Sunday, 27 March 2016

तो सचिन से भी आगे निकल जायंगे विराट कोहली...


 वह एक दौर था जब सचिन तेंदुलकर क्रिकेट मैदान पर हों तो जीत तय मानी जाती थी लेकिन जीत के करीब लाकर आउट हों तो उन्हें गाली भी तय मानी जाती थी। दौर बदला, सचिन ने क्रिकेट को अलविदा कहा और शुरू हुई एक और सचिन की तलाश। अब वह तलाश विराट कोहली पर खत्म होती दिख रही है...

वह दिल्ली का बाशिंदा है, वह आक्रामकता और परफॉर्मेंस का अनूठा संगम है और उसे चुनौतियां का मुकाबला करना पसंद है। वह दबाव में बिखरता नहीं बल्कि निखर कर सामने आता है। उसमें द्रविड़ जैसा धैर्य है तो आक्रामकता सहवाग सी है। उसका खेल सचिन जैसा नैसर्गिक है और वह गांगुली की तरह आगे बढ़कर लीड करना जानता है। वह सिर्फ बल्ले से ही विपक्षी को जवाब नहीं देता है बल्कि अपने गुस्से से भी सबकी बोलती बंद कर देता है। वह भारत का टेस्ट टीम कप्तान है और उसके पास वह सब कुछ है जो एक 27 वर्षीय युवक केवल कल्पना ही कर सकता है। इतना सब हासिल करने के बावजूद खेल के प्रति उसकी लगन देखने लायक है। वह और कोई नहीं, विराट कोहली है। वह भारत की रन मशीन है। वह करोड़ों भारतीयों का विराट है।  विराट कोहली, यह शख्स पिछले कुछ सालों से क्रिकेट के मैदान में इस कदर छाया है कि अब उसके तूफान में ‘क्रिकेट के भगवान’ सचिन तेंदुलकर के रिकॉर्ड भी उड़ने या यूं कहें टूटने लगे हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि विराट कोहली क्रिकेट की दुनिया के नए सचिन तेंदुलकर हैं? शायद यह कहना जल्दबाजी या अतिशयोक्ति होगी लेकिन विश्वकप 2011 के फाइनल के बाद हुए जश्न में जिन लोगों ने विराट कोहली को देखा होगा, उन्हें याद होगा कि विराट ने सचिन को अपने कंधों पर बैठा लिया था। दरअसल, वह विराट का एक संकेत था।  उसमें कहीं न कहीं यह बात छिपी हुई थी कि अब आगे सचिन जैसे महान खिलाड़ी की विरासत को कंधों पर रख आगे बढ़ाने के लिए वह तैयार हैं। अब क्रिकेट प्रेमी से लेकर विशेषज्ञ तक भी यह मानने लगे हैं कि विराट कोहली आने वाले कल के सचिन हो सकते हैं। हालांकि इन दोनों में कई असमानताएं हैं। दोनों की शख्सियत जुदा है तो अंदाज भी अलग है। मिजाज और खेल की शैली की भी कोई तुलना नहीं है। जहां सचिन क्रिकेट के जैंटलमैन हैं तो विराट उद्दंड खिलाड़ी । लेकिन हां, जब दोनों अपनी लय में होते हैं तो लगता है जैसे वह किसी शोएब अख्तर या फिर डेल स्टेन के सामने नहीं खेल रहे हैं बल्कि किसी गली के कमजोर गेंदबाज की गेंद को स्प्रिंग लगी बैट से सीमा रेखा के बाहर पहुंचा रहें हो। जब शेष खिलाड़ी जूझ रहे होते हैं, तब वह मानों अतिरिक्त ऊर्जा की पूंजी के साथ गेंद को अपने बल्ले के बीचोबीच महसूस करते हैं। दोनों की बल्लेबाजी में  सकारात्मक सोच, स्थिरता, संतुलन, आक्रामकता, बहुआयामी रुझान और कलात्मकता का समायोजन देखने को मिल जाता है। इसके बावजूद कुछ जानकार मानते हैं कि विराट एक मायने में सचिन से बेहतर हैं। जानकारों का कहना है कि विराट अपने साथ ‘नर्वस एनर्जी’ लेकर मैदान पर नहीं आते। वहीं यह ‘एनर्जी’ सचिन के खेल का एक अनिवार्य हिस्सा रही है। वह सचिन से ज्यादा आत्मविश्वास से लबरेज दिखते हैं। जिन लोगों ने पिछले पच्चीस सालों का क्रिकेट देखा है, वह भी इस बात को बखूबी समझते हैं। सचिन को बल्लेबाजी करते देख प्रशंसक हमेशा भय और आशंका से ग्रस्त रहते थे कि किसी भी क्षण वह गेंद को हवा में खेलेंगे और आउट हो जाऐंगे या गिल्लियां उड़ जाएंगी लेकिन कोहली के साथ एक पॉजिटिव एनर्जी खेल में आती है। हो सकता है, यह उसकी आक्रामक शख्सियत का परिणाम हो लेकिन उनका यह प्रभाव ही विपक्षी को कमजोर कर देता है। कोहली का यह आत्मविश्वास ही है कि जब 2016 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ  वनडे सीरीज के पहले मैच में कोहली छक्का मारने के चक्कर में 91 रनों पर लपके गए थे तब वसीम अकरम ने कोहली से पूछा ,  ‘ये बताइए,  आपको ऐसा शॉट मारने की क्या जरूरत थी? आप तो शतक के बेहद करीब थे, आसानी से पूरा भी कर सकते थे। इस पर कोहली का जवाब था कि आप थोड़ा इंतजार कीजिए, मैं इस सीरीज में कम से कम दो शतक जरूर लगाऊंगा और उनका चार मैचों की उस सीरीज में स्कोर था: 91, 59, 117 और 106 रन। कोहली की शख्सियत इतनी बड़ी होने लगी है कि पूर्व क्रिकेटरों को भी उनमें सचिन की छाप नजर आती है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान माइकल क्लार्क और स्टीव वॉ ने कहा था कि कोहली को देखकर उन्हें सचिन की याद आती है। कुछ क्रिकेट जानकार सचिन को एक आर्टिस्ट के रूप में देखते हैं तो कोहली को एक फाइटर मानते हैं। यह भी सच है कि शांत सचिन की शख्सियत ही ऐसी थी कि उनके भय से विपक्षियों को नींद तक नहीं आती थी। महान लेग स्पिनर शेन वार्न और तेज गेंदबाज शोएब अख्तर जैसे दिग्गज कई दफा अपने डर का किस्सा सार्वजनिक कर चुके हैं।  24 साल के कैरियर में वे लगभग विवादमुक्त रहकर क्रिकेट खेलते रहे। वह मैदान में हों या उससे बाहर, उनका प्रदर्शन और व्यवहार सबके लिए आदर्श बना रहा। मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार सचिन के बारे में कहा था, ‘देश चाहता है कि सपूत हो तो तेंदुलकर जैसा, टीम चाहती है कि खिलाड़ी हो तो सचिन जैसा, माता-पिता चाहते हैं कि बेटा हो तो तेंदुलकर जैसा, गुरु चाहते हैं कि शिष्य हो तो तेंदुलकर जैसा और अब तो बेटा-बेटी चाहते हैं कि पापा हों तो तेंदुलकर जैसे।’ बहरहाल, सचिन अब इतिहास हैं और वर्तमान दौर विराट कोहली का है। प्रशंसकों के लिए सचिन हमेशा पहला प्यार बने रहेंगे लेकिन सच यह भी है कि अगर कोहली निरंतर ऐसा विराट प्रदर्शन करते रहे तो उनसे प्यार और गाढ़ा ही होता जाएगा।

कौन है विराट : सचिन या कोहली
आधुनिक युग के क्रिकेट में जब बल्लेबाजी की बात आती है तो सचिन तेंदुलकर वह पहला नाम है जो लोगों के जेहन में आता है। सचिन के चाहने वाले इसके अलावा कुछ और सुनना ही नहीं चाहते हैं लेकिन सचिन के रिकॉर्ड और बल्लेबाजी शैली को कोई तुलना दे रहा है तो वह है विराट कोहली। चूंकि क्रिकेट में आंकड़ों का बहुत महत्व होता है इसलिए तुलना होना भी लाजमी है। ऐसी तुलनाएं कई बार मजेदार होती हैं। दोनों के बीच तुलना की बात की जाए तो विराट ने अपने पहले 41 टेस्ट मैचों की 72 पारियों में चार बार नाबाद रहते हुए 2994 रन बनाए हैं। फिलहाल विराट का उच्चतम स्कोर 169 रन है। उनका बल्लेबाजी औसत 44.02 है। इस दौरान उन्होंने 11 शतक और 12 अर्धशतक लगाए हैं। वहीं अगर सचिन की बात की जाए तो उन्होंने अपने शुरुआती 41 टेस्ट मैचों की 60 पारियों में सात बार नॉट आउट रहते हुए 2911 रन बनाए थे। शुरुआती 41 मैचों में सचिन का उच्चतम स्कोर 179 था। उनका बल्लेबाजी औसत विराट से कहीं ज्यादा 54.92 था। सचिन ने इस दौरान 10 शतक और 14 अर्धशतक जड़े थे। बात अगर वनडे की जाए तो विराट ने अभी तक खेले 171 मैचों की 163 पारियों में 23 बार नॉट आउट रहते हुए 7212 रन बनाए हैं। वनडे क्रिकेट में विराट सबसे तेजी से 7000 रन बनाने वाले बल्लेबाज भी हैं।  इस दौरान विराट का बल्लेबाजी औसत 51.51 का रहा है। उन्होंने 25 शतक और 36 अर्धशतक लगाए हैं। उनका उच्चतम स्कोर 183 रन का रहा है। वहीं सचिन ने अपने पहले 171 वनडे मैचों की 166 पारियों में 16 बार नॉट आउट रहते हुए 5828 रन बनाए थे। सचिन का उच्चतम स्कोर 137 का रहा। इस दौरान सचिन का बल्लेबाजी औसत 38.85 का रहा था। उन्होंने 12 शतक और 36 अर्धशतक बनाए थे। टी 20 में बात करें तो विराट ने 40 मैच की 37 पारियों में 10 बार नाबाद रहे हैं और 1446 रन बनाए हैं। कोहली का बल्लेबाजी औसत 53.55 का है। विराट का स्ट्राइक रेट 32.41 है। जबकि सचिन की बात करें तो उन्होंने एकमात्र टी 20 मैच खेला है। इस मैच में उन्होंने 10 रन बनाए।  यहां एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि जहां विराट ने अपने कैरियर में अधिकतर नंबर तीन या चार पर बल्लेबाजी की है वहीं सचिन शुरुआती 70 से ज्यादा वनडे में पांचवें या छठे नंबर पर ही बल्लेबाजी करने आते थे। इसके अलावा दो अलग युग के बल्लेबाजों में केवल रनों के आधार पर तुलना करने से पहले गेंदबाजी, मैदान, खेल के नियम व अन्य कई परिस्थितियों का भी ख्याल रखना जरूरी है।

विज्ञापन वर्ल्ड में सचिन बनाम कोहली
सचिन जिस दौर में हीरो बन रहे थे इत्तेफाक से यह वही दौर था जब देश का बाजार दुनिया के लिए खुल रहा था। अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को यहां पैठ और पहचान बनाने के लिए अपने नायकों और प्रतीकों की जरूरत थी। सचिन के रूप में उन्हें ऐसा आदर्श मिला। बाजार ने क्रिकेट को हाथों-हाथ लिया और उसे अपनी जरूरतों के हिसाब से बदला भी। क्रिकेट देश का दूसरा धर्म बन गया और सचिन इसके देवता। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। उसी बाजार का क्रिकेट में हद से ज्यादा दखल हो गया है। नतीजा यह है कि अब बहुत-से लोग क्रिकेट को खेल की तरह नहीं बल्कि किसी तमाशे की तरह देख रहे हैं। बहुत-से लोग मानने लगे हैं कि खिलाड़ी गेंद और बल्ले से कविता रचने वाले देवता नहीं, महज पैसे के पीछे भागने वाले इंसान हैं और यहीं क्रिकेट का वह जादू टूट रहा है जो इसे जुनून और धर्म में बदलता है। यह बात सिर्फ खेल विशेषज्ञ नहीं कह रहे। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) भी इसे मानती है। 2011 में आई उसकी एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही है, खासकर वनडे और टेस्ट क्रिकेट की।  ऐसे दौर में विराट ने विज्ञापन की दुनिया में अपनी पहचान बनाई है। पेप्सी, मंच, रिबॉक, नाइके, एमआरएफ सहित तमाम बड़ी कंपनियों के साथ उनका करार है। कई विज्ञापनों की कमाई में विराट ने धोनी और सचिन को शिकस्त भी दे दी है। सोशल मीडिया पर भी विराट कोहली सचिन से आगे निकल चुके हैं । उनके फॉलोअर्स सचिन से कहीं ज्यादा हैं।  फोर्ब्स पत्रिका ने विराट को भी ब्रांड के रूप में देखा है।




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अनुष्का संग रहा ‘खूबसूरत’ रिश्ता
कहते हैं कि हर कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है लेकिन जब बात हो विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की तो मामला थोड़ा अलग हो जाता है। जब तक दोनों रिलेशनशिप में रहे विराट के हर खराब परफॉर्मेंस के लिए अनुष्का शर्मा को ही दोष दिया गया। बात चाहें 2014 में इंग्लैंड दौरे पर विराट के खराब प्रदर्शन की हो या फिर विश्वकप 2015 के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत की हार की हो, गालियां अनुष्का को ही पड़ीं। बावजूद इसके अनुष्का और विराट का प्यार कम नहीं हुआ। समय - समय पर विराट अपने ‘माय लव’ को फ्लाइंग किस देकर या हाथ मेें हाथ डालकर अपने प्यार के बारे में दुनिया को बताने से पीछे भी नहीं रहे। यहां तक की उन्होंने एक पत्रकार से अनुष्का के लिए लड़ाई भी कर ली। तो अनुष्का भी आलोचनाओं की परवाह न करते हुए विराट कोहली को चीयर्स करने के लिए स्टेडियम में पहुंचती रहीं। हालांकि पिछले कुछ दिनों से विराट और अनुष्का के बीच दरार की भी खबरें आ रही हैं। इस ब्रेकअप के कई कारण बताए जा रहे हैं। ब्रेकअप की वजहों को खंगालने से पहले इस जोड़ी की प्रेम कहानी पर एक नजर जरूरी है। विराट और अनुष्का की प्रेम कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। इन दोनों की पहली मुलाकात एक विज्ञापन की शूटिंग के दौरान हुई थी। क्रिकेट मैच के दौरान विराट बेहद गुस्सैल किस्म के इंसान लगते हैं। अनुष्का खुद फिल्मों में हैं लेकिन टीवी पर विराट को देख उनकी गुस्सैल छवि को ही विराट की असलियत मान बैठीं। शूटिंग के पहले अनुष्का को लगा कि एक अक्खड़ और तुनक मिजाज इंसान के साथ उन्हें काम करना है इसलिए उन्होंने भी जरूरत से ज्यादा ‘एटीट्यूड’ दिखाया। विज्ञापन शूट के शुरुआती दिनों में दोनों में कई बातों को लेकर असहमति रही लेकिन बाद में विराट को अनुष्का ने जैसा सोचा था उससे विपरीत पाया। अनुष्का के साथ विराट बेहद सौम्यता से पेश आए और संभव है कि विराट के इसी व्यवहार ने अनुष्का का दिल जीत लिया। फिर क्या था, इश्क परवाना चढ़ा और बात शादी तक पहुंच गई। ऐसी खबरें आती रहीं कि विराट शादी करना चाहती हैं लेकिन अनुष्का अभी कैरियर पर फोकस करना चाहते हैं। दरअसल, अनुष्का को यह बखूबी पता है कि अभिनेत्रियों का कैरियर शादी के बाद लगभग खत्म सा हो जाता है। यह भी सच है कि यशराज फिल्म्स के बैनर और शाहरुख खान जैसे सुपरस्टार के साथ अपना कैरियर आरंभ करने वाली अनुष्का अपने उम्मीदों के मुताबिक आगे नहीं गईं और नंबर वन की रेस में समकालीन अभिनेत्रियों से बहुत पीछे भी छूट गईं। वहीं कोहली का कद समय के साथ और भी विराट होता जा रहा है। संभवत: अनुष्का पर ‘मानवीय जलन’ भी हावी हो इसलिए उन्होंने शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। क्योंकि खबरें आती रहीं हैं कि कोहली की मां चाहती हैं कि उनके बेटे की शादी जल्द हो। ऐसे में अनुष्का द्वारा विराट के प्रस्ताव को झट से झटक देने से कहीं न कहीं उनके ‘इगो’ को भी चोट पहुंची है। अफवाहें यह भी हैं कि अनुष्का की फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट’ में विराट के 40 करोड़ रुपये लगे थे और यह फिल्म बुरी तरह पिट गई। इसके बाद विराट ने अपने पैसे अनुष्का से  मांग दिए जो उन्हें बुरा लगा और  बात ब्रेकअप तक पहुंच गई। खबर है कि फिर से अनुष्का शर्मा ने पैचअप की पहल की है।  बहरहाल , अनुष्का और विराट उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके लिए शादी से ज्यादा कैरियर महत्वपूर्ण है। उम्र अभी दोनों के पक्ष में हैं और शादी के पहले उन्हें बहुत कुछ पाना है, खासतौर पर अनुष्का को। फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि विराट अनुष्का की लव स्टोरी का अंत सुखद होगा।  

रोमांस की एक और कहानी
हॉलीवुड एक्ट्रेस इजाबेल लीट संग भी विराट के इश्क के चर्चे रहे। इजाबेल वह एक्ट्रेस हैं जिन्होंने अपने और क्रिकेटर विराट कोहली के संबंध का खुलासा किया था।  एक पत्रकार से बातचीत में उन्होंने माना था कि वह विराट के साथ दो साल तक रिलेशनशिप में थीं। गूगल पर आज भी कई तस्वीरें मौजूद हैं जिनमें विराट और इजाबेल एक साथ नजर आ रहे हैं। विराट से उनके अफेयर की खबरों ने उस वक्त जोर पकड़ा था जब कुछ तस्वीरों में दोनों सिंगापुर की सड़कों पर एक साथ घूमते नजर आए थे। इसके अलावा इंग्लैंड की एक महिला क्रिकेटर ने भी विराट कोहली को सार्वजनिक रूप से प्रपोज किया था। महिला क्रिकेटर ने ट्विटर पर विराट को आई लव यू कहा था।
   
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पूरा नाम  :  विराट प्रेम कोहली
निकनेम : चीकू
जन्म       :  5 नवंबर 1988
जन्मस्थान  : दिल्ली
पिता       : स्व. प्रेम कोहली (वकील )
माता       :  सरोज कोहली
दाएं हाथ के बल्लेबाज
दाएं हाथ के मध्यमगति के तेज गेंदबाज
भूमिका ः मध्यक्रम बल्लेबाज
टेस्ट कैरियर का आगाज ः  वेस्टइंडीज, किंग्‍स्टन (जून, 2011)
वनडे कैरियर का आगाज ः श्रीलंका, दांबुला (अगस्त, 2008)
‌टी 20 कैरियर का आगाज ः जिम्बाब्वे, हरारे (जून, 2010)
अन्य टीमें ः दिल्ली, इंडिया रेड, अंडर 19, रायल चैलेंजर्स बंगलोर     
कप्तान ः भारतीय टेस्ट टीम, रॉयल चैलेंजर्स बंगलोर

टेस्ट में कोहली
स्‍थान     मैच    रन    औसत    शतक    अर्धशकत    सवोऱ्च्च
भारत    17     1059     46.04     3     7     107
विदेश     24     1935     43.00     8     5     169

