Wednesday, 19 February 2014

इस 'आप' को क्या नाम दूं... दीपक कुमार

14 फरवरी को जिस वक्त देश के युवा वैलेंटाइन डे मना रहे थे लगभग उसी दौरान दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे ने अचानक ही देश की राजनीति में एक नया ड्रामा खड़ा कर दिया। केजरीवाल की सरकार ने कुछ खास फैसले, कुछ विवाद, कुछ नाटक-नौटंकी के बाद इस्तीफा तो दे दिया है लेकिन इस फैसले के बाद कई अहम सवाल खड़े हो गएं, जिन सवालों का जवाब देश की जनता को देना और समझाना जरूरी है, जो शायद अरविंद केजरीवाल नहीं कर सकते हैं । क्योंकि अब वक्त आ गया है यह जानने का कि क्या वाकई अरविंद केजरीवाल आम आदमी के शुभचिंतक हैं? क्या अरविंद भ्रष्टाचार मिटाकर आम आदमी की तकलीफ दूर करने की नीयत से राजनीति में आए थे? और अगर वाकई केजरीवाल का मकसद आम आदमी की तकलीफों को दूर करना था तो फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी को जन लोकपाल बिल की आड़ में क्यों छोड़ दिया?
दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में सात सप्ताह (49 दिन) की सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल का जो रूप देश के सामने आया है उससे तो अरविंद केजरीवाल का मतलब आम आदमी से धोखा ही साबित हुआ। जिस आम आदमी की सहूलियत के लिए आम आदमी का मसीहा बनकर केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए थे, जनता को मुसीबत का लबादा ओढ़ाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी से अलग होने का फैसला कर लिया। अगर कुछ दिन पहले कि बात को ही याद करें तो केजरीवाल ने दिसंबर महीने में जनमत संग्रह से  दिल्ली की कमान संभाली थी, लेकिन यहीं से एक सवाल उठता है कि कुर्सी छोड़ने के लिए उन्होंने जनमत संग्रह क्यों नहीं किया? एक बात तो सच है कि अरविंद केजरीवाल के इस्तीफा देने के बाद कहीं न कहीं वो आम आदमी ठगा सा महसूस कर रहा है जिसने आम आदमी पार्टी से आस लगा रखी थी कि अब उसे उसके हिस्से की बिजली मिलेगी, पीने का पानी मिलेगा और रिश्वतखोरी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

