकर वह किसी भी तरह के जनहित के काम नहीं कर पाएंगे। तब तक शायद कांग्रेस समर्थन खिंचने की तैयारी भी कर ले।
वर्तमान में अरविंद केजरीवाल की जो छवि बनी है, उसके मुताबिक वह एक घमंडी, जिद्दी, उतावले, खुदगर्ज, लंपट और अराजक राजनेता लगते हैं। इनमें से एक अराजकता का तमगा तो उन्होंने खुद ही ले लिया है, मालूम हो कि केजरीवाल ने रेल भवन के पास शास्त्री पार्क में धरने के दौरान खुद को अराजकतावादी कहा था। देश के अन्य राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों से खुद को जोर देकर अलग बताने वाले केजरीवाल की छवि चंद महिनों में ही 'धूमिल' हुई है। जिसने जनता को एक बार फिर से उसी रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से उम्मीदों की 'आप' की शुरूआत हुई थी। उम्मीदों का इतनी जल्दी बिखर जाने से जनता नराज भी है और निराश भी। 
दिल्ली में 28 दिसंबर, 2013 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले तक अरविंद केजरीवाल की छवि एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और नेता के तौर पर लोगों के दिलों में जगह बना चुकी थी जिसमें लोग उन्हें जनता के हित के लिए लड़ते, भूख हड़ताल करते, पुलिस की लाठियां खाते, सड़कों पर दिन-रात बिताते, सोचने पर मजबूर करने वाली बातें करते हुए सुनने, देखने और पसंद करने के आदी बनते जा रहे थे। उनकी छवि एक ऐसे शख्स की थी जो समाज की हर बुराई से लड़ने को तैयार था। वह राजनीति, प्रशासन, नौकरशाही, न्यायपालिका, पुलिस में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। यह वही दौर था जब जन लोकपाल कानून की मांग कर रहे केजरीवाल सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए लड़ते दिखते थे। एक राजनेता के तौर पर लोगों को केजरीवाल से वही उम्मीदें थीं जो खुद केजरीवाल को बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं से थीं कि वे ईमानदार, कानून और नागरिकों के हक को सम्मान देने वाले और भारत के लोगों के दर्द और दिक्कतों को समझने वाले नेता बनें। लेकिन अब सब कुछ उल्टा हो गया है। अब केजरीवाल भी परंपरागत राजनीति करने वाले नेताओं की तरह कानून की अनदेखी करने वाले, विरोधियों को धमकाने और हड़काने वाले, देश की राजधानी में अराजकता फैलाने वाले, केंद्रीय गृह मंत्री के लिए अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करने वाले और गणतंत्र दिवस जैसे अहम और ऐतिहासिक आयोजन में बाधा डालते हुए दिखने और इस अवसर के बारे में आपत्तिजनक बातें करने वाले और अपने मंत्रियों को बचाने वाले, पारंपरिक नेताओं के बयानों को दुहराने वाले नेता बन गए हैं।
'आप' को है सलाह की ज़रूरत
दरअसल, आम आदमी पार्टी को अनुभव नहीं है और उन्हे लगता है कि वह सही है, किसी से सलाह लेने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन सच है कि आम आदमी पार्टी का संगठन नहीं है,  उसमें लोग मनमानी से बोलते हैं, उन्हें रोकने के लिए कोई नहीं है,  आपस में लोग लड़ रहे हैं, एक महीने में ही एक एमएलए असंतुष्ट हो गए और उसे  पार्टी से निकाल दिया गया, आम आदमी पार्टी में कुछ लोग हैं जो सलाह दे सकते हैं लेकिन सलाह देना एक अलग बात है और काम करना अलग। एक और ख़तरनाक बात है कि ये पता लगाना मुश्किल है कि जो लोग पार्टी में आ रहे हैं वो भ्रष्ट हैं या ईमानदार हैं। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता तो समझते हैं कि क्या करना है, केजरीवाल भी वरिष्ठ नौकरशाह हैं, वो जानते हैं कि सरकार कैसे चलती है, लेकिन यह जानना कि सरकार कैसे चलनी चाहिए और चलाना कैसे है, ये अलग बात है। जिसमें अब तक आम आदमी पार्टी नाकामयाब है। केजरीवाल को यह समझना होगा कि अब वह बात बात पर सड़क पर आ जाने वाले आम आदमी नहीं हैं, अब वह मुख्यमंत्री हैं। उनके पास सत्ता है, उनके पास शक्ति है। वह चाहते तो दिल्ली पुलिस के इस रवैया के खिलाफ अदालत भी जा सकते थें। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्हें तो अराजक बनना ही अच्छा लगा।

वामवाद के अनुसार 'क्रांति सतत चलने वाली प्रक्रिया है और असली विद्रोही वह है जो छह महीने बाद अपनी कुर्सी ख़ुद उलट दे।' तो क्यों न यह मान लिया जाए कि अरविंद केजरीवाल भी इसी राह पर चल रहे हैं। यानि कि अरविंद केजरीवाल के मंसूबे सही नहीं हैं। वह देश में एक नए तरह के वामवाद को लाना चाहते हैं, जो सत्ता को तहसनहस करना चाहता है। तभी तो अब तक सत्ता पाने के लिए बेचैन अरविंद अब खुद ही उसे ​बिखेरने में लगे हैं। अगर वह ऐसे ही करते रहें तो लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है, देश में भयानक अशांति फैल सकती है। लेकिन हमें यह विश्वास है कि अरविंद केजरीवाल के इस मंसूबे को जनता कामयाब नहीं होने देगी।


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