वनडे
स्‍थान     मैच    रन    औसत    शतक    पचास    सवोऱ्च्च
भारत    63     2844     54.69     10     16     139*
विदेश     72     2885     47.29     11     13     136
अन्य देश    36     1483     54.92     4     7     183

2010 में सबसे ज्यादा वनडे रन बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर
2011 में दुनिया के सबसे ज्यादा वनडे रन बनाने वाले क्रिकेटर
2012 में सबसे ज्यादा वनडे रन बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर
2013 में सबसे ज्यादा वनडे रन बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर
2014 में सबसे ज्यादा वनडे रन बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर
 2012 में सबसे ज्यादा टेस्ट  रन बनाने वाले भारतीय क्रिकेटर 

वनडे में सबसे तेज 1000 रन बनाने वाले पहले भारतीय
वनडे में सबसे तेज 4000 रन बनाने वाले पहले भारतीय, विश्व के तीसरे
वनडे में सबसे तेज 5000 रन बनाने वाले पहले भारतीय, विश्व के दूसरे
वनडे में सबसे तेज 6000 रन बनाने वाले पहले भारतीय, विश्व के दूसरे
वनडे में सबसे तेज 7000 रन बनाने वाले वैश्विक खिलाड़ी
वनडे में सबसे तेज 10 शतक लगाने वाले पहले भारतीय, विश्व के दूसरे
वनडे में सबसे तेज 15 शतक लगाने वाले पहले भारतीय, विश्व के दूसरे
वनडे में सबसे तेज 20 शतक लगाने वाले पहले भारतीय, विश्व के दूसरे
वनडे में सबसे तेज 25 शतक लगाने वाले विश्व के पहले क्रिकेटर
टेस्ट में सबसे तेज 1000 रन बनाने वाले विश्व के पहले क्रिकेटर
वनडे में सबसे तेज 52 गेंदों में शतक लगाने वाले भारतीय क्रिकेटर
विश्व कप के पहले ही मैच में शतक जमाने वाले पहले भारतीय
- दुनिया के इकलौते कप्तान हैं, जिन्होंने टेस्ट में कप्तानी करते हुए अपनी पहली तीन पारियों में ही शतक ठोंके हैं

21 बार वनडे में मैन ऑफ द मैच चुने गए हैं कोहली
03 बार वनडे में मैन ऑफ द सीरीज चुने गए हैं
02 बार टेस्ट में मैन ऑफ द मैच चुने गए हैं कोहली
08 बार टी 20 में मैन ऑफ द मैच चुने गए हैं
03 बार टी 20 में मैन ऑफ द सीरीज चुने गए हैं

पुरस्कार
2012 में आईसीसी वनडे क्रिकेट ऑफ द ईयर चुने गए
2011-12, 2014-15 में बीसीसीआई पॉली उमर अवार्ड हासिल किया
2013 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित
2011-12, 2019-14 में सिएट इंटरनेशनल क्रिकेटर ऑफ द ईयर
2012  और  2014 में आईसीसी वर्ल्ड इलेवन टीम में शामिल     

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विराट

टैटू गुदवाने के शौकीन हैं विराट
कोहली को टैटू गुदवाने का बेहद शौक है। वह अब तक चार टैटू अपने शरीर पर गुदवा चुके हैं। उनका पसंदीदा टैटू गोल्डन ड्रैगन है जो उन्होंने अपनी बांह पर गुदवा रखा है। कोहली के मुताबिक यह टैटू अच्छे लक का रास्ता है। कोहली अपने फैशन सेंस के लिए भी जाने जाते हैं। उनका नाम 10 बेहतरीन कपड़े पहनने वाले आदमियों में शामिल हैं। इस सूची में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का नाम भी शामिल हैं। अभी वह एक दर्जन से भी ज्यादा ब्रांड के लिए प्रचार करते हैं। विराट उस खास क्लब में भी शामिल हैं जिसमें 100 करोड़ रुपये से ज्यादा के ब्रांड का प्रचार करने वाले खिलाड़ी शामिल होते हैं।  कोहली लड़कियों में खासे लोकप्रिय हैं। उन्हें कई लड़कियां खून से खत लिख चुकी हैं। यह कोहली के प्रति दीवानगी को बयां करने के लिए काफी है। कोहली चैरिटी में भी काफी आगे हैं। वह अपने नाम से गरीब बच्चों के लिए एक संस्था चलाते हैं। इस संस्था का नाम विराट कोहली फाउंडेशन है।  कोहली केवल क्रिकेट को लेकर पैशनेट नहीं हैं बल्कि वह फुटबॉल को भी काफी पसंद करते हैं। कोहली देश में फुटबॉल को बढ़ावा देने वाली इंडियन सुपर लीग की टीम एफसी गोवा के सह मालिक भी हैं। कोहली पुर्तगाल और स्पेनिश क्लब रियाल मैड्रिड के स्टार स्ट्राइकर रोनाल्डो के बहुत बड़े प्रशंसक है।

नेहरा का कोहली कनेक्शन
कहते हैं समय बदलते देर नहीं लगती। कुछ ऐसा ही विराट कोहली के साथ हुआ। एक समय था जब स्कूली स्तर पर शानदार प्रदर्शन करने के लिए भारतीय टीम के स्टार गेंदबाज आशीष नेहरा ने उन्हें पुरस्कृत किया था। नेहरा तब तक स्टार बन चुके थे और विराट लाइन में थे। एक वह समय भी आया जब विराट कोहली की कप्तानी में आशीष नेहरा चैलेंजर सीरीज 2013 में खेले। कोहली, नेहरा से लगभग10 साल छोटे हैं। आशीष नेहरा और विराट कोहली एक साथ रणजी ट्रॉफी में दिल्ली की ओर से भी खेले।



विराट और विवाद

ऑस्ट्रेलिया के मैदान पर दिखाई उंगली: ऑस्ट्रेलियाई टीम को स्लेजिंग के लिए जाना जाता है और वह उनके खेल का हिस्सा भी है। ऑस्ट्रेलिया टीम के अलावा वहां के दर्शक भी कई बार मैदान पर खड़े विपक्षी टीम के खिलाडियों के साथ अभद्र मजाक करते हैं। लेकिन  कोहली भी अग्रेशन के मामले में कहीं से पीछे नहीं है। इसके चलते 2012 में उन्होंने सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर खेले जा रहे टेस्ट मैच के दौरान मैदान पर अपनी मिडिल फिंगर उठा दी थी। इसके अलावा मैदान पर वह जेम्स फॉक्नर को भी लताड़ लगा चुके हैं।

गंभीर-कोहली की लड़ाई: विराट कोहली हमेशा से ही अपने गुस्से और ज्यादा आक्रामक्ता के चलते फील्ड पर हाइपर हो जाते हैं। 2013 में खेले गए आईपीएल के छठे संस्करण के दौरान आरसीबी और केकेआर के बीच खेले गए मैच में विराट कोहली टीम इंडिया के ही खिलाड़ी गौतम गंभीर से भिड़ गए थे। दो छक्के लगाने के बाद कोहली आउट हो गए थे, जिसके चलते वे इतने गुस्से में आ गए कि, विकेट लेने की खुशी में जश्न मना रहे केकेआर के कप्तान गौतम गंभीर से उलझ पड़े। कोहली की इस हरकत के चलते उनकी कड़ी अलोचनाएं भी हुईं।

अंपायर से उलझ गए : अभी तक मैदान पर दर्शकों और खिलाडियों से भिड़ने वाले विराट कोहली को 2013 में जिम्बाब्‍वे के दौरे पर धोनी की अनुपस्थिती टीम की कमान सौंपी गई थी। मैच में सारी चीजें टीम इंडिया के हक में थीं, लेकिन तभी कोहली ने एक बार फिर नया विवाद खड़ा करने की ठान ली। कोहली कैच आउट हो गए, लेकिन वे अंपायर के फैसले से सहमत नहीं थे, इसके चलते उन्होंने रिव्यू लिया, लेकिन रिव्यू में भी उन्हें आउट ही करार दिया गया। जिसके बाद कोहली दोनों अंपायरों से भिड़ गए।

धवन-कोहली विवाद: 2014 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई टीम इंडिया पूरी सीरीज में एक जीत हासिल करने के लिए तरस गई। ऎसे में माहौल ना सिर्फ मैदान पर खराब दिखा बल्कि टीम के ड्रेसिंग रूम में भी खिलाड़ी एक दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आए। ब्रिस्बेन में खेले जा रहे टेस्ट मैच में शिखर धवन को मैच के चौथे दिन पारी की शुरूआत करनी थी, लेकिन प्रेक्टिस सेशन के दौरान चोट लग जाने के कारण वो पारी की शुरूआत करने नहीं जा सके। जिसके चलते विराट को नई गेंद का सामना करने जाना पड़ा और वे जल्द आउट होकर पवैलियन लौट आए। सूत्रों के मुताबिक इसको लेकर कोहली ने धवन पर आरोप लगाया था कि उनकी इंजरी फर्जी है। जिसके जवाब में शिखर धवन ने कहा था कि, मुझे अपने देश के लिए खेलने पर गर्व है। अगर मेरा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है, तो मैं खुद बाहर बैठने को तैयार हूं। लेकिन कभी फर्जी इंजरी का बहाना नहीं करूंगा।


कोहली-पत्रकार विवाद: विराट कोहली ने वर्ल्ड कप 2015 में वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेले जाने वाले मैच से पहले प्रेक्टिस सेशन से लौटते वक्त अपना आपा खो दिया था और एक पत्रकार के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था। अचानक भड़के कोहली को देखकर पत्रकार शॉक्ड रह गया था। उसे अपनी गलती समझ में नहीं आ रही थी। पता चला कि किसी पत्रकार ने पहले विराट और उनकी गर्लफ्रेंड अनुष्का को लेकर कोई खबर लिखी थी जिसको लेकर विराट कोहली नाराज थे। लेकिन जब विराट को पता चला कि उनसे पत्रकार को पहचनाने में भूल हुई हैं तो उन्होंने उस पत्रकार से माफी भी मांग ली थी।




 

Sunday, 21 February 2016

चलो नकाब तो उतरा...


विलंब के लिए खेद है लेकिन अब जब समय मिला है तो मैं अपने अंदर की चिंगारी को भी एक लिखित रूप दे रहा हूं। पिछले कुछ समय से जेएनयू में देश विरोधी नारे को लेकर जो कुछ कहा जा रहा है और जो कुछ गढ़ा जा रहा है उसने बेहद हैरान हूं। दरअसल, इस घटना ने पहली बार दुनिया के सबसे मजबूत और बड़े लोकतंत्र को विखंडित कर दिया है। संभवतः पहली बार ऐसा हुआ है जब बुद्घजििवी वर्ग के हर सूरमें अपनी अपनी राग अलाप रह‌े हैं।  यह सच है कि सबको अपने अपने पूर्वाग्रह निष्पक्ष लगते हैं लेकिन सवाल है कि क्या निष्पक्षता की आड़ में हम अपनी विचारधारा तो नहीं थोप रहे हैं क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ ह‌ै जब दोषियों को सजा दिलाने वाले न्याय के मंदिर में याचक को जाने से पहले सीढ़ियों पर ही इंसाफ कर रहे हैं तो पत्रकारिता के मुखर आवाज बन चुके पत्रकार जेएनयू मुद्दे के जरिए अपनी विचारधारा की व्याख्या करने में लगे हैं। चाहें पक्ष कोई भी हो सभी के अपने तर्क हैं और उस कमजोर तर्क में भी दर्शकों और पाठकों को दम लगता है। सही और गलत का पहचान दिलाने वाले शिक्षक या प्रोफेसर भी बुद्घिजीविता में अपना बौद्घिक ज्ञान दे रहे हैं। शिक्षा के मंदिर को तमाशा बनाने की कोशिश हो रही है। शिक्षक पाठ्यक्रम से न मतलब रखकर छात्रों को अपने वैचारिक रंग में रंगने में लगे हैं। यह वैचारिक रंग उस दिमाग में गाढ़ी हो जाती है जहां पहले ही खोखलापन है। तो ऐसे में अब क्यों न यह मान लिया जाए कि जेएनयू प्रकरण के बाद पहली बार समाज का हर वर्ग विखंडित है और हर विखंडन में अब तक की छुपी हुई उसकी सच्चाई बाहर आ गई है। मैं यह कभी नहीं कहता कि किसी की कोई विचारधारा नहीं होनी चाहिए। विचारधारा तो सबके होते हैं और होने भी जरूरी हैं। बिना विचारधारा के व्यक्ति का वजूद भी कठघरे में रहता है। लेकिन इन सब के बीच हमें यह तय करना होगा कि जब हम किसी बौद्घिक वर्ग में शामिल हो जाते हैं या यूं कहें की कर दिए जाते हैं तो क्या उस विचारधारा को थोपने की आजादी मिल जाती है? सवाल यह नहीं है कि कौन किसका समर्थक या भक्त है। सवाल यह है कि क्या वकील, प्रोफेसर, पत्रकार भी अब राजनेताओं की श्रेणी में आने लगे हैं। क्या अब तक मजबूत लोकतंत्र का दंभ भरने वाला यह देश त्रासदी की ओर जा रहा है। हम क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी को निष्पक्ष ढंग से अपनाने की कोशिश करते हैं। क्या हम टीवी स्क्रीन को 'ब्लैक' कर के क्रांति की मशाल के लिए चिंगारी पैदा कर सकते हैं? अगर हमने 'ब्लैक फ्राइडे' की शुरुआत कर दी है तो सिर्फ उसके लिए एक ही मुद्दा क्यों अहम हो जाता है? और अगर आप एक ब्लैक फ्राइडे की बजाए 'ब्लैक डे' नहीं मना सकते हैं तो यहीं से सवाल खड़े हो जाते हैं। बहरहाल, इस भीड़ और शोर में बात तो दब ही गई है। आखिर हम भटक क्यों रहे हैं? क्या अब भी कोई आगे आकर यह नहीं बोलेगा कि जेएनयू में जो हुआ वह गलत था। कन्हैया की गिरफ्तारी को हम इसलिए गलत क्यों कहेंगे कि उसने देशविरोधी नारे नहीं लगाए। क्या बतौर अध्यक्ष कन्हैया की जिम्मेदारियां नहीं होती हैं? क्या उसको कल्चरल प्रोग्राम के नाम पर देशद्रोही आवाजों की पहचान नहीं थी? अगर नहीं थी तो ऐसे अध्यक्ष की नाकामी को यह दर्शाता है। जो भी हो इस कन्फ्यूजन भरे माहौल में अब तय आपको करना है कि कौन सही है और कौन गलत ? हो सकता है आपकी विचारधारा और मीडिया का दबाव आप पर हावी होने की कोशिश करे लेकिन इन सबसे बचने के लिए एक डिस्प्रीन की गोली खा लीजिए और उठाईए इस माहौल में नाटक करने वाले नौटंकियों का लुत्फ.....   दीपक कुमार  deepak841226@gmail.com

Monday, 15 February 2016

मोहब्बत का ये कैसा दस्तूर- पहले कहा प्यार है फिर कहा बलात्कार है

गया वो जमाना जब फिल्मों में किसिंग सीन दिखाने के लिए फूलों का सहारा लिया जाता था, अब शुद्घ देसी रोमांस का दौरा है। नई पीढ़ी व्यावहारिक हो चली है। प्रेम और सेक्स दो अलग - अलग चीजें नहीं हैं। हम स्वीकारें या न स्वीकारें यही इस दौर की सच्चाई है । लेकिन एक - दो साल या इससे ज्यादा भी किसी रिश्ते में रहने के बाद लड़की अचानक बलात्कार का आरोप लगाए तो सवाल खड़े होते ही हैं। कानूनी और सामाजिक दोनों पहलुओं से प्रेम का यह नया चलन विचार की मांग कर रहा है। खासकर आज वेलेंटाइन डे के मौके पर इसकी प्रासंगिकता कहीं ज्यादा हो जाती है।      




साल 2014 के सितंबर का महीना था। भारतीय हॉकी टीम एशिया कप में गोल्ड मेडल जीतकर स्वेदश लौटी थी। दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर टीम का भव्य स्वागत हुआ। इसी दौरान गले में मेडल पहने कप्तान सरदार सिंह संग एयरपोर्ट पर एक अनजान सी लड़की मुस्कुराते हुए दिखी। संभवतः देश ने इसी दिन पहली बार उस लड़की को सरदार सिंह की प्रेमिका और मंगेतर के रूप में देखा। इस रिश्ते को इन दोनों की समय - समय पर आई रोमांटिक तस्वीरों और सरदार के बयानों से मुहर लगी लेकिन पिछले कुछ समय से हम मीडिया में उन खुशनुमा तस्वीरों के साथ ही इस प्रकरण का कड़वा क्लाइमेक्स भी देख रहे हैं।  दरअसल, सरदार पर उसी लड़की ने बलात्कार से लेकर जबरन गर्भपात कराने तक के आरोप लगा दिए हैं। अब सरदार लगातार सफाई देने में जुट गए हैं कि वह मंगेतर नहीं दोस्त है। बहरहाल, सच क्या है यह जांच का विषय है लेकिन क्या इसे बलात्कार की संज्ञा दी जा सकती है? क्या लगभग तीन साल तक बतौर प्रेमी- प्रेमिका एक साथ रहने के बाद कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका का बलात्कार कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक अगर दो वयस्क व्यक्ति आपसी रजामंदी से शादी के बगैर साथ रहते हैं और संबंध बनाते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह अपराध नहीं है। साथ रहना जीवन का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो शादी से पहले सेक्स संबंध की मनाही करता हो। कोर्ट के मुताबिक अगर बिना शादी किए कोई जोड़ा एक साथ पति-पत्नी की तरह रहा है तो दोनों कानूनी रूप से शादीशुदा माने जाएंगे। लेकिन पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिससे कोर्ट भी परेशान है। वैसे तो दो लोगों के बीच के प्रेम प्रसंग में निश्चित रूप से कोर्ट की दिलचस्पी नहीं रही है लेकिन न्यायाधीश ऐसे मामलों में असमंजस में रहते हैं। 27 जून, 2014 को सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और एस.के. सिंह ने एक सुनवाई के दौरान कहा था, ' इट इज नॉट क्यूपिड बट स्टुपिड' यानी यह प्रेम नहीं बेवकूफी है। न्यायाधीश ऐसे केस की सुनवाई कर रहे थे जिसमें एक पूर्व एअर होस्टेस और एक बैंकर तीन साल तक प्रेम और लिव इन रिलेशन में रहने के बाद अदालत में बलात्कारी और बलात्कार पीड़ित के रूप में आमने-सामने थे। लड़की का कहना था कि शादी के वादे के बिना वह यौन संबंध कभी नहीं बनाती। वहीं बैंकर का जवाब था कि लड़की अच्छी तरह से जानती थी कि मैं पहले से शादीशुदा हूं। न्यायाधीशों ने उन दोनों को एक-दूसरे की अश्लील तस्वीरें खींचकर अदालत में दिखाने के लिए फटकार लगाई। कोर्ट की टिप्प्णी थी कि आगे ऐसे और भी मामले हमारे सामने आ सकते हैं। ऐसे कई मामले सामने आए भी। इसी में एक मामला बॉलीवुड अभिनेत्री प्रिटी जिंटा से भी जुड़ा। पिछले साल आईपीएल टीम किंग्स इलेवन पंजाब की को-ओनर प्रीति जिंटा ने टीम के अन्य को-ओनर नेस वाडिया पर उनसे बदसलूकी और गलत व्यवहार का आरोप लगाया। इस बारे में बकायदा पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराई गई। यहां यह बताना जरूरी है कि नेस और ‌प्रिटी के बीच करीब दस साल से एक 'खास' रिश्ता था। इस रिश्ते को लेकर दोनों बेहद गंभीर भी थे लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि वाडिया कानून की नजर में 'छिछोरे' बन गए।  तो यहीं से यह सवाल मौजूं हो जाता है कि क्या इस दौर में प्यार की परिभाषा बदल गई है या फिर इसका नाम "अहंकार', "बदले की भावना', "ब्लैकमेलिंग' और 'पैसे वाला लव' हो चला है।  कुछ साल पहले की ही बात है दिल्ली में नौकरी मिलने के बाद साथ काम करने वाले एक लड़के और लड़की ने साथ रहने का फैसला किया। लगभग तीन साल तक साथ रहने के बाद लड़का अचानक गायब हो गया और उसने अपना फोन भी स्विच ऑफ कर लिया। लड़की ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि न केवल लड़के ने शादी का वादा करके उससे साथ शारीरिक संबंध बनाए बल्कि पैसे भी उधार लिए। उसने पुलिस में इस बात की भी शिकायत की कि लड़के की बहन और उसकी मां ने भी फ्लैट में आकर उसके साथ मारपीट की। रिपोर्ट के आधार पर लड़का, उसकी मां और बहन को गिरफ्तार कर लिया गया। जब मामला कोर्ट में पहुंचा तो लड़की पुलिस में की गई शिकायत के अनुसार बयान देने के लिए सामने नहीं आई और न ही उसने अपने साथ बने शारीरिक संबंध या मारपीट के बारे में सबूत पेश किए। कोर्ट ने लड़की की रिपोर्ट को प्रेमी को वापस पाने और मोटी रकम लेने की एक कोशिश भर करार दिया और सभी को बरी कर दिया। इस दौरान कोर्ट ने पुलिस को भी कड़ी फटकार भी लगाई। ऐसा ही एक प्रकरण साल 2003 में आया था। जब लिव इन में रह रही एक युवती ने शादी का झांसा देकर करीब छह साल पुराने प्रेमी पर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। शीर्ष अदालत ने शख्स को बरी कर दिया क्योंकि अदालत का मानना था कि 'जब दो लोग प्रेम और रोमांस में डूबे हों तो शादी का वादा बहुत मायने नहीं रखता।' दरअसल, वर्तमान में प्यार भी भोग विलास की चीज हो चली है। वर्तमान में युवा लगातार प्यार की परिभाषा को अपने हिसाब से गढ़ रहे हैं। तभी तो प्यार के दिन के लिए जिस वेलेंटाइन डे को जाना जाता था वह अब प्यार से ज्यादा महंगे गिफ्ट्स के आदान प्रदान के लिए जाना जाने लगा है यानी की रिश्तों में प्यार से ज्यादा दिखावट और मार्केट ने अपनी जगह बना ली है। अब प्रेमिकाओं को प्रेमी का सिर्फ साथ नहीं बल्कि साथ के साथ साथ महंगे रेस्तरां में लंच और महंगे गिफ्ट्स चाहिए होते हैं वही दूसरी और प्रेमी को प्रेमिका की प्यार भरी बातें ही नहीं बल्कि बातों के साथ कुछ खास लम्हें भी चाहिए।  अब तो एक साल भी आपके प्यार की कहानी चल जाए तो वह किसी अजूबे से कम नहीं होगा। जहां पहले प्यार में टूटे दिल से कविता और शायरी निकलती थी वहीं अब प्यार में धोखा खाया दिल में बदले की भावना के बीज उपजते हैं और आए दिन हमें प्रेमी-प्रेमिका से जुड़ी घटनाओं वाले अपराधिक समाचार सुनने को मिलते हैं।  बहरहाल, प्यार में पवित्रता बरकरार रखना कोर्ट का काम नहीं है बल्कि उन  प्रेमी जोड़ाां का ही काम है जो जुड़ने से पहले जांच परख करने से कतराते हैं।      