दरअसल, अरविंद ने जिस जनलोकपाल बिल के पास न होने के दर्द को मुददा बनाकर इस्तीफा दिया है उस दर्द का सच कुछ और ही है । अरविंद कभी ये चाहते ही नहीं थे कि स्वराज बिल और जनलोकपाल बिल पास हो जाए । क्योंकि अगर ऐसा होता तो वे मुद्दाविहीन हो जाते। इसलिए जनलोकपाल और स्वराज के मुद्दे को जीवित रखना इनकी मजबूरी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी की भावनाओं को जिस तरह से आप ने अपने वायदों से कैश किया उसे सत्ता में आने के बाद पूरा करना केजरीवाल के लिए आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा हो गया था। ऐसे में उनके सामने दो ही विकल्प थे- सड़क पर उतरने के लिए विधानसभा में सियासी शहादत दें या फिर सरकार में बने रहकर जनता से किए गए अपने वादे को पूरा न करने का जोखिम लें। स्वभाविक था, केजरीवाल ने पहला विकल्प चुना। वह दोबारा जनता में जाने के लिए किसी ऐसे मुद्दे की तलाश में थे, जिससे यह माना जाए कि वह 'शहीद' हो गए हैं और अरविंद केजरीवाल की दृष्टि में जन लोकपाल से बड़ा कोई और मुद्दा नहीं था। इसीलिए वह इसी मुद्दे को आगे लेकर आ गए, ताकि दोबारा जनता के बीच जाकर यह कह सकें कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने मिलकर उनकी सरकार नहीं चलने दी, लोगों में संदेश यह भी जाएगा कि केजरीवाल ने भ्रष्टाचार की लड़ाई के लिए सरकार की कुर्बानी दे दी। क्योंकि, कांग्रेस- बीजेपी उनकी इस लड़ाई को सफल नहीं होने दे रही थी। दूसरी बात की कांग्रेस को केजरीवाल भरपूर नुकसान पहुंचा चुके हैं लेकिन सरकार से बाहर आकर आम आदमी पार्टी अब बीजेपी को निशाने पर ले सकेगी। एक बात यह भी था कि पिछले कुछ दिनों से केजरीवाल और उनकी टीम दिल्ली के स्थानीय मुद्दों में ही उलझकर रह गई थी लेकिन अब वह राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को लेकर विपक्षी पार्टियों पर हमला कर सकेगी।
 अब जरा एक नजर अरविंद केजरीवाल के 49 दिन के कार्यकाल पर डालें तो केजरीवाल का यह संक्षिप्त कार्यकाल विवादों से भरा रहा । शायद उन्होंने विवादों का चोला इसलिए पहना ताकि आम आदमी का ध्यान बंटा रहे और सरकार पर यह आरोप न लगे के आम आदमी की जिन बुनियादी मुश्किलों को दूर करने के लिए जनादेश मिला था, उससे भटक गए हैं । सच तो यह है कि केजरीवाल सरकार नहीं चला पा रहे थे, हर दिन वे या उनके प्यादे नई गलतियां कर रहे थे। पानीबिजली के बिल घर पहुंचने लगे थे, जिन्हें छूट का लाभ मिला वो भी निराश थे क्योंकि जितना जोरशोर मचाया गया उस हिसाब से राहत नहीं मिल रही थी और जिन्हें छूट नहीं मिली उनके बिल पहले से ज्यादा आ रहे हैं , दिल्ली में बिजली की कटौती खूब हो रही थी, बलात्कार की घटनाएं रूक नहीं रही थीं, क्राइम भी शीला सरकार की याद दिलाती थी, हर दिन नौकरियों को स्थायी करने की डिमांड तेज हो रही थी, लोग धरना प्रदर्शन कर रहे थे, मजदूर संतुष्ट नहीं थे, लोगों का समर्थन कम होता जा रहा था, जनता दरबार फ्लॉप रहा, सोमनाथ भारती प्रकरण पर सरकार बैकफुट पर रही, उल्टे सोमनाथ के समर्थन और दिल्ली पुलिस के खिलाफ दिल्ली सरकार का पूरा कैबिनेट रेल भवन के सामने धरने पर बैठ गया, कई विधायक असंतुष्ट थे, दो विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। बहुमत की आकड़ेबाजी में केजरीवाल फिसल रहे थे, जो सपने केजरीवाल ने दिखाए वो पूरे नहीं होते दिखाई दे रहे थे, साथ ही उनकी हर रणनीति भी लोगों को नाराज कर रही थी, कहने का मतलब यह है कि केजरीवाल को यह पता चल गया कि अगर कुछ और दिन वो सरकार में रहे थे उनकी सारी पोल पट्टी खुल जाएगी। वो बेनकाब हो जाएंगे, इसलिए उन्होंने इस्तीफा देकर खुद को सियासी शहादत घोषित करने लगें ।