बॉलीवुड में नहीं होता बलात्कार
लिव - इन रिलेशनशिप में रहकर आसानी से बच निकलने में बॉलीवुड माहिर है। यहां न तो 'बलात्कार' और न ही 'शादी का झांसा' देने जैसे मामले आते हैं। बॉलीवुड में लिव इन रिलेशनशिप की बात हो तो सबसे पहले नाम कैटरीना कैफ और रणबीर कपूर का सामने आता है। रणबीर और कैट की जोड़ी लंबे समय तक लिव इन में रही। हाल ही में दोनों अलग हुए है।  अब बात जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु की करते हैं। ये दोनों लंबे समय से साथ-साथ रह रहे हैं। जॉन-बिपाशा ने कभी भी अपने रिलेशनशिप को छुपाया भी नहीं लेकिन जब अलग होने जैसे हालात बने तो दोनों ह‌ी चुपके से निकल लिए। बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना भी टीना मुनीम संग लिव इन में रहे । राजेश खन्ना के अनीता आडवाणी संग भी लिव इन में रहने की खबरें आती रहीं। जीनत अमान और संजय खान भी एक दूसरे को परखने के लिए कुछ दिन लिव इन में रहे लेकिन मौका मिलते भी अलग भी हो लिए। लिव इन में रहने वालों में नीना गुप्ता का भी नाम आता है। वह वेस्टइंडीज के क्रिकेटर विव रिचडर्स के साथ रिलेशन में रहीं। वहीं क्रिकेटर विराट कोहली और अनुष्का शर्मा भी लिव इन में रहने की तैयारी में थे लेकिन अफसोस उससे पहले ही दोनों का ब्रेकअप हो गया। संजय दत्त शादी से पहले अपनी पत्नी मान्यता दत्त के साथ लिव इन में ही रहते थे। अर्चना पूरन सिंह और परमीत सेठी शादी से पहले कई साल तक एक दूसरे के साथ एक ही घर में रहते थे। अपने बोल्ड स्टेटमेंट्स और बिंदास लाइफस्टाइल के लिए पूर्व मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन भी कम मशहूर नहीं हैं। पहले तो एक बच्ची को गोद लेकर और अब अपने बॉयफ्रेंड रणदीप हुड्डा को लेकर। लेकिन इनका लिव इन ज्यादा दिन नहीं टिका और दोनों अलग हो गए। एक औरर ब्यूटीक्वीन और अभिनेत्री लारा दत्ता भी खुल्लम खुल्ला प्यार करने में यकीन रखती हैं। लारा का अपने बॉयफ्रेंड केली डॉर्जी के साथ कुछ ऐसा ही रिश्ता रहा ये अलग बात है कि वो भी अब साथ नहीं हैं। सत्या के भिखू म्हात्रे  मनोज वाजपेयी और उनकी बीबी नेहा ने भी शादी से पहले कई साल साथ रहकर एक दूसरे को जांचा परखा। करीना कपूर और सैफ अली खान भी लिव इन को शादी के अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब रहे। 


टीवी स्टारों का लिव-इन रिलेशनशिप
फिल्मों में तो लिव इव रिलेशन्स की भरमार है लेकिन टीवी भी कही पीछे नहीं है। सबसे पहले बात टीवी क्वीन राखी सावंत की। अपने पुराने प्रेमी अभिषेक के साथ वो एक अरसे तक लिव इन रहीं। दोनों साथ रहते थे और उन्होंने इसका एलान भी कर रखा था। इसके बाद तो टीवी के एक रियालिटी शो में पांच जोड़ियां लिव इन रिलेशनशिप के तहत तीन महीने साथ थे। शादी के इरादे से यहां भी आईं राखी सावंत ने अपने मंगेतर इलेश परुजनवाला को छोड़ दिया उन्हें ये रिश्ता पसंद नहीं आया यानी दोबारा उनका लिव इन फेल हो गया। लेकिन इसी सीरियल की एक और जोड़ी गुरमीत-देबिना ने शादी करने का फैसला कर लिया। अपने छह साल पुराने रिश्ते को आखिरकार गुरमीत-देबिना ने मंजिल तक पहुंचाने का फैसला कर लिया है। ये जोड़ी रामायण और पति-पत्नी और वो में एक साथ नजर आ चुके हैं। वैसे टीवी की एक और हिट जोड़ी कश्मीरा शाह और कृष्णा भी अरसे से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं। ऐसे ही कई नाम लिव इन रिलेशनशिप के लिए जाने-जाने जाते हैं।



यह है रेप की परिभाषा
भारतीय दंड संहित की धारा-375 में रेप को परिभाषित किया गया है। अगर किसी महिला के साथ कोई पुरुष जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो वह रेप होगा। महिला के साथ किया गया यौनाचार या दुराचार दोनों ही रेप के दायरे में होगा। महिला के शरीर के किसी भी हिस्से में अगर पुरुष अपना प्राइवेट पार्ट डालता है तो वह भी रेप के दायरे में होगा।  महिला के प्राइवेट पार्ट में अगर पुरुष अपने शरीर का कोई भी हिस्सा या कोई भी ऑब्जेक्ट डालता है तो वह भी रेप ही माना जाएगा। महिला के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए उसके कपड़े उतारना या बिना उतारे ही उसे संबंध बनाने के लिए पोजिशन में लाया जाता तो वह भी रेप के दायरे में होगा। 

नाबालिग की 'सहमति' भी सहमति नहीं
नाबालिग लड़की की सहमति को सहमति नहीं माना जाएगा।  अगर कोई शख्स किसी महिला को डरा कर सहमति ली हो या उसके किसी नजदीकी को जान की धमकी देकर सहमति ली गई हो तो भी वह सहमति नहीं मानी जाएगी और ऐसा संबंध रेप होगा।  महिला ने अगर यह समझते हुए सहमति दी है कि आरोपी उसका पति है या भविष्य में उसका पति बन जाएगा, जबकि आरोपी उसका पति नहीं है तो भी ऐसी सहमति से बनाया गया संबंध रेप होगा। यानी समाज के सामने शादी करने का वादा, घर या मंदिर में चुपचाप मांग में सिंदूर भर देना या वरमाला पहनाकर खुद को पति बताने का झांसा दे कर बनाया गया संबंध भी रेप के दायरे में होगा। जब महिला की सहमति ली गई, उस वक्त उसकी दिमागी हालात ठीक नहीं हो या फिर उसे बेहोश करके या नशे की हालत में सहमति ली गई हो या फिर उस हालत में संबंध बनाए गए हों तो वह सहमति भी सहमति नहीं मानी जाएगी।

उम्र का अहम रोल
रेप के केस में पीड़िता की उम्र को साबित करना केस को किसी भी मुकाम पर पहुंचाने के लिए बहुत जरूरी है।  10वीं के शैक्षणिक दस्तावेज में लिखी उम्र सबसे बड़ा सबूत है। अगर 10वीं का सर्टिफिकेट मौजूद नहीं है तो पढ़ाई की शुरुआत के वक्त स्कूल आदि में लिखाई गई उसकी उम्र का सर्टिफिकेट।  वह भी न हो तो कॉर्पोरेशन व पंचायत आदि का सर्टिफिकेट मान्य होता है। इन तीनों के न होने पर बोन एज टेस्ट कराया जाता है। बोन एज टेस्ट से किसी लड़की की उम्र को सटीक नहीं आंका जा सकता। अगर लड़की की उम्र 16 साल बताई गई हो तब बोन एज टेस्ट से उसकी उम्र 14 से लेकर 18 साल तक आंकी जा सकती है। ऐसे में लड़की की उम्र को 18 साल माना जाता है और उसे बालिग करार दिया जा सकता है।  कानून के मुताबिक जो लड़की बालिग है, वह शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमति दे सकती है और तब वह रेप नहीं माना जाएगा।

लड़की का बयान ही काफी
रेप और छेड़छाड़ के मामले में लड़की का बयान अहम सबूत है। अगर बयान पुख्ता है और उसमें कोई विरोधाभास नहीं है तो किसी दूसरे अहम सबूत की जरूरत नहीं है। ऐसे मामले में शिकायत के बाद पुलिस को अधिकार है कि वह आरोपी को गिरफ्तार कर ले।  चाहे मामला रेप का हो या फिर छेड़छाड़ या सेक्शुअल असॉल्ट (महिला के शरीर के खास अंगों को छूना या छूने की कोशिश करना) का, दोनों ही सूरत में अपराध साबित करने का भार शिकायती पक्ष पर ही होता है।  मामला रेप का हो छेड़छाड़ या सेक्शुअल असॉल्ट का, ये तमाम मामले महिलाओं के खिलाफ किए गए अपराध हैं और ऐसे मामले संज्ञेय अपराध (जिसमें गिरफ्तार किया जा सके) के दायरे में आते हैं।  संज्ञेय अपराध का मतलब है कि अगर पुलिस को इन अपराध के होने की कहीं से भी जानकारी मिले तो वह ऐसे मामले में एफआईआर दर्ज कर सकती है। शिकायती अगर सीधे थाने में शिकायत करे तो पुलिस इस शिकायत के आधार पर केस दर्ज कर सकती है। आरोपी को ट्रायल के दौरान अपने बचाव का मौका दिया जाता है। इस दौरान वह अपने को बेगुनाह साबित करने के लिए गवाह और सबूत पेश कर सकता है।


फ्लैट सिस्टम से मिला बढ़ावा
‘लिव-इन’रिलेशनशिप का आधार खुलापन है। मेट्रो शहरों की फ्लैट व्यवस्था ने इस तरह के लाइफ स्टाइल को बढ़ावा दिया और यह सुविधा भी दी कि साथ रहने के लिए बस आपसी सहमति चाहिए। यह भी एक कारण है कि लिव इन में धोखाधड़ी के सिर्फ मुकदमे ही दर्ज नहीं होते, बल्कि हर मेट्रो और बड़े शहरों में इसकी शिकायतें आम होती जा रही हैं। कुछ समय पहले ऑरमैक्स मीडिया नामक संस्था ने भारत के 40 शहरों में 5000 युवाओं को लेकर एक अध्ययन किया। जिसमें 72 फीसदी युवाओं का मानना था कि लिव-इन-रिलेशन असफल रहते हैं। हालांकि विवाह की जटिलताओं से बचने के लिए अब लिव इन को अपनाया जा रहा है। नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक बेंगलुरू ही वह शहर है, जहां ‘लिव इन’ रिलेशनशिप में सर्वाधिक फ्रॉड के मामले सामने आए। देश में सबसे ज्यादा लिव-इन जोड़े बैंगलोर में ही रहते हैं।


'लिव इन' पर सुप्रीम कोर्ट के विचार
कुछ समय पहले एक अपील की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन-रिलेशनशिप पर जो टिप्पणी की उससे हमारे समाज में इस मसले पर चल रही बहस एक नए दौर में पहुंच गई है। कोर्ट ने कहा कि अगर दो वयस्क व्यक्ति आपसी रजामंदी से शादी के बगैर साथ रहते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह अपराध नहीं है। साथ रहना जीवन का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, शादी के पहले सेक्स संबंध कायम करना कोई अपराध नहीं है। देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो शादी से पहले सेक्स संबंध की मनाही करता हो। इससे पहले जनवरी 2008 में भी कोर्ट ने लंबी अवधि के लिव-इन रिश्ते को शादी के बराबर मानने का फैसला दिया था। कोर्ट के मुताबिक अगर बिना शादी किए कोई जोड़ा एक साथ पति-पत्नी की तरह रहा है तो दोनों कानूनी रूप से शादीशुदा माने जाएंगे। कोर्ट ने कहा है कि इस दौरान अगर पुरुष साथी की मौत हो जाती है तो उसकी संपत्ति पर महिला साथी का कानूनन अधिकार होगा और वह उसकी वारिस मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमवाई इकबाल और जस्टिस अमिताव रॉय की बेंच ने यह आदेश सुनाते हुए कहा कि लगातार शारीरिक संबंध बनाने वाले कपल  को विवाहित ही माना जाएगा। इस तरह के मामले में दूसरे पक्ष को यह साबित करना होगा कि वे (कपल) कानूनी रूप से शादीशुदा नहीं हैं।

एक प्यार ऐसा भी
वेलेंटाइन डे से पहले थाईलैंड में युवाओं को कंडोम के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए कैंपेन चल रहा है। ये पहला मौका होगा, जब इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पहले युवाओं को मंदिर जाने और डेट के बाद सीधे घर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है। थाईलैंड दुनिया के सर्वाधिक किशोरों की प्रेगनेंसी वाले देशों में एक है। यहां यौन संक्रमण के मामले भी बढ़ रहे हैं। इस नई मुहिम को 2019 तक चलाया जाएगा और इसका लक्ष्य युवाओं में बढ़ते गर्भधारण के मुद्दे पर चर्चा करना है। हाल के वर्षों में थाईलैंड के अधिकारी युवाओं को सेक्स से बचने और कंडोम के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं पर इस साल कंडोम के इस्तेमाल से जुड़े कलंक को कम करने की कोशिश की जा रही है।  थाईलैंड में एक हजार लड़कियों में से 50 लड़कियां 15 से 19 साल की उम्र में मां बन जाती हैं। यहां 10 से 19 साल के युवाओं में यौन संबंधी रोग पांच गुना तक बढ़ गए हैं। थाईलैंड में करीब चार लाख 50 हजार लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं।

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इंटरव्यू
जहां एक तरफ लिव इन रिलेशन को लेकर तरह तरह की बातें हो रही हैं। वहीं लेखिका और विचारक शीबा असलम फाहमी का मानना है कि यहां भी पुरुषों का ही वर्चस्व चलता है। पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश -

सवाल -  वर्तमान  में लिव इन स्वार्थ और धोखे का रिलेशनशिप है क्या ?
जवाब - बिल्कुल नहीं। अब भी प्यार करने वाले एक साथ लंबे समय से रिलेशन चला रह हैं। लेकिन आपको क्यों ऐसा लगता है कि इसमें स्वार्थ और धोखा हावी है।

दरअसल, यह सवाल हॉकी कप्तान सरदार सिंह के केस के बाद कहीं ज्यादा मौजूं हो चला है।
देखिए, किसी एक केस के बारे में कमेंट करना गलत होगा लेकिन अगर बेबुनियाद मुकदमें जब अदालत के सामने आते हैं तो धाराशायी भी होते हैं। हमारे देश की अदालतें अपने विवेक का इस्तेमाल कर दूध का दूध और पानी का पानी कर देती हैं। आंकड़े उठा कर देख लीजिए। ऐसे कई मामलों में लड़कियों को भी कोर्ट ने लताड़ लगाई है। लेकिन मेरा सिर्फ इतना कहना है कि यह कौन तय करेगा कि एक लड़की के साथ कब रेप हो सकता है और कब नहीं।

तो क्या अब रेप की नई परिभाषा लिखे जाने की जरूरत है ?
मेरा बस यह कहना है कि इस पर विचार हो।  लड़की भले ही शादी शुदा हो या फिर दस - पंद्रह साल से रिलेशनशिप में हो लेकिन उससे अपनी कुंठा शांत करने के लिए पुरुष जबरदस्ती यौन संबंध बनाता है तो उसे रेप की श्रेणी में रखे जाने की जरूरत है। यह स्‍त्री के खिलाफ है। हमारे यहां शादी के अंदर रेप का कोई मजबूत कानून भी नहीं है और न ही कोई महिला आगे आने की हिम्मत दिखाती है।  

तो आपके कहने का मतलब यह है कि लिव इन में भी लड़की से उसका पार्टनर रेप कर सकता है?
हां , क्यों नहीं। सच कहूं तो यह पूरी तरह से पुरुष समाज के लिए मस्ती करने का जरिया बन गया है। इसमें पुरुष को सिर्फ अधिकार हैं लेकिन कर्तव्य का पता नहीं। इस पुरुषवादी सोच को तोड़ने की जरूरत है। इसमें महिलाओं पर दबाव ज्यादा आता है। मसलन, अगर लिव इन में बच्चा होता है तो सारी जिम्मेदारी औरत ही उठाती है। बाद में बच्चे को भी समाज में जिल्लतें झेलनी पड़ती हैं।

लेकिन लड़की का अपना विवेक भी तो काम करता है।
बिल्कुल, उसका विवेक काम करता है  लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अगर एक बार लड़की किसी के साथ कमिटेड हो गई तो उसकी गुलाम हो गई। मैं यह भी कहना चाहूंगी कि लड़कियों को भी समझ कर फैसले लेने की जरूरत है। 

लिव इन का ट्रेंड कैसे बढ़ा?
दरअसल, परिवारों की आंतरिक जकड़न की वजह से यह ट्रेंड बढ़ा है। अगर एक लड़का या लड़की प्यार करते हैं तो उसमें परिवार वाले जाति, धर्म और पता नहीं क्या , क्या तलाश लेते हैं। बच्चे जिंदगी के सारे फैसले ले सकते हैं तो शादी का फैसला परिवार को क्यों लेने दें ? परिवारों में विवाह को लेकर जो विवाद है उससे बचने के लिए बच्चे गांव शहर से दूर रह कर लिव इन में रहते हैं।  लिव इन उसी जकड़न का जवाब है। हमने डॉक्टर, इंजीनियर तो बना दिया लेकिन शादी का मामूली फैसला हम खुद करते हैं, जो यह गलत है।  साथ ही लिव इन में रह रहे पुरुषों की यह जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं से सम्मानित व्यवहार करें।

तो लिव इन में महिलाएं उपभोक्ता की तरह इस्तेमाल हो रही हैं? 
शायद हां, लेकिन उसे आप उपभोक्ता की तरह नहीं इस्‍तेमाल कर सकते हैं। यह चीरहरण जैसा मामला है। अगर अभिनेत्री प्रीति जिंटा कई सालों के रिलेशनशिप में रहने के बाद नेस वाडिया पर केस करती हैं तो इसे हल्के में नहीं ले सकते हैं। संभवतः वाडिया ने उन्हें उपभोक्ता की तरह ही इस्तेमाल करने की कोशिश की। आप पत्नी, प्रेमिका, बहन या मां किसी के साथ भी ऐसा नहीं कर सकते । भले ही रिश्ते में बहुत गहराई  हो।  मसलन, इसका उदाहरण है ट्विंकल खन्ना और अक्षय कुमार । अक्षय ने उपभोक्ता की तरह अपनी पत्नी ट्विंकल से रैंप शो के दौरान पैंट की बटन खुलवाई। तब उन पर मुकदमा भी हुआ। 


  

Sunday, 31 January 2016

गणतंत्र का आईना: कई कदम चले हम कई कदम हैं बाकी


इस गणतंत्र ने हमको क्या दिया ? हमने क्या खोया, क्या पाया?   66 बरस बीत जाने के बाद पीछे मुड़कर सोचने की इच्छा स्वाभाविक रूप से होती है। नियति के साथ जो मिलन हुआ था, जो सपने देखे थे, जो अरमान संजोए थे, क्या वह पूरे हुए?  आइए इस गणतंत्र पर इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढें।


ताकत वतन की हम से है

किसी भी देश की ताकत उसकी आर्थिक और सैन्य क्षमताओं में होती है। साल 2007 में भारत ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बन चुका है, वहीं सैन्य शक्ति के मामले में भी भारत सुपर पावर बनने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के अध्य्यन के मुताबिक साल 2045 तक भारत ग्लोबल मिलिट्री पॉवर में शुमार होने लगेगा। यानी एक ऐसा देश जो दुनिया में कहीं भी अपने रणनीतिक जरूरतों के मुताबिक दखल देने की ताकत से लैस होगा। भारत के 606 फाइटर्स में 245 विमान मिग-21 श्रेणी के हैं। इनमें से 100 विमान 2017 में हटा दिए जाएंगे। बाकी 2024 तक हटाए जाएंगे।  जमीनी हमले में 85 विमान मिग-27 प्लेन हैं। ये 2020 तक बेड़े से हटा दिए जाएंगे। भारत के पास कुल 836 विमानों का बेड़ा है लेकिन इनमें से जंग लड़ने लायक विमान 450 ही हैं। आने वाले समय में भारत एक शक्तिमान भारत के रूप में उभर कर आ रहा है।  इस गणतंत्र ‌दिवस हमारे मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसिस ओलांद हैं। भारत को ओलांद से अब तक के सबसे ताकतवर राफेल विमानों पर समझौते की उम्मीद है। राफेल का फ्रेंच में मतलब होता है तूफान। राफेल दो इंजन वाला मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट है। फ्रांस सरकार ने चार यूरोपीय देशों के साथ मिलकर इसे बनाना शुरू किया था। बाद में जब बाकी तीन देश अलग हो गए तो फ्रांस ने अकेले दम पर ही प्रोजेक्ट को पूरा किया। राफेल को लीबिया, माली और इराक में इस्तेमाल किया जा चुका है। राफेल विमान महंगे जरूर हैं लेकिन सुखोई के मुकाबले काफी तेज हैं। ये एयर-टू-एयर, एयर-टू-राफेल और एंटी शिप मिसाइलें अपने साथ ले जा सकते हैं। ये डॉगफाइटर श्रेणी के हैं यानी हवा में दुश्मन के विमानों का करीबी से मुकाबला कर सकते हैं। यह खूबी सुखोई में नहीं है।

जब 24 घंटे खुला रहा न्याय का मंदिर

लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि यहां न्यायपालिका न्याय देने के लिए किसी भी वक्त तैयार रहती है। 1993 मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका को लेकर देर रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सिर्फ इसलिए खुले ताकि किसी निर्दोष को सजा न हो जाए। पूरी बात को कई बार गौर करने के बाद आखिर न्यायपालिका ने अपना फैसला सुनाया। न्यायपालिका ने साथ ही कुछ ऐसे फैसले लिए जिसने दिग्गजों को कानून के मायने के बारे में बता दिए। इसके सबसे अहम उदाहरण आसाराम और सुब्रत राय सहारा हैं। अपने-अपने क्षेत्र के इन दोनों दिग्गजों पर जब कानून का शिकंजा कसना शुरू हुआ , तो दोनों ने पहले इसे काफी हल्के में लिया।  लेकिन कमाल देखिए कि एक बार ये कानून के शिकंजे में फंसे तो फिर इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता फिलहाल इन्हें या इनके कुनबे को नहीं सूझ रहा। कुछ ऐसा ही हाल 1990 के दशक में फिल्म अभिनेता संजय दत्त का रहा था। 1993 मुंबई दंगों के दौरान घर में अवैध असलहा रखने के मामले में कानून ने जब संजय को गिरफ्त में लेना शुरू किया, तब  शुरू में संजय बिल्कुल बेपरवाह नजर आते रहे लेकिन जब कानून का डंडा चला तो उनके होश ठिकाने आ गए। ऐसे कई और उदाहरण मिल जाएंगे जो हमारे देश की न्यायपालिका की मजबूती के बारे में दुनिया को बताते हैं।




कृषि और डेयरी उद्योग का सुपरपावर

एक वक्त भारत को विदेशों से अनाज मंगाना पड़ता था लेकिन अब कृषि और डेयरी उत्पाद के मामले में भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर हो चुका है, बल्कि बड़े निर्यातक के तौर पर भी उभर रहा है। 1965 की हरित क्रांति और 1970 के श्‍वेत क्रांति के जरिए भारत आज कृषि और डेयरी उद्योग में बड़ा निर्यातक बन चुका है। वित्त वर्ष 2014 में डेयरी निर्यात 5,000 करोड़ रुपये को छू चुका है, वहीं 2009 तक जीडीपी में कृषि का हिस्सा करीब 16.6 फीसदी था।  इसमें भी कोई शक नहीं रहा है कि धीरे-धीरे भारत दुनिया के सबसे ज्यादा ऊर्जा खपत वाले देश में बदल रहा है। भारत एशिया का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उत्पादक है। अब ताप विद्युत और पन बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ परमाणु बिजली सयंत्र लगाने की योजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। तेल की जरूरत के मामले में भी 2016-17 तक भारत 71 फीसदी तक जरूरत खुद से पूरा करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।

आईटी में भी हम नंबर वन

सॉफ्टवेयर बनाने, आईटी उत्पाद बनाने में दुनिया भारतीय दिमाग का लोहा मानती है। आईटी सिटी बंगलूरू, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुड़गांव में ही नहीं आज अन्य छोटे शहरों में भी छोटी-बड़ी आईटी कंपनियों में आईटी तकनीक का विकास जारी है। टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल जैसी देसी कंपनियां भारत की आईटी क्रांति के ध्वजवाहक हैं। मोटा अनुमान है कि भारत में आईटी उद्योग 120 अरब डॉलर का है। 2012 में भारत की जीडीपी में आईटी सेक्टर का हिस्सा 7.5 फीसदी था। इस आईटी क्रांति की बदौलत ही दुनिया के बड़े देशों के आईटी सेक्टर में भी भारतीय प्रतिभाओं का दबदबा बन चुका है। 1980 से 1998 के बीच अमेरिका के सिलिकॉन वैली में जो नई कंपनियां स्थापित हुईं, उनमें सात फीसदी भारत में जन्में उद्यमियों ने शुरू की थीं। यही नहीं, 2007 में एडोबी का सीईओ एक भारतीय शांतनु नारायण को बनाया गया। गूगल की तरक्की में भारतीय प्रतिभा सुंदर पिचाई का अहम योगदान है। जब दुनिया की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में से एक माइक्रोसॉफ्ट के तीसरे सीईओ की खोज शुरू हुई तो वो भी भारतीय चेहरे सत्या नडेला पर जा कर खत्म हुई।


चमक रहा है युवा भारत

पिछले 10-15 सालों में भारत के युवाओं में एक अहम परिवर्तन की बयार आई है। उनमें निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ है। आश्चर्यजनक रूप से उसके व्यक्तित्व में निखार आया है। यह भारतीय युवा के कुशल मस्तिष्क की ही तारीफ है कि वैश्विक स्तर पर उस पर विश्वास किया जा रहा है। बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां उसे सौंपी जा रही है। यह देश की राजनीति के लिए निसंदेह शुभ और सुखद लक्षण है कि बुजुर्गों की भीड़ में अब युवा चेहरे चमक रहे हैं।  यह भी एक ठंडक देने वाला तथ्य सामने आया है कि गांव का भोला-भाला गबरू जवान अब सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर सहज पकड़ हासिल कर रहा है। अब अपनी विलक्षण प्रतिभा के दम पर उसने बरसों की हीन भावना और संकोच पर विजय हासिल कर ली है। प्रतियोगी परीक्षा से लेकर चिकित्सा, इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी हर विधा में अपनी क्षमता का परचम लहराया है। आज शहर के युवा जहां उच्च उपभोक्तावादी ताकतों के शिकार हो रहे हैं,  वहीं अधिकांश ग्रामीण युवाओं ने अपने लक्ष्य   पर से निगाह हटाने की गलती नहीं की है।

यहां फीकी पड़ी चमक


राजनीतिक अखाड़े का केंद्र बनी संसद

भारतीय लोकतंत्र का प्रतीक चिन्ह संसद को माना जाता है लेकिन वर्तमान दौर में संसद राजनीतिक अखाड़े का केंद्र बनती जा रही है। यही वजह है कि यहां काम कम और हंगामा ज्यादा होता है। पिछले कुछ सालों में संसद में कार्यवाही जिस गति से स्थगित हुई हैं वह बेहद चिंतित करने वाला है। संसद में एक मिनट की कार्यवाही का खर्च ढाई लाख रुपये पड़ता है। यानी एक घंटे का खर्च डेढ़ करोड़ रुपये हो जाता है। आमतौर पर राज्यसभा की कार्यवाही एक दिन में पांच घंटे चलती है। लोकसभा की कार्यवाही एक दिन में 8-11 घंटे चलती है। अगर लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर रोजाना 11 घंटे काम हों तो सोमवार से शुक्रवार तक का खर्च बैठता है 115 करोड़। 2010- 2014 के बीच संसद के 900 घंटे बर्बाद हुए। 16वीं लोकसभा के पहले सत्र में हंगामे की वजह से 16 मिनट बर्बाद हुए यानी 40 लाख का नुकसान हुआ। दूसरे सत्र में 13 घंटे 51 मिनट बर्बाद हुए यानी 20 करोड़ सात लाख का नुकसान। तीसरे सत्र में तीन घंटे 28 मिनट काम नहीं हुआ यानी पांच करोड़ 20 लाख का नुकसान। चौथे सत्र में सात घंटे चार मिनट बर्बाद हुए यानी 10 करोड़ 60 लाख रुपये का नुकसान हुआ। पांचवें सत्र में 119 घंटे बर्बाद हुए यानी 178 करोड़ 50 लाख का नुकसान हुआ। संसद का छठा सत्र हाल ही में समाप्त हुआ है। इस सत्र में कार्यवाही स्‍थगित होने की वजह से करीब सौ करोड़ का नुकसान हो गया। 

गहरी हुई अमीर और गरीब के बीच की खाई

अमीर-गरीबों के बीच देश में कितना अंतर बढ़ चुका है, यह तीन बड़ी सर्वे एजेंसियां - ऑक्सफैम, वर्ल्ड वेल्थ और क्रेडिट सुइस के विश्लेषण के बाद पता चलता है।  वर्ल्ड वेल्थ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अति अमीरों की संख्या दो लाख 36 हजार हो गई है। पिछले साल ये आंकड़ा एक लाख 98 हजार था। यानी एक साल में अति अमीर लोगों की आबादी 19.9% बढ़ गई। अति अमीर वो लोग हैं जिनके पास 10 लाख डॉलर यानी 6.76 करोड़ रुपये या इससे अधिक की चल-अचल संपत्ति है। एशिया पैसेफिक के अति धनाढ्यों की इस सूची में भारत चौथे नंबर पर है, जबकि 12 लाख 60 हजार करोड़पतियों के साथ जापान पहले पायदान पर है। रिपोर्ट के मुताबिक 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के बाद देश में अमीरों की संख्या 50 गुना तक बढ़ गई, वहीं उनकी संपत्ति में 1100 फीसदी का इजाफा हुआ है। भारत की कुल व्यक्तिगत संपत्ति 2,952 खरब रुपये है। कुल संपत्ति का मतलब जिसमें प्रॉपर्टी, कैश, शेयर सहित बिजनेस से कमाई शामिल हैं। व्यक्तिगत संपत्ति के लिहाज से चीन शीर्ष पर है। उसके पास 11 हजार 669 खरब रुपये की संपत्ति है। भारत एक ओर तो कुल निजी संपत्ति रखने वालों के मामले में एशिया पैसेफिक रीजन का चौथा बड़ा देश है, लेकिन प्रतिव्यक्ति आय के मामले में निचले पायदान पर है। दो लाख 36 हजार 775 रुपये के साथ भारत नीचे की तीन पायदान में है। जबकि 1.38 करोड़ रुपये के आंकड़े के साथ ऑस्ट्रेलिया पहले नंबर पर है। यानी ऑस्ट्रेलिया के लोग एशिया पैसेफिक में किसी भी अन्य देश के लोगों से ज्यादा धनी हैं। 1.08 लाख रुपये के साथ पाकिस्तान में लोग सबसे गरीब हैं।  यहां यह भी बता दें कि देश की कुल संपत्ति का 53 फीसदी हिस्सा यानी 16 लाख खरब रुपए महज 1 फीसदी या 25.4 लाख परिवारों के पास है। देश की कुल संपत्ति का 76.3% हिस्सा 10 फीसदी परिवार के पास है और बाकी 90 फीसदी के हिस्से बचती है महज 23.7 फीसदी संपत्ति।

आत्महत्या करते हमारे अन्नदाता

‘भारत एक कृषि प्रधान देश है’, यह तथ्य वर्तमान दौर में जुमले की तरह लगता है। भारत के महाराष्ट्र, तेलंगाना सहित आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले रिपोर्ट होते हैं। बीते एक दशक से देश भर में होने वाली किसानों की आत्महत्या में दो तिहाई हिस्सेदारी इन्हीं राज्यों की है। नए तौर तरीकों से किसानों की आत्महत्या के मामले की गिनती के बावजूद 2014 में किसानों की कुल आत्महत्या में 90 फीसदी से ज्यादा मामले इन्हीं पांच बड़े राज्यों में सामने आए। बीते 20 साल में महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा 64 हजार तक पहुंच गया है। 2014 में देश भर में किसानों की कुल आत्महत्या में 45 फीसदी से ज्यादा मामले इस राज्य में दर्ज किए गए। अकेले महाराष्ट्र में वर्ष 2015 के दौरान कुल 3,228 किसानों ने खुदकुशी की।

लोकतंत्र में ‘लोक’ कहां है

लोकतंत्र की खूबसूरती जनता की भागीदारी से बढ़ती है, लेकिन राजनीति क्षेत्र में यह तथ्य लगातार कमजोर हो रहा है। यहां राजनीतिक विरासत चंद परिवारों में बंट गई है। इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद उनसे विरोध रखने वालों ने सबसे पहले परिवारवाद का नारा बुलंद किया था क्योंकि उनके पिता जवाहरलाल बड़े नेता थे। जब वंशवाद का सिलसिला चला तो राजीव, संजय और  सोनिया से होते हुए राहुल गांधी तक आ पहुंचा। यह सिर्फ कांग्रेस की ही बात नहीं है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के परिवार के लगभग बीस छोटे बड़े सदस्य केन्द्र या उत्तर प्रदेश की कुर्सियों पर विराजमान हैं। अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल के एक दर्जन पारिवारिक लोग कुर्सियों पर काबिज हैं।  हरियाणा में स्वर्गीय देवीलाल के पुत्र ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे कुर्सियों पर हैं। कश्मीर में अब्दुला और मुफ्ती परिवार लंबे समय से टिका है। हिमाचल में भाजपा के प्रेम कुमार धूमल ने सीएम पद संभाला तो उनके पुत्र अनुराग ठाकुर भी पार्टी में सक्रिय हो गए। हरियाणा के दो भूतपूर्व बड़े नेता चौधरी बंसीलाल व भजनलाल के वंशज राजनीति में सक्रिय हैं। लालू प्रसाद ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चूल्हे से सीधे मुख्यमंत्री बनाया। उनके दोनों बेटे बिहार कैबिनेट में मंत्री हैं। रामविलास पासवान का परिवार भी बिहार की राजनीति में सक्रिय है। वहीं मध्यप्रदेश के राज घराने वाले सिंधिया परिवार की पीढ़ियां राजनीति की अग्रिम पंक्ति में सक्रिय रही हैं। तमिलनाडु में करूणानिधि परिवार तो कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार भी इसी कतार में है।
20.5 फीसदी दुनिया के गरीब भारत में हैं। वहीं प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भारत निचले पायदान पर है।

120 अरब डॉलर के करीब कारोबार हो चुका है भारतीय आईटी क्षेत्र का। 

1990में सिर्फ दो उद्योगपति थे जिनकी सालाना आय 2.1 लाख करोड़ रुपये थी। 2012 में 46 की दौलत 11.8 लाख करोड़ रुपये थी।

2.50 लाख रुपये खर्च होते हैं एक मिनट की संसदीय कार्यवाही में। स्‍थगित होने से लगता है कई करोड़ का झटका।

36 करोड़ से ज्यादा लोग देश में 50 रुपये रोज से कम में जीवन बिता रहे हैं।

3228 किसानों ने पिछले साल अकेले महाराष्ट्र में खुदकुशी की।  तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी कम नहीं।

Monday, 18 January 2016

गुम हुआ बटुआ

अमर उजाला में प्रकाशित लेख
 कहते हैं कि जिसकी जेब में जितना ज्यादा पैसा होता है समाज में उसकी इज्जत भी उतनी ही ज्यादा होती है लेकिन आने वाले वक्त में शायद इज्जत उसकी ज्यादा होगी जो कैशलेस तो है लेकिन बैंकिंग कार्ड और कई खास ऐप से लैश है। चौंकिए मत, तकनीक की इस दुनिया में कई ऐसे ही खास बदलाव अभी आने वाले हैं, इंतजार कीजिए।