 एक बात यह भी था कि केजरीवाल इस बात को बखूबी जानते या समझते थे कि अब मौसम भी अपना मिजाज बदलने वाला है। यानि ठंड के मौसम में बिजली और पानी कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी इसलिए जनता भी शांत थी, लेकिन अब मौसम गर्मी का आ रहा है और स्थिति ये है कि केजरीवाल के बिजली,पानी घरघर पहुंचाने के वादों पर अमल तक नहीं किया गया,ऐसे में केजरीवाल का पोल खुलने वाला था। आम जनता के उम्मीदों के इंजीनियर बनकर उभरे केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने पानीबिजली के मुददे पर ही सत्ता सौंपा था, लेकिन जनता एक बार फिर ठगी गई।
बहरहाल अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता को जनलोकपाल के मुद्दे पर कुर्बान कर चुके हैं और इस कुर्बानी से पहले उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस और बीजेपी के साथ-साथ कॉरपोरेट घरानों पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है, ठीक उसी तरह जिस तरह 80 के दशक में वी पी सिंह ने लगाया था। हालांकि एक सच यह भी है कि लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए उन्हें ब्रेक चाहिए था। बावजूद इसके इस पूरे घटनाक्रम को अतीत से जोड़ लिया जाए तो केजरीवाल में देश को पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह की याद आने लगी है, जिन्होंने कांग्रेस में रहते हुए पार्टी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। कांग्रेस पर अंबानी सहित कई और कॉरपोरेट घरानों का साथ देने का आरोप लगाकर जनमोर्चा नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली थी। वी पी सिंह जनता को विश्वास दिलाने में कामयाब रहें कि कांग्रेस की सरकार भ्रष्ट है,वो वी पी सिंह ही थे जिन्होंने बोफोर्स स्कैम का मुद्दा उठाया था और इसी मुद्दे पर कांग्रेस से अलग भी हो गए थे। भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर वी पी सिंह चंद सालों में ही जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो गए और वह अपने महत्वकांक्षी सपने को यानि प्रधानमंत्री बनने में कामयाब रहें। ठीक उसी तरह अरविंद केजरीवाल भी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री बनने के सपने संजो रहे हैं । लेकिन एक सच यह भी है कि आम जनता अतीत की भूल को दूबारा नहीं दोहराएगी। क्योंकि वी.पी.सिंह की सरकार ने जो आरक्षण और मंडल आयोग को लेकर देश में संकीर्णता और जातिवाद के घातक बीज बो दिए हैं उसकी फसलें आज भी बर्बाद हो रही हैं। ऐसे में आम जनता अरविंद केजरीवाल को दूबारा से उसी नक्शेकदम पर नहीं चलने देगी।
निश्चित रूप से अरविंद केजरीवाल में एक उम्मीद की किरण दिखी भी थी, लेकिन केजरीवाल ने इन तमाम भावनाओं के साथ साथ खिलवाड़ किया है। बीच मंझधार में दिल्ली के आम आदमी को छोड़कर आम आदमी पार्टी की सियासी चमक को बढ़ाने और प्रधानमंत्री का ख्वाब देखने वाले अरविंद केजरीवाल का यही असली सच है कि वह आम आदमी को सीढ़ी बनाकर सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठना चाहते हैं ना कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की।
जल्द ही एक नए मुददे पर लेख आपके सामने होगा।
लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।
9555403291