बात 2012 की है। जौनपुर के नितेश राय तब लखनऊ में नए नए रहने आए थे। घर में उनकी पहचान 'टेक्नॉलोजी फ्रेंडली' थी लेकिन वह आज भी बैंक में लंबी कतार में लग कर अपने पापा के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करते हैं। वहीं नितेश का रूम पार्टनर अभय घर बैठे ही इलाहाबाद में सिविल की तैयारी कर रहे अपने भाई को पैसे ट्रांसफर कर देता है। अब जब नितेश के पिता उसके कमरे पर आते हैं तो उन्हें यह एहसास होता है कि तकनीक के इस बदलते दौर में अभय उनके बेटे से कहीं आगे है। जी हां, अगर आप अभी भी सिर्फ कैश में ट्रांजैक्शन करते हैं तो साफ है कि आप जमाने के साथ कदम मिला कर नहीं चल रहे हैं। क्योंकि कैश की जगह अब बैंकिंग कार्ड्स ने ले ली है और बैंकों में लंबी कतार की जगह कई खास एप्स ने। आपका बटुआ और मोबाईल अब मॉल भी है, मल्टीप्लेक्स भी और जरुरत पड़े तो ये होटेल से खाना मंगवाने में भी मदद करेगा। दरअसल, देश में बैंकिग का तरीका तेजी से बदल रहा है। इसमें इंडिया और भारत के बीच की दूरियां भी मिट रही हैं। इस दौड़ में बैंक ग्राहक से आगे निकलने की कोशिश में हैं। वह चाहते हैं कि ग्राहक जहां पहुंचने वाला है, वहां वो उससे पहले ही पहुंच जाएं। पहले आई मोबाइल बैंकिंग और आए हर बैंक से जुड़े एप्लिकेशंस। मसलन मनी ट्रांसफर, बिल पैमेंट, डिपॉजिट खोलने जैसी बेसिक सर्विसेस आप फोन पर ही कर सकते थे। फिर आया स्मार्टफोन से ई कॉमर्स।  3000-4000 रुपये के स्मार्टफोन से ई- कॉमर्स साइट्स से शॉपिंग बन गया हॉट ट्रेंड। सिनेमा की टिकट बुक करने से लेकर रेडियो टैक्सी बुलाने तक हर काम स्मार्टफोन पर होने लगा। पेमेंट खास मोबाइल के लिए बने वॉलेट्स से हो इसके लिए आया आईसीआईसीआई बैंक का पॉकेट्स और एचडीएफसी बैंक का पेजैप। ये देश के पहले मोबाइल बैंकिंग वॉलेट थे। इनके इस्तेमाल से आप बैंक से जुड़े काम तो कर ही सकते हैं साथ ही बिल भरने और रिचार्ज जैसे काम भी हो सकते थे। सिनेमा, होटल या फ्लाइट बुकिंग भी की जा सकती थी। कुछ बैंकों ने तो अपने ग्राहकों के लिए एक मार्केट प्लेस भी बनाया है। इस पर आप चाहें तो हर महीने किराना भी मंगवा सकते हैं। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि फ्लिपकार्ट और स्नैपडील जैसी बड़ी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स ने भी मोबाइल से होने वाली ट्रांजेक्शन की संख्या बढ़ने की बात स्वीकारी है। दूसरी कंपनी जो मोबाईल कॉमर्स के क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है वह है ‘पेटीएम’। यह मोबाइल और डीटीएच रिचार्ज की सुविधा प्रदाता कंपनी है। पेटीएम के आंकड़ों के अनुसार इसे एक दिन में करीब तीन से चार लाख ऑर्डर्स मिलते हैं जिनमें 25 फीसदी ग्राहक नए होते हैं। इसमें भी कोई शक नहीं कि स्मार्टफोन यूजर्स का बढ़ना मोबाइल ई-कॉमर्स के लिए उज्ज्वल भविष्य का रास्ता बना रहा है लेकिन तेज गति से चलने वाला मोबाइल इंटरनेट, तेज और सस्ती 3जी और 4जी नेटवर्क भी इसके लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण है। कुछ हद तक यूजर्स ने ‘ई-वॉलेट सिस्टम’ को अपनाया है लेकिन यह अभी भी देश की मुख्यधारा की पसंद नहीं बन पाया है। किसी भी तरह की खरीदारी को तकनीकी रूप से बेहद तेज और आसान बना देता है। अगर पेटाइम के आंकड़ों की मानें तो वॉलेट में आगे जाने की संभावनाएं बहुत अधिक हैं और लॉन्च के मात्र 10 महीनों के अंदर इसके 15 मिलियन एक्टिव वॉलेट हैं जिनमें 6.5 मिलियम में पैसे हैं या सेव किया हुआ कार्ड है। बात घूम फिरकर वहीं आती है कि मार्केट में कंपटीशन बढ़ रहा है।  बैंकों के ग्राहक के आधार पर पेटीएम जैसी कंपनियां भी हाथ मारने की कोशिश कर रही हैं। इसलिए मौजूदा बैंक ग्राहक से हर स्तर पर जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे वो ब्रांच हो, वेबसाइट हो या ई-कॉमर्स साइट हो, मोबाइल हो या जल्द लांच होने वाला एपल वॉच। क्योंकि ग्राहक कहीं भी मिल सकता है। और इस बात का एहसास देश के सबसे बड़े और सबसे पुराने बैंकों को भी है। तो फिर जल्दी से आंखें बंद कर लीजिए। किसी ऐसे ट्रांजेक्शन के बारे में सोचिए जो आप अपने बैंक के जरिए करना चाहते हैं। अब आंखें खोल लीजिए। बिल्कुल किसी जिन्न की तरह आपका बैंक आपके सामने हाजिर है। लेकिन, उसे एक्सेस करने के लिए आपको किसी अल्लादीन के चीराग की जरुरत नहीं है, बस चाहिए एक फोन, टैबलेट या फिर लैपटॉप और अगर आपको ये सब स्टार ट्रेक का कोई सीन लग रहा है, तो आदत लगा लीजिए आपका बैंक अब ऐसा ही लगने वाला है।


स्वीडन बना पहला कैशलेस देश
लगातार विश्व में टेक्नोलॉजी का दौर आगे बढ़ता ही जा रहा है, इसके तहत ही आज हम इलेक्ट्रॉनिक्स का अधिक उपयोग करने लग गए है। अब इस सूचना तकनीक के जरिये स्वीडन दुनिया का ऐसे पहला देश बनने में सफल हो गया है जो कैशलेस है। कैशलेस देश होने का आसान सा मतलब ये है कि पैसों का लेन-देन बैंकिंग के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से हो। यानी डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल किया जाए। पेमेंट के लिए बैंकों की एनईएफटी (नेशनल इलेक्ट्रानिक फंड ट्रांस्फर) और आरटीजीएस (रीयल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट) जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाए। कैशलेस देश बनने से काले धन को रोकने में काफी हद तक कामयाबी मिलती है। कैशलेस देश में कालेधन के लेन-देन की गुंजाइश बेहद कम हो जाती है। सरकार का टैक्स कलेक्शन बढ़ जाता है क्योंकि बैंक कार्ड से पेमेंट होने से कर चोरी को रोका जा सकता है। कैशलेस इकोनॉमी में सरकारी मशीनरी में फैले भ्रष्टाचार को भी जड़ से मिटाने में मदद मिलती है। वहीं नोटों की प्रिंटिग का सरकारी खर्च कम हो जाता है। सरकार के लिए सब्सिडी और अन्य आर्थिक लाभ लोगों के बैंक खाते में सीधे ट्रांसफर करना आसान हो जाता है। बैंक के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए लेन-देन करने में वक्त भी बचता है। कैश की चोरी और लूट-पाट का डर भी नहीं होता।

और भी हैं कतार में
स्वीडन में कैश लेन-देन बीते जमाने की बात होने वाली है। कैशेलस देश बनने की लाइन में दुनिया के पांच देश और हैं। कैशलेस बनने की दिशा में बढ़ रहे देशों की लिस्ट में नंबर एक पर स्वीडन है जहां 96 फीसदी लोगों के पास बैंक डेबिट कार्ड हैं और सिर्फ तीन फीसदी लेन-देन कैश में होते हैं। दूसरे नंबर पर बेल्जियम है जहां 86 फीसदी नागरिकों के पास बैंक डेबिट कार्ड हैं और केवल सात फीसदी लेन- देन कैश में होता है। तीसरे नंबर पर  फ्रांस का नाम है जहां 69 फीसदी आबादी के पास डेबिट कार्ड है और 8 फीसदी लेन-देन में ही कैश का इस्तेमाल होता है। 10 फीसदी कैश ट्रांजेक्शन्स और 88 फीसदी नागरिकों के पास डेबिट कार्ड वाला कनाडा कैशलेस देश बनने की दिशा में सबसे तेजी से बढ़ रहा दुनिया का चौथा देश है। जबकि ब्रिटेन इस सूची में पांचवे नंबर पर है जहां 88 फीसदी नागरिकों के पास डेबिट कार्ड है और सिर्फ 11 फीसदी लेन -देन कैश में होता है।

आसान नहीं कैशलेस भारत
अगर भारत में कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देना है तो सरकार को बहुत बड़े कदम उठाने पड़ेंगे जिसमें सबसे अहम बात है सूचना तकनीक को फ्राड से मुक्त करना अहम है। वर्ष 2012 के मुकाबले वर्ष 2014 में वेबसाइट हैकिंग और ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड से जुड़े साइबर अपराध में 40% का इज़ाफा हुआ है। 2015 का आंकड़ा अभी नहीं आ सका है। एक सर्वे के मुताबिक पिछले दो वर्षों में बैंक फ्रॉड के मामले 10% बढ़ गए हैं। और बैंक फ्रॉड के सिर्फ 25 फीसदी मामलों में ही रकम वापस मिल पाती है।

50 करोड़ के करीब डेबिट कार्ड भारत में इस्तेमाल हो रहे हैं और 86 फीसदी से ज्यादा लेन-देन कैश में होते हैं।

10 फीसदी से भी कम भारत के शॉपिंग मॉल्स में खरीदारी बैंक कार्ड के जरिए होती है।
60 फीसदी भारतीय उपभोक्ता ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर सामान खरीदते वक्त कैश ऑन डिलीवरी का विकल्प चुनते हैं।
0.8 फीसदी भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इजाफा हो सकता है, इलेक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन्स को बढ़ावा देने पर।
03   फीसदी स्वीडन में सिर्फ लेन-देन (ट्रांजेक्शन्स) कैश में होते हैं।


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कुछ खास ऐप

माहवारी और प्रजनन के बारे में बताने वाला ऐप
गर्भधारण से लेकर माहवारी तक से जुड़े लक्षणों को बताने वाला एक ऐप तैयार किया गया है। प्रजनन स्वास्थ्य पर नजर रखने वाला यह ऐप महिलाओं में होने वाली माहवारी, प्रजनन और माहवारी से पहले मूड में होने वाले बदलावों का पूर्वानुमान लगा सकता है। इस कदम को उसी तरह से देखा जा रहा है जैसे 1960 के दशक में गर्भनिरोधक गोली की खोज को देखा गया, जिसने सेक्स और सामाजिक व्यवहार के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी। क्लू नाम के इस ऐप की चीफ एक्जीक्यूटीव और सह-संस्थापक इडा टीन के मुताबिक आज की तारीख में औरतों के लिए यह जानना क्रांतिकारी बात है कि उन्हें माहवारी कब आएगी। हालांकि क्लू कोई गर्भनिरोध में काम आने वाला ऐप नहीं है। इस ऐप का आइडिया इडा के निजी अनुभव से आया है।

नर्स की तरह ख्याल रखेगा ऐप
अगर कोई समय से दवा खाने की याद दिलाने से लेकर डॉक्टर की पर्ची और जांच रिपोर्ट तक आसान भाषा में समझाए और संभाल कर रखने लगे। इसी तरह आपके ब्लड प्रेशर, पल्स रेट और डायबिटीज आदि का वर्षों का रिकार्ड रखे और वह भी पूरी तरह मुफ्त तो कैसा रहेगा। ये सारे काम अब मोबाइल ऐप "एम-तत्व" करेगा। यानी यह मोबाइल ऐप अब चौबीस घंटे मुफ्त नर्स की तरह से देखभाल करेगा। 

रोमांस करना सिखाएगा ऐप
'हाऊ टू टेक्स्ट ए गर्ल' नाम का यह ऐप लड़कियों को किस तरह से मैसेज किए जाएं इसके तरीके बताता है। महज 0.6 एमबी का यह ऐप उन लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है जो किसी लड़की को अपने दिल की बात कहने से घबराते हैं। इस ऐप में कुछ खास कैटेगरी दी गई हैं। जैसे फ्लर्टिंग मैसेज, मेकिंग प्लान और डिचिंग प्लान। जिस भी तरह का मैसेज आप करना चाहें उस कैटेगरी में क्लिक कीजिए और सामने होंगे कई सारे उदाहरण।

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अभी और चौंकिये

चोरी - चोरी
एप्पल बना रहा सेल्फ ड्राइविंग कार
ब्रिटेन के अखबार 'द गार्डियन' ने हाल ही में यह दावा किया है कि एप्पल सेल्फ ड्राइविंग कार बनाने की एक गुप्त परियोजना पर काम कर रहा है।  यह भी दावा किया गया है कि मई 2015 में एप्पल के गुप्त स्पेशल प्रोजेक्ट के कुछ इंजीनियर 'गो मेन्टम स्टेशन' के अधिकारियों से मुलाकात की थी। फ्रांसिस्को का 2,100 एकड़ में फैला 'गो मेन्टम स्टेशन' पहले आर्मी बेस हुआ करता था जो अब ऑटोनोमस गाड़ियों की जांच के लिए बड़े मैदान में तब्दील हो चुका है।
इस मुलाकात के बात विदेशी मीडिया में एप्पल की सेल्फ ड्राइविंग कार की चर्चा जोर शोर से शुरू हो गई। इसके बाद इस अफवाह को भी बल मिली की एप्पल  'मेन्टम स्टेशन' ग्राउंड में अपनी सेल्फ ड्राइविंग कार की टेस्टिंग कर सकता है। पहले अफवाह यह थी कि एप्पल  'टाइटन' नाम के प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रिक सेल्फ ड्राइविंग कार का निर्माण कर रहा है लेकिन यह पहला मौका है जब ऐसे दस्तावेज मिले हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि एप्पल सेल्फ ड्राइविंग कार बना रहा है। इन अफवाहों को बल मिलने की कई वजह हैं, जैसे हाल ही में एप्पल के सीईओ का लगातार दुनिया की बड़ी कार कंपनियों के मालिकों के साथ बैठक करना और अधिकारियों का गाड़ियों के बारे में बयान देना।

स्मार्टफोन के बाद स्मार्ट होम
स्मार्टफोन के इस दौर में एक ऐसे स्मार्ट होम की कल्पना करना कोई अजीब बात नहीं जहां उपकरण एक दूसरे से बातें करेंगे और फ्रिज खुद दूध की देखभाल करेगा। बहुत जल्द यह सपना भी सच होने वाला है। बर्निल में हुए ईफा इलेक्ट्रॉनिक मेले में भविष्य के स्मार्ट घरों की कल्पना पेश की जा चुकी है। ईफा में कोरियाई कंपनी सैमसंग ने 2020 को ध्यान में रखते हुए भविष्य का घर पेश किया। इसमें एक ऐसी तकनीक भी होगी जो किचन में खाना बनाते समय एक के बाद एक आपको बताती जाएगी कि कब क्या किया जाए। यहां तक कि एक ऐसा डिजिटल कोच जो आपके साथ दौड़ लगाएगा। साथ ही आपको बताता जाएगा कि आपने कितनी कसरत की और कितनी करना बाकी है। कुछ ऐप भी ऐप तैयार किए जा रहे हैं। ये ऐप यह पता लगा सकेंगे कि घर पर कोई है या नहीं।


हैरान करेंगे भविष्य के युद्ध
अमरीकी नौसेना के मुताबिक भविष्य में ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा जो अदृश्य हों, जिनका पता न लगाया जा सके । साथ ही वह सैटेलाइट, कंप्यूटर, राडार और विमानों सहित सब कुछ बंद कर सकते हों। यह वह हथियार होंगे जिनमें इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। यह हथियार इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों को जाम या पूरी तरह से तबाह कर सकते हैं।  सुरक्षा उपकरण बनाने में लगी कंपनियां ऐसे हथियार भी विकसित करने में लगी हैं जो पर्याप्त दूरी से वार कर सकें।

दीवार पर चलेगी कार
 अब तक तकनीक की दुनिया में रोबोट कारों ने बढ़िया प्रदर्शन कर अच्छी जगह बनाई हुई है और अब नई तकनीक के दौरान रोबोटिक कारों का दीवार पर चलाना भी संभव हो गया है। डिज्नी और इटीएच ने एक बेहद अलग तरह की खोज कर एक रोबोट का नमूना तैयार किया है जो दीवार पर चल सकता है। खास बात यह है कि यह ईंटों वाले सख्त रास्तों पर भी आसानी से चल सकता है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इस तकनीक से ऐसी रोबोटिक कारें बनाई जाएगी जिन्हें मिशन के दौरान हर जगह पर भेजा जा सकेगा।

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इशारों से नाचेगी दुनिया
आने वाले समय में विज्ञान किस मोड़ पर जाएगा यह अंदाजा लगाना तो मुश्किल है लेकिन एक बात तय है कि व्यक्ति डिजिटल होता चला जाएगा। बीस - तीस साल बाद की दुनिया आज से बहुत ही अलग होगी। आज हम इंटरनेट को हौव्वा मानते हैं लेकिन भविष्य में यह बच्चा लगेगा। मसलन, वाई - फाई की जगह लाईफाई लेगा। इस लाईफाई के जरिए आप तीन घंटे की फिल्म तीन सेकेंड में डाउनलोड कर सकेंगे। स्मार्ट फोन को हम अल्टीमेट मानते हैं लेकिन यकीन मानिए आने वाले समय में सुपर स्मार्टफोन भी बनेगा। इस तरह की डिवाइसेज और ऐप जरूर आएंगे, जिसके जरिए हमारा काम बिल्कुल सीमित रह जाएगा। भविष्य में हमें बस सांस लेने भर की जरूरत रहेगी। बाकी सारा काम हमारी उंगलियां करेंगी। यानी इशारों पर नाचने वाली कहावत सही होगी और तकनीकी रूप से ताकतवर  इंसान दुनिया को नचाएगा। भविष्य में यह भी संभव है कि टेस्ट ट्यूब में खाना बने। ई- कॉमर्स कंपनियों ने हमारा काम को और आसान किया है। वहीं तमाम तरह के एप्स भी आए हैं जो चौंकाते हैं। ई- वॉलेट या मोबाईल - वॉलेट तो कमाल की चीज है। इसने कैश रखने के चलन को ही बदल कर रख दिया है। मोबाईल वॉलेट का भविष्य खूबसूरत है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कैशलेस होना इतना आसान है। हमारे यहां सरकार और कॉरपोरेट द्वारा कैशलेस होने का दबाव बनाया जा रहा है । हालांकि मेरे समझ से करीब अगले तीस सालों तक भारत को कैशलेस कर पाना बेहद मुश्किल भी है। यह भी सच है कि बैंकिंग कार्ड्स और ई- वॉलटे पर निर्भर होने के जितने फायदे हैं नुकसान भी कम नहीं है। सच कहूं तो मैं क्रेडिट कार्ड यूज करने से घबराता हूं क्योंकि इसके मिस यूज होने की संभावना बनी रहती है। कैशलेस होने का मतलब यह है कि इससे क्राइम का स्टैंडर्ड भी डिजिटल हो जाएगा। यानी कि चोरी - डकैती तो कम होगी लेकिन साइबर क्राइम बढ़ेगा। तकनीक की इस दुनिया में मानवीय मेले - जोल भी जरूरी है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि तकनीक ने हम सबको एक सीमित संसाधन में समेट कर रख दिया है। मसलन, फेसबुक को ही ले लें । हम कितना भी फेसबुक पर बात कर लें लेकिन फेस टू फेस बात करने का मजा कुछ अलग है।

पल्लव वाघेला
लेखक वरिष्ठ वैज्ञानिक पत्रकार हैं।
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ऐसे समझ लीजिए मोबाइल वॉलेट को

यह आपके स्मार्टफोन में मौजूद एक वर्चुअल वॉलेट जिसमें पैसे डिजिटल मनी के रूप में स्टोर किए जाते हैं। यानी कुलमिलाकर यह डिजिटल पर्स है जिसमें से पैसे का निकालकर आप पैसे का लेन-देन और पेमेंट कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर आप किसी कॉफी शॉप में जाते हैं। यदि यह कॉफी शॉप किसी मोबाइल वॉलेट सर्विस प्रोवाइड से जुड़ी हुई है तो आप कॉफी का पैसा अपने मोबाइल से चुका सकते हैं। आप एप, टेक्स्ट मैसेज, सोशल मीडिया या वेबसाइट से भी पैसा चुका सकते हैं। भारत में फिलहाल चार तरह के मोबाइल वॉलेट एक्टिव है। इनमें ओपन, सेमी-ओपन, सेमी-क्लोज्ड और क्लोज्ड। ओपन आपको किसी सामान या किसी सर्विस के लिए कीमत अदा करने की सुविधा देता है। इसके तहत आप बैंकिंग करने समेत पैसा ट्रांसफर कर सकते हैं। उदाहरण के लिए वोडाफोन का एम-पैसा ऎसा ही मोबाइल वॉलेट है। सेमी-ओपन के तहत आप उस व्यापारी अथवा दुकानदार के साथ ट्रांजेक्शन कर सकते हैं जिसका यह वॉलेट सर्विस प्रोवाइडर के साथ कॉन्ट्रैक्ट है। इसमें आप कैश नहीं निकाल सकते और ना ही पैसे वापस ले सकते हैं। इस वॉलेट में आप पैसा लोड करेंगे, उतना ही खर्च कर सकते हैं। एयरटेल मनी इसका उदाहरण है। वहीं क्लोज्ड काफी लोकप्रिय सर्विस है। इस वॉलेट में ऑर्डर के कैंसल या वापस होने पर व्यापारी अथवा दुकानदार के पास पैसा जब्त रहता है। जबकि सेमी क्लोज्ड वॉलेट के तहत आप ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं तथा कोई सर्विस भी ले सकते हैं, हालांकि इसमें आप कैश नहीं निकाल सकते।

मोबाइल वॉलेट के फायदे और नुकसान
आपका मनुअल वॉलेट यानी पर्स खो सकता है, चोरी हो सकता है, यहां तक की आपकी जेब भी काटी जा सकती है, लेकिन आपका मोबाइल वॉलेट न तो चोरी हो सकता है और न ही खो सकता है। आप मनुअल पर्स से पेमेंट करते हैं तो खुले पैसों की दिक्कत आ सकती है जैसे आपका बिल अगर 395.50 पैसा हुआ तो तो आपको खुले पैसों के लिए प्रोब्लम हो सकती है अथवा राउंड फिगर में पेमेंट करना पड़ सकता है। जिबकि मोबाइल वॉलेट में आपको खुले पैसों के भरटकने की जरूरत नहीं तथा पैसे भी उतने ही कटेंगे जितने का बिल हुआ यानी एक पैसा भी कम ज्यादा नहीं हो सकता। सबसे पहले तो यह उन लोगों के काम की चीज है जो टेक्नोफ्रेंडली हैं साथ इसके लिए अच्छी स्पीड वाले इंटरनेट कनेक्शन की भी जरूरत होती है। मोबाइल वॉलेट सर्विस प्रोवाइडर से बहुत कम संख्या में व्यापारी और दुकानदार लिस्टेड हैं। मोबाइल वॉलेट में प्रतिदिन के हिसाब से पैसे डिपॉजिट करने और खर्च करने की सीमा होती है।

Sunday, 3 January 2016

सबकी अपनी - अपनी भावना

वर्तमान दौर में हमारी भावनाएं बहुत संवेदनशील और असंयमित हो गई हैं। यह कभी भी और किसी भी रूप में आहत हो सकती हैं। पिछले कुछ समय से धर्म के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है। टीवी पर आपत्तिजनक कंटेंट दिखाए जाने की शिकायत करने के लिए गठित संस्‍था बीसीसीसी की हालिया रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है।  

' मैं जितने धर्मों को जानता हूं उन सब में हिंदू धर्म सबसे अधिक सहिष्‍णु है। इसमें कट्टरता का जो अभाव है वह मुझे बहुत पसंद आता है, क्‍योंकि इससे उसके अनुयायों को आत्‍माभिव्‍यक्ति के लिए अधिक-से-अधिक अवसर मिलता है। हिंदू धर्म एकांगी धर्म नहीं होने के कारण उसके अनुयायी न सिर्फ अन्‍य सब धर्मों पर आदर कर सकते हैं लेकिन दूसरे धर्मों में जो कुछ अच्‍छाई हो उसकी प्रशंसा भी कर सकते हैं और उसे हजम भी कर सकते हैं।' राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ये विचार वर्तमान दौर में प्रासंगिक हैं या नहीं इस बहस में पड़ने से पहले टीवी पर आपत्तिजनक कंटेंट दिखाए जाने की शिकायत करने के लिए 2011 में गठित संस्‍था ब्रॉडकास्‍ट कंटेंट कंप्लेंट्स काउंसिल (बीसीसीसी) की हालिया रिपोर्ट पर एक नजर डाल लेते हैं।  रिपोर्ट मे बताया गया है कि टेलीविजन के कंटेंट से संबंधित शिकायतों की प्रवृत्ति में बदलाव आया है।  रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई 2012 और नवंबर 2015 के बीच प्राप्त टीवी कंटेंट की करीब पांच हजार शिकायतों में से 28 प्रतिशत ‘धर्म व समुदाय’ से संबंधित थीं। यानी एक चौथाई से भी ज्यादा दर्शकों की भावनाएं आहत सिर्फ धर्म को लेकर हुईं।  मतलब साफ है कि भावनाएं आहत होने वाले दिलों की तादाद बढ़ी हैं। शायद हर चोट का इलाज दुनिया में है लेकिन ये बार-बार छोटी छोटी बात पर आहत होने वाली भावनाओं वाली बीमारी लाइलाज है। वर्तमान दौर में भावनाएं आहत होने के कई प्रकार हैं।  मसलन, सब टीवी पर प्रसारित होने वाले भगवान चित्रगुप्त पर आधारित कॉमेडी सीरियल 'यम हैं हम '  के कंटेंट को लेकर कुछ कायस्थ संस्थाओं ने बीसीसीसी के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि शो में चित्रगुप्त, जिन्हें कायस्‍थ अपना भगवान मानते हैं, को बेहद ही मजाकिया और गलत अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि सीरियल के कुछ एपिसोड देखने के बाद बीसीसीसी इस नतीजे पर पहुंची कि यह शो समाज के लिए अच्छे मैसेज देता है। इससे किसी भी धर्म अथवा समुदाय की भावना आहत नहीं होती है। इसी तरह सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाले शो 'संकटमोचन हनुमान' के बारे में कहा गया कि इस धारावाहिक के पात्र अजीबोगरीब हैं और इसमें भगवान हनुमान से संबंधि‌त मनगढ़ंत किस्से दिखाए गए हैं।  शो को देखने के बाद बीसीसीसी ने सारे आरोपों को खारिज किया और प्रसारण प्रतिबंध से भी इन्कार किया।  सवाल उठता है कि क्या सचमुच धार्मिक शो में तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है या यूं ही बात-बात पर भावनाएं आहत हो जाती हैं?  लाइफ ओके के चर्चित शो 'देवों के देव महादेव' के सहयोगी संपादक रह चुके देवदत्त पटनायक इस तरही की शिकायतों को बेतुका बताते हैं। वह कहते हैं, ' हमने अपने शो महादेव में भगवान शंकर की बेटी का भी जिक्र किया, जिसके बारे में किसी भी ग्रंथ में कुछ नहीं लिखा गया है लेकिन हमें एक लोककथा के जरिए इसकी जानकारी मिली और हमने दर्शकों के सामने इसी को अपने ढंग से प्रस्तुत कर दिया। अब आप ही बताइए, यह कौन तय करेगा कि क्या सही है और क्या गलत? मेरी समझ से ऐसे प्रयोगों की तारीफ होनी चाहिए। ' वह आगे कहते हैं, ' बीआर चोपड़ा के 'महाभारत' को ही देख लीजिए। पारंपरिक महाभारत को संपादित कर 12 अध्याय का कर दिया गया लेकिन आम धारणा यह बन गई कि चोपड़ा के 'महाभारत' जो दिखाया गया वो सही था। इसी तरह रामानंद सागर की 'रामायण' को देखकर भी लोगों ने अपने दिमाग में भगवान और उनके किस्सों की एक छवि बना ली।    हालांकि यह सीरियल सिर्फ तुलसीदास के रामचरित मानस से प्रेरित था। आज तक दक्षिण भारत के रामायण का कह‌ीं जिक्र नहीं किया गया है।' देवदत्त आगे कहते  हैं, ' उदाहरण के तौर पर स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले शो 'सिया के राम' को ले लीजिए। अब तक हम सीता को एक बेबस और लाचार स्‍त्री के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं लेकिन इस शो के जरिए पहली बार दर्शकों को रामायण, सीता की नजर से देखने का मौका मिल रहा है। ऐसा भी नहीं है कि शो में मनगढ़ंत किस्से दिखाए जा रहे हैं । यह दक्षिण भारत के रामायण से प्रेरित धारावाहिक है।  इसमें बताया गया है कि सीता सिर्फ एक बेबस लड़की नहीं है बल्कि शिक्षित और मजबूत भी है। ' इस बाबत सीरियल 'महाभारत' के प्रोड्यूसर सिद्घार्थ तिवारी कहते हैं,' जब भगवान को उस तरह से पेश किया जाता है जैसे साधारण लोग रहते हैं और व्यवहार करते हैं तब लोग इस तरह की कल्पना से ज्यादा जुड़ाव महसूस कर पाते हैं चाहे वह कोई भी दौर रहा हो। ' हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि ज्यादातर मामलों में भावनाएं खुद नहीं भड़कतीं, बल्कि भड़काई जाती हैं।  वर्ना भावनाएं आहत तो भोजपुरी भजन ‘ऐ गणेश के पापा’ के बोल पर भी हो सकती थीं। भोजपुरी गायिका कल्पना द्वारा गया यह भजन पूरे उत्तर भारत में मशहूर हुआ था। आज भी धार्मिक उत्सवों में यह भजन जरूर बजता है लेकिन कहीं कोई विरोध के स्वर नहीं उठते हैं। जानकार मानते हैं कि भावनाएं आहत होने के पीछे पहचान स्थापित करने की एक कोशिश भी होती है।

'हिंदुत्व में हर विचार के लोगों के लिए जगह'
दीवी सीरियल के कुछ दर्शकों की भावनाएं भले ही बहुत जल्द आहत हो जाती हों लेकिन हिंदुत्व की मूल अवधारणा इससे भिन्न है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुत्व की जड़ता पर प्रहार करते हुए उसकी उदारता की व्याख्या किया और कहा, ' यह एक ऐसा धर्म है जिसका कोई एक संस्‍थापक नहीं है। इसका कोई एक धर्मग्रंथ नहीं है और न ही इनकी सीखों का एक रूप है। इसे सनातन धर्म के तौर पर बताया गया है। यह सदियों की प्रेरणा और सामुदायिक समझदारी की परिणति है। हिंदुत्व इसी का प्रचार - प्रसार है।  जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस  एनवी रमन्ना की पीठ ने मंदिरों में पुजारियों की नियुक्तियों के फैसले के संदर्भ में हिंदुत्व के बारे में कहा, ' लोगों का समूह जिन विचारों को
मानता है धर्म उसी को अपने में समाहित करता है। एक धर्म के रूप में हिंदुत्व किसी एक विचार को किनारे किए या उसे चुने बगैर सभी तरह के विचारों को अपने में जगह देता है। ' कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य से तो यह कहा जा सकता है कि हमारे धर्मनिरपेक्ष ढांचे के तहत धार्मिक मामलों से वह किनारे रहे लेकिन अदालतों से ऐसा नहीं कहा जा सकता है।'
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30 हजार के करीब शिकायतों का निपटारा बीसीसीसी ने 2011 में अपने गठन से लेकर इस साल नवंबर तक किया है।
01 फीसदी शिकायतें कलाकारों को धूम्रपान करते पेश करने तथा शराब व नशीले पदार्थों के सेवन के दृश्यों के प्रसारण से जुड़ी हैं। इन दृश्यों से घर के बड़े - बुर्जुग खफा हैं।
02 फीसदी शिकायतें आम बंदिशों की कैटेगरी में हैं। इनमें देश का गलत नक्शा दिखाना, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान और अदालत की कार्यवाही को गलत तरीके से दिखाना शामिल है।
08 प्रतिशत ने टीवी शोज में अभद्र भाषा के इस्तेमाल तथा अश्लीलता को लेकर शिकायत की है। विशेषकर अंग्रेजी कार्यक्रमों के कंटेंट की।
11 प्रतिशत शिकायतें डरावने व अंधविश्वास फैलाने वाले शो की हैं। शिकायत करने वाले ज्यादातर लोगों ने इनके प्रसारण समय पर सवाल उठाए हैं।
11 फीसदी शिकायतें क्राइम शोज के बारे में आई हैं। खासकर इनमें दिखाई जाने वाली शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा से लोग आहत हुए हैं।
28 प्रतिशत ने धार्मिक व पौराणिक कथाओं पर आधारित कार्यक्रमों को लेकर शिकायतें की हैं। इनका मानना है कि कुछ शो तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।
39 फीसदी शिकायतें विकलांग, बाल विवाह, शोषण, महिलाओं का रूढ़िवादी चित्रण और सार्वजनिक भावना को ठेस पहुंचाने वाले कंटेंट के प्रसारण से जुड़ी हैं।


क्या है बीसीसीसी?
चैनलों के लिए दिशा-निर्देश जारी करने व कार्यक्रमों से जुड़े सुधारात्मक उपाय सुझाने के लिए जून 2011 में भारतीय प्रसारण संघ ने बीसीसीसी का गठन किया गया था। इसमें 13 सदस्य हैं। यह काउंसिल न केवल दर्शकों से मिलने वाली शिकायतों की, बल्कि गैर सरकारी संगठनों व सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से मिलने वाली प्रतिक्रियाओं की भी समीक्षा करती है।


बन चुका है हिंदू लीगल सेल 
सीरियल अथवा फिल्मों के जरिए जिनकी भावनाएं आहत हुई जा रही हैं, उनके दिलों पर कानूनी मरहम लगाने के लिए हिंदू लीगल सेल बन चुका है। इसे देशभर के 100 से ज्यादा वकीलों ने पिछले साल लॉन्च किया था। यह संगठन 'हिंदू मानवाधिकारों' के लिए लड़ने के साथ ही आस्था के खिलाफ किसी भी अनादर से निपटेगा। इस सेल ने हाल में आमिर खान और 'पीके' के निर्माताओं के खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए एक मामला दर्ज कराया था। सेल ने फिल्ममेकर रामगोपाल वर्मा के गणेश चतुर्थी मनाने के औचित्य को लेकर किए गए ट्वीट्स को लेकर वर्मा के खिलाफ भी एक मामला दर्ज कराया था। 
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जिन धार्मिक शो की
हो चुकी है शिकायत

यम हैं हम
शिकायत ः सब टीवी पर प्रसारित होने वाला भगवान चित्रगुप्त जी पर आधारित कॉमेडी सीरियल 'यम हैं हम ' पर भगवान पर आपत्तिजनक टिप्पणी और तरह तरह के बेतुके व्यंग्य पर कई कायस्थ संस्थाओं ने अपना विरोध जाहिर किया है।  हालांकि सीरियल के कुछ एपिसोड देखने के बाद बीसीसीसी इस नतीजे पर पहुंची कि यह शो समाज के लिए अच्छे मैसेज देता है। इससे किसी भी धर्म अथवा समुदाय की भावना आहत नहीं होती है।
 
यम किसी से कम नहीं
शिकायतः एपिक चैनल के शो यम किसी से कम नहीं के बारे में कुछ लोगों का कहना है कि यम का किरदार कमजोर और लालची है।  यह किरदार भारतीय भगवान का उपहास उड़ाता है लेकिन बीसीसीसी ने माना कि शो में यम का किरदार कॉमिक और व्यंग्यात्मक है। इसमें कुछ भी  अनादरपूर्ण अथवा आहत करने वाला नहीं है।

संकटमोचन हनुमान
सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाले शो संकटमोचन हनुमान के बारे में कहा गया कि इस धारावाहिक के पात्र व्यंगात्मक और ऊटपटांग से हैं। इस शो को देखने के बाद बीसीसीसी ने सारे आरोपों को खारिज किया और प्रसारण प्रतिबंध से भी इन्कार किया। 

नारायन - नारायन
बिग मैजिक पर प्रसारित होने वाले शो नारायन - नारायन की भी शिकायत हो चुकी है।  आरोप है कि इस शो में नारद मुनि को बेहद कॉमिक और नौटंकी के अंदाज में पेश किया गया है और इसकी कहानियां फेक हैं। हालांकि बीसीसीसी ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया और इसे सिर्फ हास्य शो करार किया।   

महाभारत ः स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले एकता कपूर के शो महाभारत की भी शिकायत हुई थी। आरोप है कि इस शो के कंटेंट से छेड़छाड़ हुई है।  बीसीसीसी ने पाया कि यह शो एक अलग तरह का प्रयोग था। इस पर पाबंदी का सवाल नहीं है।    

देवों के देव महादेव ः लाइफ ओके का चर्चित सीरियल देवों के देव महादेव को लेकर भी बवाल मच चुका है। आरोप है कि  सीरियल में भगवान शिव और पार्वती के बीच के प्रेम को बेहद ही अश्लील तरीके से दिखाया गया है। साथ ही  ऐसे किस्से भी दिखाए गए हैं जिनका ग्रंथों में कहीं जिक्र नहीं है। हालांकि बीसीसीसी ने इस शो में किसी भी तरह की अश्लीलता होने और कंटेंट से छेड़छाड़ से इन्कार किया।   

 बुद्धा ः  जी टीवी के सीरियल  बुद्धा के कंटेंट को लेकर कई शिकायतें बीसीसीसी को मिलीं। आरोप है कि भगवान  बुद्ध के किरदार को जरूरत से ज्यादा ग्लैमर रूप दिया गया है। दिलचस्प यह है कि   बौद्ध धर्म के भगवान बुद्ध की जीवनी पर आधारित शो में कंटेंट से संबंधित शिकायतें हिंदू धर्म के लोगों ने किया। आरोपों को बीसीसीसी ने खारिज कर दिया।       

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जिन गानों ने बनाया भक्त 
और भगवान को मॉर्डन

बीडी जलइले से ज्योति जलइले तक…
2010 में आई फिल्म ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ में एक भजन ‘ज्योति जलाइले’ पर कुछ लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ी थी। सुखविंदर सिंह द्वारा गाया गया यह भजन फिल्म ‘ओमकारा’ के एक आइटम नंबर ‘बीड़ी जलाइले’ के तर्ज पर है। गुलजार द्वारा लिखे गए गीत बीड़ी जलाइले को बिपाशा बासु के ऊपर बेहद हॉट तरीके से फिल्माया गया था। कई ऐसे भी मॉर्डन भजन हैं जिन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में रिकॉर्ड किया गया लेकिन वह पूरे देश में मशहूर हुईं।