Deepak841226@gmail.com

Sunday, 16 February 2014

भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा तमाशा है संसद— दीपक कुमार

यह अजीब संयोग है कि बीते 13  फरवरी को जब लोकतंत्र के मंदिर संसद में तेलंगाना मुद्दे को लेकर एक सांसद मिर्च स्प्रे के जरिए अफरातफरी फैला रहे थे लगभग उसी समय मैं एक केबल चैनल पर मनोज बाजपेयीरवीना टंडन अभिनित फिल्म 'शूल' देख रहा था । हालांकि यह पहली बार नहीं था जब मैं 'शूल' देख रहा था, इसके पहले भी मैंने कई दफा इस फिल्म को देखी है । लेकिन पता नहीं क्यों इस बार ​फिल्म के एंड यानि अंत को देखने पर मेरे जेहन में एक अजीबोगरीब संतुष्टी मिली जिन लोगों ने इस फिल्म के अंत को नहीं देखा हो, उन्हें पहले यह बताना चाहूंगा कि फिल्म में मनोज बाजपेयी एक ईमानदार पुलिस अफसर समर प्रताप सिंह की भूमिका में हैं । लेकिन उनकी ईमानदारी बाहुबली विधायक बच्चु यादव ( सैयज शिंदे) के काले करतुतों में अड़गा डालती है, जो उसे नहीं भाता है और जाने अनजाने में समर के खुशियों और परिवार को वह तबाह कर देता है । आगे समर वही करता है जो एक विद्रोही व्यक्ति करता है, भरी विधानसभा में घुसकर बच्चू यादव की हत्या विधानसभा में मनोज बाजपेयी जो संवाद कहते हैं उसके याद आ रहे अंश निम्म हैं— “ बाहर जनता को आपसे बहुत उम्मीद है । उसने आपको चुनकर अपने सपने को साकार करने के लिए भेजा है । विनती है आपसे, इस पवित्र मंदिर की साख को बचा लीजिए  
बहरहाल विषयांतर होने से पहले मैं आपको बता दूं कि इस फिल्म का जिक्र मैंने यूं ही नहीं किया है । दरअसल, इस फिल्म की सार्थकता वर्तमान दौर में भारतीय संसद में चल रहे नुराकुश्ती को देखते हुए बढ़ जाती है । संसद में हाथापाई और मारपीट बहुत से देशों में होती है, लेकिन राजनीतिक विरोध की वजह से सांसदों के बर्ताव का जो नजारा 13 फरवरी, 2014 को भारत की संसद में दिखा है, वह अभूतपूर्व है । 13 फरवरी का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बेहद शर्मनाक दिन के रूप में याद किया जाएगा । इस दिन संसद में सुबह से ही लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित की जा रही थी, जब लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण के बारे में विधेयक प्रस्तुत करने जा रहे थे, तभी आंध्र प्रदेश के सांसद एल. राजगोपाल, जिन्हें एक दिन पहले ही कांग्रेस से निलंबित किया गया था, ने मिर्च पाउडर का स्प्रे करना शुरू कर दिया जिसके कारण अनेक सदस्यों को खांसी आने लगी और आंखों से पानी गिरने लगा। इसी समय तेलंगाना समर्थकों और विरोधियों के बीच हाथापाई होने लगी और तेलुगू देशम पार्टी के सांसद वेणुगोपाल ने चाकू निकाल लिया। राज्यसभा में सभापति का माइक्रोफोन उखाड़ दिया गया और वहां भी अफरातफरी मची। बाद में कई सांसदों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। वर्तमान स्थिति यह है कि 17 लोकसभा सदस्यों को अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदन से निलंबित कर दिया है।
इस घटना के बाद सत्तापक्ष से विपक्ष तक में निंदा करने की होड़-सी लग गयी, लेकिन क्या कोई भी दल संसद और विधानसभाओं में हंगामा करने वालों को टिकट न देने का वायदा कर सकता है? जब राजनीति में नीति, सिद्धांत और विचार की बात करने वालों के बजाय हल्ला ब्रिगेड को महत्व मिलने लगे तो सदनों की मर्यादा कैसे बची रह सकेगी? सवाल यह भी है कि जब ऐसी किसी भी स्थिति की आशंका लगातार जतायी जा रही थी, तब सरकार ने जरूरी एहतियाती कदम क्यों नहीं उठाये? ये और ऐसे ही अन्य स्वाभाविक सवाल इस धारणा को बल प्रदान करते हैं कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की मंशा लोकसभा चुनाव से पूर्व तेलंगाना बनाना नहीं, बल्कि मुद्दे को गरमाये रख कर चुनाव में भुनाना है । शायद मुख्य विपक्षी दल भाजपा को भी चुनावी दृष्टि से वही स्थिति ज्यादा अनुकूल लगती है