ऐ गणेश के पापा
भोजपुरी का बहुचर्चित भजन ‘ऐ गणेश के पापा’ बेहद लोकप्रिय हुआ था। 1997 में भोजपुरी गायिका कल्पना द्वारा गया यह भजन बिहार सहित पूर्वांचल में बेहद मशहूर हुआ था। इस भजन में देवी पार्वती और शंकर भगवान के बीच हो रही एक काल्पनिक वार्तालाप के साथ गाया गया है। देवी पार्वती शंकर भगवान को गणेश के पापा कहकर सबोंधित करती हैं और उनके लिए पत्थर पर भांग पीसने में अपनी असमर्थता जताती हैं। इस गाने की पूर्वांचल में आज भी खूब धूम है। 

राधा-कृष्ण की हरियाणवी लव स्टोरी
कुछ साल पहले एक हरियाणवी भजन पूरे हिंदी क्षेत्र में हिट हुआ था। इस भजन के बोल कुछ इस प्रकार थे- अरे रे मेरी जान है राधा, तेरे पे कुर्बान में राधा…रह न सकूंगा तुझसे दूर मैं… इस गीत में श्रीकृष्ण राधा से अपने प्रेम का इजहार कर रहे हैं। इस गाने की धूम आज भी है।

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हॉलीवुड में धर्म का बाजार गर्म

एक्स-मैन: एपोकैलिप्स ः  हाल ही में एक्‍स-मैन सीरीज की नई फिल्‍म का ट्रेलर जारी हुआ है, जिसका टाइटल है ‘एक्स-मैन: एपोकैलिप्स’। इसके ट्रेलर में फिल्‍म का विलेन खुद की तुलना हिन्‍दू देवता भगवान राम और कृष्‍ण से करता नजर आ रहा है। इस बारे में पता चलने पर अमेरिका में एक हिन्‍दू नेता राजन जेड ने इस डायलॉग को फिल्‍म से हटाने की मांग की है। खबरों के मुताबिक, फिल्‍म में अभिनेता ऑस्‍कर इसाक विलेन की भूमिका में हैं। ट्रेलर में वो एक डायलॉग बोलते नजर आ रहे हैं 'मुझे जिंदगी में कई बार कई नामों से पुकारा गया है। राम, कृष्ण और यावेह।' राजन जेड ने डायरेक्‍टर ब्रायन सिंगर से इस डायलॉग को ट्रेलर और फिल्‍म दोनों से हटाने की मांग की है, क्‍योंकि यह डायलॉग धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है।

आइज वाइड शट: श्रीलंकाई तमिल कर्नाटक शैली के गायक मानिकराम योगेश्वरन से लंदन के एक स्टूडियो ने गीता के श्लोक गाने के लिए बुलावा भेजा। वह काफी खुश हुए, क्योंकि उन्हें विश्व स्तर पर परफॉर्म करने का मौका मिल रहा था लेकिन इसका इस्तेमाल स्टेनले क्यूब्रिकके निर्देशन में बनी विवादित फिल्म आइज वाइड में टॉम कू्रज और निकोल किडमैन के अंतरंग दृश्यों के फिल्मांकन में किया गया। योगेश्वरन को पता भी नहीं था कि उनके द्वारा गया श्लोक का इस्तेमाल इस तरह से किया जाएगा।

होली स्मोक: इसी कड़ी में केट विंसलेट और हार्वे केटल अभिनीत फिल्म होली स्मोक को भी कई आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इसकी भारत में शूटिंग को लेकर कहा गया कि इसमें हिंदू धर्म को नास्तिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

नाइन लाइव्स: विश्व प्रसिद्ध सोनी म्यूजिक ने वर्ष 1997 में नाइन लाइव्स सीडी निकाली थी। इसमें भगवान कृष्ण को अपमानजनक मुद्रा में दिखाया गया था। भगवान कृष्ण के सीने से ऊपर का हिस्सा बिल्ली का था।

इंडियाना जोंस एंड टेंपल आॅफ डूम: स्पिलबर्ग ने इंडियाना जोंस और द टेंपल आॅफ डूम में दो औरतों के चित्र दिखाए, जिसमें एक को विदूषक और दूसरी को दुष्टात्मा के रूप में दिखाया गया। सर्वविदित है कि हिंदू धर्म में देवी काली को बुराइयों को खत्म करने वाली शक्ति के रूप में जाना जाता है, लेकिन स्पिलबर्ग ने उन्हें दानवी के रूप में दर्शाया।

मडोना: वर्ष 1998 में एमटीवी अवार्ड समारोह के दौरान मडोना ने खुद को भगवान शिव की वेशभूषा में प्रस्तुत करके अंतराष्ट्रीय फैशन जगत में हलचल मचा दी थी। मडोना ने इस बात को काफी भुनाया।

टूडी स्टेलर: हाल में लंदन के रॉयल ओपेरा हाउस के तिब्बती पीस गार्डेन में पॉप स्टार स्टींग्स की पत्नी टूडी स्टेलर एक ऐसी स्कर्ट में दिखी, जो भगवान गणेश के परिधानों की डिजाइन पर आधारित थी। इस ड्रेस की तारीफ तो हुई, पर ऐसे वस्त्रों पर हिंदुओं के देवी-देवताओं के चिन्हों-प्रतीकों का इस्तेमाल धर्म विरुद्ध है।

जेना: वॉरियर प्रिंसेस: 1999 के फरवरी माह में दुनिया के सबसे मशहूर टीवी सीरियलों में से एक जेना: वॉरियर प्रिंसेस में कृष्ण, हनुमान, काली और इंद्रजीत जैसे हिंदू देवताओं को इस अंदाज में दिखाया गया, जिसकी चर्चा हमारे धर्मग्रंथों या किंवदंतियों में कहीं नहीं है।

माइक मायर: वर्ष 1999 के अप्रैल माह में वैनिटी फायर के लिए फोटोग्राफर डेविड ला चैपल माइक मायर के शॉट्स ले रहे थे। इन शॉट्स में माइक मायर ने हिंदू देवी-देवताओं की वेशभूषा में एक कार्टूनिस्ट की तरह पोज दिया था। दक्षिण एशियाई पत्रकार संघ के सदस्यों ने इसकी निंदा की और कहा कि यह हिंदू देवी-देवताओं का घोर अपमान है, पर न्यूज वीक ने इस संदर्भ में सफाई दी कि हो सकता है, इस समय हॉलीवुड हिंदूवाद को बढ़ावा दे रहा हो।


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जिनसे आहत हुई भावना
 'धर्म संकट' ः हाल ही में रिलीज हुई फ‍िल्‍म 'धर्म संकट ' को लेकर बवाल मच चुका है। फ‍िल्‍म में एक्‍टर परेश रावल, नसीरुद्दीन शाह और अनु कपूर के जरिए की गई कॉमेडी ने कुछ विवादित मुद्दे खड़े कर दिए। पूरी फ‍िल्‍म एक कट्टर हिंदू (परेश रावल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसको बड़े होने के बाद इस बात का पता चलता है कि वह तो पैदायशी मुस्लिम है। उसे हिंदू परिवार ने सिर्फ गोद लिया था। फ‍िल्‍म का प्‍लॉट इतना विवादास्‍पद है कि सेंसर बोर्ड को भी फ‍िल्‍म को सर्टिफ‍िकेट देने से पहले एक पंडित और एक मौलवी को बुलवा कर पहले उन्‍हें फ‍िल्‍म दिखानी पड़ी। उसके बाद सर्टिफ‍िकेशन प्रोसेस को ध्‍यान में रखते हुए उनसे पूछा गया कि क्या कहीं कोई विवादास्‍पद सीन फ‍िल्‍म से काटना है?

पीके (2014)
बीते साल रिलीज हुई ये फ‍िल्‍म जितनी बड़ी हिट हुई, उतनी ही ज्‍यादा कंट्रोवर्शियल भी रही। आमिर खान ने फ‍िल्‍म में एक एलियन का किरदार निभाया, जो गलती से धरती पर आ जाता है।  यहां आकर वह लोगों के निजी फायदे के लिए धर्म के गलत इस्‍तेमाल को देखते है और उससे काफी आहत होता है। फ‍िल्‍म में ज्‍यादातर हिंदू धर्म से जुड़ी चीजों को दिखाया गया है। ऐसे में हिंदू धर्म से जुड़े कुछ लोगों ने आवाज उठाई कि फ‍िल्‍म में हिंदुत्‍व के गलत चेहरे को दिखाया गया है और अनावश्‍यक रूप से हिंदू रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाया गया है।

'दोजख: स्वर्ग की खोज में' (2015)
फ‍िल्‍म मुस्लिम पिता और बेटे पर आधारित है, जो फ‍िल्‍म की शुरुआत से ही इस्‍लाम धर्म के कट्टर अनुयायी दिखाए गए हैं। कट्टर मुस्लिम पिता इस बात को बिल्‍कुल भी पसंद नहीं करता है कि उसके बेटे की दोस्‍ती एक हिंदू पुजारी से है। बेटा हिंदू रीति-रिवाजों और त्‍योहारों को काफी पसंद करने लगता है। यहीं से खड़ा होता है विवाद और ये कट्टर पिता अपने बेटे को खो देता है। आखिर में कट्टर पिता इस बात को मान लेता है कि उसे धर्म से ज्‍यादा अपने बेटे की जरूरत है।

'ओह माय गॉड' (2012)  
इस कॉमेडी ड्रामा फ‍िल्‍म में समाज के लिए एक खास संदेश दिया गया है। पूरी फ‍िल्‍म एक नास्तिक के आसपास घूमती है। कई मसाला मूवी के बीच में यह फ‍िल्‍म एक ताजी हवा की तरह थी। फ‍िल्‍म में धर्म के नाम पर जमकर हो रहे व्यावसायीकरण पर प्रकाश डाला गया है। यह फ‍िल्‍म उस देश के लिए बनाई गई जहां हजारों लोग भगवान के अवतार कहे जाने वाले लोगों की पूजा करते हैं, उन पर अंधा विश्‍वास करते हैं। फ‍िल्‍म को कई जगह विवादों का सामना करना पड़ा। मध्‍यप्रदेश हाईकोर्ट ने सेंसर बोर्ड से फ‍िल्‍म में हिदू धर्म को लेकर बोले गए शब्‍दों के खिलाफ एक्‍शन लेने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने यह आदेश एक याचिका के आधार पर दिया। काफी तनाव और विवादों के बाद फ‍िल्‍म आगे बढ़ सकी, लेकिन बड़ी संख्‍या में दर्शकों ने फ‍िल्‍म को पसंद भी किया।

मोहल्ला अस्सी ः उपन्यास पर आधारित सनी देओल की फिल्म 'मोहल्ला अस्सी ' भी विवादों में रही। फिल्म पर हिंदू भावनाओं के विपरीत बताने के आरोप को काफी गंभीरता से लेते हुए स्टार कॉस्टिंग को समन जारी किए गए। दायर मामले में कहा गया कि फिल्म मोहल्ला अस्सी में कलाकार को भगवान शंकर का वेश धारण कर गाली-गलौज करते हुए दिखाया गया है। इसके अलावा फिल्म में धार्मिक नगर को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने फिल्म पर रोक भी लगा दी।

बजरंगी भाईजान ः साल 2015 की सुपरहिट फिल्मों में एक बजरंगी भाईजान के टाइटल को लेकर बवाल मचा। आरोप हैं कि फिल्म का टाइटल भगवान हनुमान के उपनाम से प्रेरित है। साथ ही कुछ हिंदू संगठनों ने कोर्ट में  कहा कि फिल्म के एक गाने ' सेल्फी ले ले रे.. ' में हनुमान चालीसा का मजाक उड़ाया गया है। हालांकि कोर्ट में फिल्म को हरी झंडी मिल गई। 

गुड्डू रंगीला ः निर्देशक सुभाष कपूर की फिल्म ‘गुड्डू रंगीला’ के एक गाने ‘ कल रात माता का मुझे ईमेल आया है’ को लेकर इसके निर्माताओं को धमकी मिली।  बाद में सेंसर बोर्ड ने फिल्म के कई संवादों पर कैंची चलाई।

विश्वरूपम : कमल हसन की जासूसी रोमांचक फिल्म 'विश्वरूपम' पर मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताते हुए कहा था कि फिल्म में समुदाय को गलत रूप में दिखाया गया है। इसके अलावा कमल की एक और फिल्म 'दशावतरम' को लेकर भी बवाल मचा । 

एमएसजी : डेरा सच्चा सौदा के संत गुरमीत राम रहीम सिंह की फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड (एमएसजी) रिलीज होने से पहले ही सुर्खियों में रही। गुरमीत राम रहीम सिंह पर गुरू गोविंद सिंह जी की नकल करने के जो आरोप लगे। साथ ही सेंसर बोर्ड ने 'एमएसजी' की रिलीज पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इसमें राम रहीम ने खुद को 'भगवान' के रूप में पेश किया है। इससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।

जो बोले सो निहाल : पंजाब में सिख संगठनों ने इस फिल्‍म का विरोध किया और धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया।

बाहुबली ः इस साल की सुपरहिट फिल्म बाहुबली को लेकर भी विवाद हुआ। फिल्म के एक सीन में अभिनेता प्रभाष भगवान शिव की मुर्ति को उखाड़ कर कंधे पर रख लेता है। इस सीन को लेकर कुछ हिंदू संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। 
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Sunday, 6 December 2015

किस से किसको डर


 सेंसर बोर्ड का सेंस ऑफ ह्यूमर भी कमाल का है।  'संस्कृति' की रक्षा में कभी-कभी यह किसिंग सीन तक को भी काट देता है। अभी हाल में जेम्स बांड की फिल्म 'स्पेक्टर' के किस‌िंग सीन पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चलाई तो 13 सेकेंड का किस सिर्फ आठ सेकेंड का रह गया।  ऐसे में दर्शकों के जेहन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि एक आदर्श किस कितने सेकंड का होता है?  कितने सेकेंड के बाद किस को आपत्तिजनक कहा जा सकता है?    

'कुत्ते कमीने, मैं तेरा खून पी जाऊंगा' धर्मेंद्र के मुंह से इस डायलॉग को निकले चार दशक से ज्यादा समय हो चुका है लेकिन आज भी हिंदी सिनेमा का यह सबसे यादगार डायलॉग बना हुआ है। सोचिए, धर्मेंद्र को अगर वर्तमान दौर में यह संवाद बोलना होता तो इसकी सूरत कैसी होती। यह कुछ इस तरह से होता, बीप...बीप...मैं तेरा खून पी जाऊंगा या फिर कुछ और संस्कारी रूप में ऐसा होता, बाबूजी मैं आपका खून पी जाऊंगा। पहली नजर में यह व्यंगात्मक और बिना सिर पैर की बातें हो सकती हैं लेकिन पिछले कुछ समय से सेंसर बोर्ड की 'संस्कारी छवि' की सोशल मीडिया पर कुछ इसी अंदाज में चर्चा हो रही ह‌ै। सेंसर बोर्ड की इस संस्कारी छवि की हालिया ‌शिकार हेट स्टोरी सीरीज की तीसरी फिल्म है लेकिन सुर्खियां बटोरी जेम्स बांड की हालिया रिलीज फिल्म ‘स्पेक्टर’ ने। ‘स्पेक्टर’ के एक किस सीन को 50 फीसदी तक काट दिया गया।  नतीजा यह हुआ कि इस फिल्म में बांड के ‘किस’ इतने छोटे हो गए कि दर्शक एकदम निराश हो गए। फिल्म देखने के बाद उनको मालूम ही नहीं होता कि बांड ‘किस’ कर रहा है कि होठ से होठ मिलाकर कुछ फुसफुसा रहा है। जो जेम्स बांड के प्रशंसक हैं, वह जानते हैं कि उनकी हर फिल्म में जासूसी खलनायकों को जान से मारने, उनके ठिकानों को नेस्तनाबूद करने और सुंदरियों के साथ ‘किस’ करने अथवा संबंध बनाने के बिना पूरी नहीं होती और ये ऐसे ब्रांडीय चिह्न हैं जो अगर न हो तो लगता है कि हम बांड का कोई नैतिक संस्करण देख रहे हैं। भारतीय दर्शकों को बांड को लेकर सेंसर बोर्ड की यह नैतिकता पसंद नहीं आई जिसका सीधा फायदा फिल्म को हुआ। ‘स्पेक्टर’ यहां रिलीज होने के बाद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाते हुए 69 करोड़ रुपये की रिकॉर्डतोड़ कमाई कर ली है। यहां यह बता दें कि ‘स्पेक्टर' की कमाई का आंकड़ा बॉलीवुड की कई बड़े बैनर की फिल्मों की कमाई से कहीं ज्यादा है। सोनी पिक्चर्स इंडिया ने अंग्रेजी, हिंदी, तमिल और तेलुगू भाषा में करीब 1250 स्क्रीनों पर फिल्म को रिलीज किया है।  अगर दुनिया भर की बात करें तो रिलीज होने के 35 दिनों के भीतर ही फिल्म ने कुल मिलाकर 75,191, 6219 डॉलर यानी करीब 50,21,33,03,467 रुपये की कमाई कर ली है। जिससे यह ना केवल लंदन बल्कि दुनियाभर में एक ब्लॉकबस्टर साबित हुई है।  दर्शकों के जेहन में सबसे बड़ा सवाल यही था कि उन्हें बांड के किस सीन से दूर रखने की कोशिश क्यों की गई? खजुराहो और कामसूत्र की रचना जिस संस्कृति में हुई हो, वहां किसिंग सीन पर कैंची समझ से परे है। ऐसा तो है नहीं कि हमारे यहां के दर्शक आज तक 'अति-उत्तेजित' कर देने वाले किसिंग सीन से आंखे चार न किए हों। इमरान हाशमी से लेकर आमिर खान, करिश्मा कपूर  माधुरी दीक्षित, विनोद खन्ना, ऋषि कपूर तक के किसिंग सीन का 'आंखों-देखा' हाल दर्शक बता सकते हैं। ‌अगर फिल्मों के इतर धारावाहिकों की बात करें तो यहां हर दिन किसी न किसी चैनल पर आपको किस‌िंग सीन देखने को मिल ही जाएंगे। कब इशिता और रमन (सीरियल ये हैं मोहब्बतें ) की लड़ाई किस में बदल जाती है और कब सूरज और संध्या (दीया और बाती हम )का प्यार बिस्तर तक पहुंच जाता है, यह 'सीरियल मरीज' परिवार के किसी भी सदस्य से छुपा नहीं है। तो फिर सवाल लाजिमी है कि ऐसे में किस के मानक और समयावधि को कौन तय करेगा? क्या हमें किस को समझने, समझाने और इसको लेकर दायरे को बढ़ाने की जरूरत है?  खैर, बांड की फिल्म ‘स्पेक्टर’ ने कमाई का कीर्तिमान रच दिया है और पूरा किसिंग सीन यू-ट्यूब पर वायरल भी हो चुका है। इंटरनेट की दुनिया में सेंसर बोर्ड की संस्कारी छवि कारगर साबित होगी अभी तो ऐसा नहीं लग रहा है लेकिन किरकिरी जरूर जारी है। ऐसे मामलों में युवा पहले भी अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं, जब 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों से पूर्व खेलों की आयोजन समिति ने अपनी वेबसाइट पर पर्यटकों को सलाह देते हुए लिखा था ‘पर्यटकों यह पता होना चाहिए कि सार्वजनिक स्थलों पर एक-दूसरे को गले लगाने या किस लेने को भारतीय समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है।’ तब भी ऐसे विचारों का विरोध हुआ था। 2014 में केरल से शुरू हुए ‘किस ऑफ लव’ कैंपेन को कौन भूला जा सकता है। एक 'किस' किस कदर क्रांति में तब्दील हो जाती है यह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक कॉफी शॉप में प्रेमी जोड़ों की सरेआम पिटाई के बाद इस अभियान के तहत दिल्ली तक युवाओं ने एक-दूसरे को किस कर विरोध दर्ज कराया था। इसके बावजूद समझने और समझाने का दौर जारी है। किस के वैज्ञानिक तथ्यों को समझें तो होंठ बेहद नाजुक और संवेदनशील अंग होते हैं। किस के दौरान दिमाग के सोमाटोसेंसरी कॉर्टेक्स को सिग्नल मिलता है, जो पार्टनर की भावनाएं समझाने में मदद करता है। शोधकर्ता गॉर्डन गैलप के मुताबिक, जिन संस्कृतियों में चुंबन की परंपरा नहीं है, वहां पार्टनर एक-दूसरे के चेहरे पर चेहरा रगड़कर या नाक से नाक रगड़कर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं। वह कहते हैं ‘हमें अपने नजरिए को बदलने की जरूरत है। हर बार किस को अश्लीलता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।’ लेकिन यह बात समाज को समझने में कितना समय लगेगा यह कहा नहीं जा सकता है। पहलाज निहलानी और टीम ने जेेम्स बॉन्ड के किस सीन पर कैंची चलाकर जो किया वह सही है या गलत इसका फैसला सही मायनों में उस दिन होगा, जिस दिन हम वाकई किस की गहराई को समझने और समझाने से आगे निकलकर इसे अपनाने की ओर बढ़ रहे होंगे। तब तक पता नहीं ...और कितने ‘जेम्स बॉन्ड’ पर कैंची चलेगी।  


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मतलब सिर्फ चूमना नहीं

किस का मतलब सिर्फ चूमना नहीं है, तो फिर क्या है। जैसा कि उन्नीसवीं सदी के वैज्ञानिक हेनरी गिब्सन ने लिखा था, शारीरिक संदर्भ में बात करें तो यह अवरोधिनी मांसपेशियों का निकट संपर्क है।' लेकिन सिर्फ यह वैज्ञानिक परिभाषा किस को समझने के लिए काफी नहीं है। एक किस का क्या क्या मतलब हो सकता है, इस बताने के लिए लाना सित्रोन ने एक पूरी किताब लिख डाली, जिसका नाम है किस का असली मतलब। इस किताब में वह लिखती हैं कि वैज्ञानिक परिभाषाओं से परे कैसे विभिन्न समाजों, फिल्मों, कला और साहित्य में किस के मायने बदलते रहे हैं। यह किताब बताती है कि चुंबन सिर्फ दो प्यार करने वालों की बपौती नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल विभिन्न मकसदों को हासिल करना भी रहा है।

इतिहास है पुराना

प्राचीन रोमन लोग एक चुंबन के साथ किसी भी समझौते पर आधिकारिक रूप से मुहर लगाते थे। पांचवीं सदी में ईसाई अपनी एकजुटता दिखाने के लिए किस किया करते थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि रोमनों से शुरू हुई इस परंपरा में पति यह जांचने के लिए अपनी बेगमों को चूमते थे कि कहीं वह उसकी अनुपस्थिति में शराब तो नहीं पी रही थीं।  इस दिलचस्प इतिहास को पीछे छोड़ते हुए जब हम प्रागैतिहासिक काल में पहुंचते हैं तो यह पाते हैं कि पुरुष या महिला अपने होने वाले पार्टनर के स्वास्थ्य की स्थिति चुंबन से हासिल लार से जानने के लिए चुंबन करते थे।  आलोचकों ने इस नैतिक मूल्यों के लिए खतरा समझते हुए  किसी व्यक्ति के मुंह पर किस करने की बजाय किसी लकड़ी के टुकड़े को किस करने की परंपरा बना डाली। यह परंपरा हजारों साल बाद आज भी जारी है। आज भी लोग धार्मिक साहित्य, क्रूस, पैर, हाथ, अंगूठी, जमीन, भाग्यशाली समझे जाने वाली चीज, ट्रॉफी और यहां तक कि मेंढ़कों को भी चूमते हैं। पशुओं में भी एक दूसरे को चूमने की प्रवृत्ति पाई जाती है। जैविक रूप से इंसानों के सबसे नजदीकी रिश्तेदार बंदर भी एक दूसरे को खूब चूमते हैं। चिंपाजी तो कई बार फ्रेंच किस भी करते देखे गए हैं।

यहां किस करना गुनाह है
वैसे चूमना हर संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा है। दक्षिणी अफ्रीका में संगान लोगों को किस से नफरत है और जब भी वे ऐसा होते देखते हैं तो अपनी नाराजी को जाहिर करने से हिचकते भी नहीं हैं। स्वीडन के लापलैंड इलाके की संस्कृति में भी किस को अच्छी बात नहीं समझा जाता। वहीं कुछ सभ्यताओं में चुंबन को सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है।


बड़ी काम की चीज

वैसे किस करने के काफी फायदे भी हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग अकसर किस करते हैं, उन्हें पेट और मूत्राशय से जुड़ी तकलीफें कम होती हैं। उन्हें संक्रमण भी कम ही होता है। किस करना दिल के लिए भी अच्छा होता है। इससे ब्लड प्रेशर कम होता है, मस्तिष्क सक्रिय रहता है, प्रसन्नता के हार्मोन्स पैदा होते हैं और इससे खुद को लेकर जागरुकता भी बढ़ती है। हालांकि प्यार करने वालों को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद उन्हें पता भी न हो कि जब कोई किसी को किस करता है तो उसके लिए चेहरे की 30 मांसपेशियां काम आती हैं। एक किस के लिए दो से छह कैलोरी की जरूरत पड़ती है।  जानकारों का मानना है कि एक चुंबन प्रेम, जोश, एक दूसरे के प्रति सम्मान, खुशआमदीद, दोस्ती और शांति जैसी भावनाएं जाग्रत करता है। अध्ययन बताते हैं कि कोई किसी को बेवजह किस नहीं करता। इसके पीछे कोई न कोई वजह होती है। सिर्फ मजे के लिए ही किस नहीं किया जाता। खास कर महिलाएं यह बात परखने के लिए किस करती है कि संभावित पार्टनर कितनी दूर तक साथ देगा, वहीं पुरुष महिलाओं से शारीरिक संबंध बनाने की संभावनाएं बढ़ाने के लिए किस का इस्तेमाल करते हैं।


अधिक समय तक जीते हैं चुंबन करने वाले

चिकित्सा वैज्ञानिकों का मानना है कि चुंबन के दौरान जब दोनों की जीभ एक दूसरे से टकराती है तो मुंह में एक के बाद एक कई प्रक्रियाएं सक्रिय हो जाती हैं। इससे रोग निरोधक शक्ति को बढ़ावा मिलता है। मुंह में एक्स्ट्रा सलाइवा रह जाता है वह दांतों में जमे प्लॉक को तोड़कर हटाने में सहायक होता है।  हाल ही में आए एक शोध अध्ययन से मालूम हुआ है कि जो कपल हर दिन सुबह एक दूसरे का चुंबन लेते हैं वे दूसरों की तुलना में पांच साल तक अधिक जीते हैं। प्रेम के आवेग में लिए गए चुंबन से तनाव घट जाता है, कॉर्टीसॉल स्ट्रेस हारमोन कम हो जाते हैं। चेहरे की मांसपेशियां ढीली नहीं पड़तीं और गाल लटकने की समस्या खड़ी ही नहीं होती। चुंबन हार्ट की सेहत के लिए भी अच्छा है क्योंकि चुंबन दिल की धड़कनों की गति बढ़ा देता है, इससे पूरे शरीर में खून का संचार तेज हो जाता है। चुंबन के दौरान प्राकृतिक एंटिबायोटिक्स का स्राव शरीर में अपने आप बढ़ जाता है। चुंबन के बाद शरीर में रह गए थूक में इस तरह का एक एंटीसेप्टिक रसायन भी मौजूद रहता है जो पीड़ा और दर्द को कम करने में मददगार साबित होता है। इसीलिए कहा है कि अच्छे और रसीले चुंबन से उत्पन्न एंडोर्फिन हारमोन मॉर्फीन नामक तेज दर्द निवारक से भी ताकतवर होते हैं।


कैसा हो किस, गीला या सूखा ?
कपल्स की चुंबन को लेकर अलग-अलग राय है। कपल्स भी कई बार एक मत नहीं होते। महिला चाहती है कि वह सूखे चुंबन से संतुष्ट है जबकि पुरुष गीला चुंबन चाहता है। जाहिर है कि इन दोनों के बीच जब भी चुंबन की स्थिति बनेगी वह एक किस्म के तनाव को जन्म देगी। कई कपल गीला चुबंन तो चाहते हैं लेकिन जीभों का आपस में संघर्ष करना उन्हें ठीक नहीं लगता है। कुछ महिलाएं खासकर भारतीय परिवेश में चुंबन को गैर जरूरी मानती हैं। उनकी नजर में सेक्स से चुंबन का कोई लेना देना नहीं होता तो फिर क्यों बेवजह चुंबन करें। कपल्स अंततः उसी नतीजे पर आकर रुकें जिसमें दोनों पार्टनर सहमत हों,फिर चुंबन सूखा रहे तो रहे उससे क्या फर्क पड़ता है?
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चुंबन के प्रकार

बटरफ्लाय किस - जब आप भरी महफिल में अपने साथी को चूमना चाहते हैं तो चूमने का यह तरीका आपकी काफी मदद कर सकता है। इसके लिए सबसे पहले आप अपने साथी की ओर लगातार देखें, जब तक उसका ध्यान आपकी ओर न पहुंच जाए। इसके बाद अपनी पलकें बार-बार झपकाएं। यदि आप इसे ठीक से करते हैं तो आपकी महबूबा आपके इशारे को आसानी से समझ जाएंगी।

फ्रेंच किस - अपनी रोमांटिक भावना को प्रिय तक पहुंचाने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका। इस प्रकार का चुंबन आत्मीय चुंबन कहलाता है। इस प्रकार का चुंबन लेने के लिए अपनी उनको नजदीक लाकर अपनी और उनकी जीभ को टकराया जाता है। दरअसल इसमें जीभ ही महत्वपूर्ण रहती है। उत्तेजना को बढ़ाने वाले इस चुंबन को अधिकतर लोग अपनाते हैं और सही तरीके से अंजाम देते हैं।

एस्किमो किस - चूमने का यह तरीका कुछ हटकर है, जो आपको प्रेम के साथ-साथ थोड़ा मजा भी दिलाएगा। इसके लिए अपने साथी के चेहरे को हाथों में लेकर नाक को आपस में धीमे-धीमे स्पर्श करें। याद रखें ये क्रिया इतनी धीमे से होनी चाहिए कि इसके माध्यम से होने वाली अनुभूति आप महसूस कर सकें।

फ्रीज/मेल्ट किस - यकीनन किस करने का यह तरीका आपके रोमांटिक मूड में न केवल वृद्धि करेगा बल्कि रोमांस में थोड़ी सी मस्ती भी भर देगा। इसके लिए आप अपने मुंह में बर्फ का एक छोटा सा टुकड़ा रखें। अब अपनी मेहबूबा को चूमें और बर्फ का ये टुकड़ा उनके मुंह में डाल दें। इस क्रिया को दोनों दोहराएं। यह नए तरीके का फ्रेंच किस आपको चूमने का दोहरा मजा देगा।

ईयरलोब किस - ईयरलोब यानी की कानों का सिरा। जब आप अपनी मेहबूबा के नाजुक से कानों के नाजुक से किनारों को चूमते हैं तो उनका रोमांटिक मूड अचानक बढ़ जाता है क्योंकि ये ऐसी जगह है, हां चूमकर आप उनकी उत्तेजना को और बढ़ा देते हैं। लेकिन आपको सिर्फ इतना ध्यान रखना है कि इसे एकदम धीमे से और नजाकत से करें। अपनी सांसों पर पूरा नियंत्रण रखें।

कुछ अन्य

गालों पर चुंबन, हाथों पर चुंबन , माथे पर चुंबन

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यह भी है खास

टेक्सास के मशहूर मानवशास्त्री वॉन ब्रायंट ने चुंबन या किस पर लंबा शोध किया और पाया कि ऐसी किसी क्रिया के सबसे पहले लिखित प्रमाण 3,500 साल पुराने वेद, पुराणों और संस्कृत पाण्डुलिपियों में मिलते हैं।

2008 में दिल्ली के एक मेट्रो स्टेशन के पास किस करते पाए गए एक विवाहित जोड़े पर अश्लीलता फैलाने के आरोप में मुकदमा जड़ दिया गया। इस बार अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए साफ किया कि प्रेम जताना कोई गैरकानूनी काम नहीं हैं।

अमेरिकी मानवशास्त्री वॉन ब्रायंट बताते हैं कि किस शब्द की उत्पत्ति भी प्राचीन भारत में ही हुई होगी। प्राचीन काल में किसिंग को बूसा या बोसा भी कहा गया, जिससे इसका प्राचीन लैटिन नाम बासियम निकला। इसका आधुनिक जर्मन नाम कुस और अंग्रेजी नाम किस भी यहीं से निकला।

06 जुलाई को विश्व किस डे मनाया जाता है।
12 फरवरी को वैलेंटाइन वीक का किस डे मनाया जाता है।
10  सेकंड के एक चुंबन के दौरान करीब आठ करोड़ जीवाणु चुंबन करने वालों के मुंह में चले जाते हैं। नीदरलैंड के वैज्ञानिकों का एक दल इस नतीजे पर पहुंचा है।

700 प्रकार के जीवाणु करोड़ों की संख्या में मौजूद होते हैं इंसान के मुंह में लेकिन इनमें से कुछ ही ज्यादा तेजी से स्थानांतरित होते हैं।

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बॉलीवुड के विवादित किस

देविका और हिमांशु
1933 में आई हिन्दी फिल्म “कर्मा” में उस समय की मशहूर अदाकारा देविका रानी ने पर्दे पर एक्टर और असली जीवन में अपने पति हिमांशु राय को किस किया था। जिसको लेकर काफी बवाल मचा और महात्मा गांधी ने हिमांशु राय को पत्र भी लिख डाला। 


शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गियर
बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा की प्रसिद्धि के यूं तो कई कारण हैं, जिनसे कभी उन्हें पॉजिटिव पब्लिसिटी मिली तो कभी नकारात्मक अनुभवों का सामना करना पड़ा। शिल्पा ने साल 2007 में एक किस को लेकर सुर्खियां बटोरी थीं। दिल्ली में एड्स जागरूकता अभियान के तहत जब मंच पर अमेरिकी अभिनेता रिचर्ड गेरे ने शिल्पा को किस किया तो उन्हें खूब आलोचना का शिकार होना पड़ा। हालांकि, बाद में रिचर्ड ने पूरे देश से माफी मांग ली थी। मामले ने इतना तूल पकड़ा था कि राजस्थान की एक स्थानीय अदालत ने शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गेरे के खिलाफ गिरफ्तारी के आदेश भी दे दिए थे।


सिद्धार्थ माल्या और दीपिका पादुकोण
बात अप्रैल 2013 की है। कोलकाता के ईडन गार्डन स्टेडियम में आईपीएल टीम रॉयल चैलेंजर बंगलूरू और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच मैच चल रहा था। दीपिका, सिद्धार्थ माल्या के साथ बैठकर खेल का मजा ले रही थीं। जैसे ही रॉयल चैलेंजर ने नाइट राइडर्स पर अपनी जीत दर्ज की, सिद्धार्थ ने दीपिका को किस कर लिया। सिद्धार्थ माल्या द्वारा सरेआम दीपिका को किए गए किस ने खूब सुर्खियां बटोरीं।


शाहरुख खान और जोनाथन रॉस

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान भी किसिंग कॉन्ट्रोवर्सी से नहीं बच सके। बात तब की है जब जोनाथन रॉस का रियलिटी शो काफी पॉपुलर हो रहा था और किंग खान को इस शो में एक अतिथि के रूप में बुलाया गया था। एसआरके के इस शो में हिस्सा लेने के बाद सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर हुई, जिसमें वे एक शख्स को स्मूच करते दिखाई दे रहे थे। यह तस्वीर तेजी से सोशल मीडिया के साथ-साथ वर्ल्ड मीडिया में छाने लगी। कई लोग इसे मात्र फोटोशॉप की कलाकारी मान रहे थे।


पद्मिनी कोल्हापुरे ने किया प्रिंस चार्ल्स को

अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे के द्वारा किया गया एक किस आज भी बॉलीवुड के इतिहास में सबसे विवादित रियल किस में गिना जाता है। 1980 में प्रिंस चार्ल्स भारत दौरे पर आए थे। हालांकि, प्रिंस के चारो ओर z-सिक्युरिटी थी, लेकिन किसी बात की परवाह किए बगैर पद्मिनी ने उनके गाल पर किस किया था। फिर क्या, कई दिनों तक यह मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना रहा।


राखी सावंत और मीका सिंह

मॉडल और एक्ट्रेस राखी सावंत सिंगर मीका सिंह के बीच विवाद की शुरुआत एक किस से हुई थी। बात साल 2006 की है, जब राखी, मीका की बर्थ डे पार्टी में गई थीं। पार्टी में मीका ने राखी सावंत को किस कर डाला। फिर क्या, राखी का पारा सातवें असामान पर पहुंच गया। उन्होंने मीका द्वारा किए गए इस किस पर आपत्ति जताई। इतना ही नहीं, उन्होंने इस घटना की शिकायत पुलिस में भी की और मीका पर जबरदस्ती किस करने और छेड़छाड़ के आरोप लगाए।


क्रिस्टियानो रोनाल्डो और बिपाशा बसु

फुटबॉल खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो, जो पुर्तगाल टीम के लिए खेलते हैं, बंगाली बाला बिपाशा बसु संग किस को लेकर खूब चर्चा में रह चुके हैं। साल 2007 में दोनों की एक ऐसी तस्वीर मीडिया में आई थी, जिसमें व‌ह एक-दूसरे को किस कर रहे थे। दरअसल, यह तस्वीर एक पार्टी के दौरान खींची गई थी, जिसके सामने आने के बाद खूब हंगामा हुआ था। बिपाशा के कैरियर के ढलान की वजह इस किस को भी माना जाता है।


महेश भट्ट और पूजा भट्ट

डायरेक्टर-प्रोड्यूसर महेश भट्ट का बेटी पूजा भट्ट के साथ एक मैगजीन के लिए कराया गया फोटोशूट सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा था। सालों पहले स्टारडस्ट मैगजीन के लिए उन्होंने पूजा के साथ लिपलॉक सीन दिया था। ये फोटोशूट स्टारडस्ट मैगजीन ने करवाया था, जिसे उसने कवर पेज पर छापा था। इस फोटो ने इतना विवाद खड़ा किया कि पूजा और महेश भट्ट, दोनों ने इस फोटो को फेक बताया। अब सच्चाई क्या है, ये तो वही जानें। एक बार महेश ने तो यहां तक कह दिया था कि पूजा उनकी बेटी ना होतीं तो वो उससे शादी भी कर लेते।

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जब सोशल म‌ीडिया पर छाया संस्कारी जेम्स बांड
 "संस्कारी" जेम्स बॉन्ड सूट बूट नहीं धोती कुर्ता पहनता है और रथ पर चलता है
"संस्कारी" जेम्स बॉन्ड सिगार की जगह जेम्स बॉन्ड अब अगरबत्ती लेकर चलेगा
  "संस्कारी" जेम्स बॉन्ड  अब शुद्ध हिंदी बोलेगा
  "संस्कारी" जेम्स बॉन्ड   शराब की जगह नारियल का पानी पीएगा
 "संस्कारी" जेम्स बॉन्ड    उनका फोन स्वास्तिक के पैटर्न से अनलॉक होगा
"संस्कारी" जेम्स बॉन्ड    अपनी नई कार लाने से पहले उसके सामने नारियल फोड़ेगा
   "संस्कारी" जेम्स बॉन्ड  किसी भी मिशन पर जाने से पहले दही शक्कर खाएगा
    किसी को मारने के लिए गन नहीं त्रिशूल का इस्तेमाल करेगा
    जेम्स बॉन्ड साइकिल से चलेगा





दीपक कुमार