यह घटना संसद के लिए अभूतपूर्व हैं, लेकिन कई राज्यों की विधानसभाओं में विधायकों के बीच मारपीट, माइक उखाड़कर उन्हें हथियारों की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश और लगातार शोर-शराबा मचाने की घटनाएं होती रही हैं । इस सिलसिले में उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर की विधानसभाओं का चर्चा होना स्वाभाविक है । दरअसल, संसदीय प्रणाली में उसी पार्टी या पार्टियों के गठबंधन की चलती है जिसे पास बहुमत होता है । लेकिन शासक दल या गठबंधन को यह छूट नहीं है कि वह संसद की अनुमति के बिना सिर्फ इस आधार पर कानून बना ले कि उसके पास बहुमत है। संसद में प्रत्येक विधेयक पर बहस और विचार-विमर्श इसीलिए किया जाता है क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद एक-दूसरे के विचारों को सुनने-समझने और यदि जरूरत महसूस हो तो अपनाने की प्रक्रिया पर ही टिकी है । वह इस विश्वास पर टिकी है कि विचार-विमर्श और बहसों के दौरान यदि विपक्ष सत्ता पक्ष को अपनी बात समझाने में सफल हो गया तो प्रस्तावित कानून में बदलाव किया जा सकता है। अन्य मुद्दों पर भी विपक्ष सत्तापक्ष को और सत्तापक्ष विपक्ष को अपनी बात समझाने की कोशिश कर सके, इसीलिए संसदीय कार्यवाही में प्रश्न उठाने और उन पर चर्चा करने की व्यवस्था है
लेकिन पिछले अनेक वर्षों से भारतीय संसद में कार्यवाही कम होती है, कार्यवाही का स्थगन अधिक होता है। सदन का कामकाज रोक देना राजनीतिक विरोध प्रदर्शन का एक ऐसा हथियार बन गया है जिसका हर दल इस्तेमाल करता है, भले ही आम तौर पर उसके नेता इसकी आलोचना करें । राजनीतिक असहिष्णुता इतनी अधिक बढ़ गई है कि कोई भी दूसरे की राय सुनने और सुनकर बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। असंसदीय आचरण को अधिकाधिक राजनीतिक स्वीकृति मिलती जा रही है और राजनीतिक पार्टियों के वरिष्ठ नेता भी इस पर अंकुश लगाने के लिए कुछ करते नजर नहीं आते। अधिकांश सत्रों में प्रश्नकाल, जिसके दौरान सांसद विभिन्न विषयों के संबंध में प्रश्न पूछ सकते हैं, बिना किसी कार्यवाही के समाप्त हो जाता है। वर्तमान पंद्रहवीं लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल 62 प्रतिशत ही कामकाज करने के लिए इस्तेमाल कर पायी है । सदन में अध्यक्ष पद की मर्यादा और गरिमा की किसी को भी चिंता नहीं है । अध्यक्ष भी सदन को नियंत्रित और अनुशासित करने के लिए अपने अधिकार का समुचित इस्तेमाल करने से घबराते हैं। नतीजतन संसद की प्रतिष्ठा और गरिमा लगातार कम होती जा रही है। जब आम लोग चुने हुए सांसदों का ऐसा अमर्यादित, उग्र और हिंसक आचरण देखते हैं, तो उनकी निगाह में भी उनकी इज्जत कम होनी स्वभाविक है

Thursday, 13 February 2014

भटकते युवाओं का वैलेंटाइन डे.. दीपक कुमार

 प्यार का दिन, प्यार के इजहार का दिन। अपने जज्बातों को शब्दों में बयां करने के लिए इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार होता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं, प्यार के परवानों के दिन की, वेलेंटाइन-डे की...। प्यार भरा यह दिन खुशियों का प्रतीक माना जाता है और हर प्यार करने वाले शख्स के लिए अलग ही अहमियत रखता है। 14 फरवरी को मनाया जाने वाला यह दिन विभिन्न देशों में अलग-अलग तरह से और अलग-अलग विश्वास के साथ मनाया जाता है। पश्चिमी देशों में तो इस दिन की रौनक अपने शबाब पर ही होती है, मगर पूर्वी देशों में भी इस दिन को मनाने का अपना-अपना अंदाज होता है। जहां चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्स' प्यार में डूबे दिलों के लिए खास होता है, वहीं जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइट डे' का नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, इन देशों में इस दिन से पूरे एक महीने तक लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं और एक-दूसरे को तोहफे व फूल देकर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं।
लेख को आगे बढ़ाने से पहले यह जानना जरूरी है कि  कौन थे वैलेंटाइन ? दरअसल, रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था। उसके अनुसार विवाह करने से पुरूषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने आज्ञा जारी की कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वेलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया। उन्हीं के आह्वान पर अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किए। आखिर क्लॉडियस ने 14 फरवरी सन् 269 को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी स्मृति में प्रेम दिवस मनाया जाता है।

    बहरहाल, यह सच है कि  प्यार दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास है। जब यह अहसास सुखद है, सुंदर है, सलोना है तो क्यों इसके नाम पर सदियों से खून बहता रहा है? कभी जात-पांत के नाम पर कभी मान-सम्मान और तथाकथित प्रतिष्ठा के नाम पर। कभी अमीरी-गरीबी के अंतर के नाम पर। पर यहां मुद्दा ही दूसरा है। प्यार को छलने वाला समाज तो अत्याचार करने को तैयार बैठा है, कभी किसी सेना के रूप में। कभी किसी धर्म-संस्कृति के ठेकेदार के रूप में। एक अकेला प्रेम और उसे जांचने-परखने के इतने-इतने तरीके कि प्रेम भी बेचारा असमंजस में पड़ जाए कि मैं हूं भी या नहीं? लेकिन इससे पहले कि वे अपना रूप समाज के सामने प्रदर्शित करें स्वयं प्रेमियों के मन में एक सवाल है, उन्हें स्वयं नहीं पता कि जो उन्हें हुआ है वह प्यार है भी या नहीं? प्यार की शुद्धता और सहजता से अनजान आज के प्रेमी इस सवाल से जूझ रहे हैं कि कोई आए और उन्हें यह बताए कि 'हां, यही प्यार है।'
प्रेम, प्यार, इश्क, लगाव, प्रीति, नेह, मोहब्बत, आशिकी, इस मीठे अनूठे अहसास के लिए बहुत से शब्द हैं। यह सागर से भी गहरा अहसास होने के बावजूद आज तक अनाभिव्यक्त है । प्रेम जो ना किसी से दबाव से करवाया जा सकता है और ना ही किसी दबाव से उसे रोका जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज भी प्रेम के मायने वैसे ही हैं जैसे हम पढ़ते-सुनते आए हैं। असलियत तो ठीक इसके उलट है। प्रेम दिवस के लिए विशेष रूप से इसे बगीचों में उपजाया भी जा रहा है और बाजार यानि हाट, उसकी तो पूछिए ही मत। हाट में यह इतना हॉट है कि इसके अलावा तो कुछ बिकता दिखाई ही नहीं देता।
लेकिन एक सच यह भी है कि इस डे के जरिए नशे, वासना और भोग का एक बहाना भी मिल गया है। जी हां वैलेंटाइन डे का खुमार युवाओं में इस कदर चढ़ चुका है कि वो अपनी हदें पार करने लगे हैं। करीब डेढ़ दशक पहले जब वैलेंटाइन डे का खुमार भारत के शहरों पर चढ़ा तो गुलाब के फूलों की बिक्री फरवरी माह में 5 गुना बढ़ गई। कल गुलाब के फूलों की बिक्री तीन गुनी हुई थी, आज कंडोम की बिक्री में उतनी ही बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही है। 2014 यानी इस साल कितनी बिक्री हुई, यह तो दो दिन बाद आने वाले आंकड़े बता देंगे, लेकिन पिछले साल की बात करें तो ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल स्नैपडील डॉट कॉम ने ही भारत में एक दिन में डेढ़ लाख कंडोम बेचे थे। वो भी 14 फरवरी के दिन। कंडोम कंपनी ड्यूरेक्स से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार वैलेंटाइन डे के दिन कंडोम की बिक्री 25 फीसदी तक ज्यादा होती है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में मल्टी नेशनल रिटेल कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट बेचने के लिये भारत में वैलेंटाइन डे एक त्योहार के रूप में इंजेक्ट किया। इस इंजेक्शन का यह रूप देखने को मिलेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। वहीं आज के दिन पब में जाने वाले यंगस्टर्स की भी कमी नहीं है। पब और ड्रिंक के जरिए जिस तरीके से वासना और उत्पीड़न का खेल खेला जाता है उसने भी इस डे या यूं कहें आज के प्यार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। क्योंकि प्यार का मतलब, हवस कभी नहीं हो सकता। वर्तमान दौर में सेक्स संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देनेवाला वैलेंटाइन डे प्यार का संदेश कभी नहीं दे सकता। न ही प्यार का मतलब कभी समझा सकता है। वेलेंटाइन डे के मौके पर एक-दूसरे को प्यार जताने वाले युवाओं में कभी आत्मीयता का संचार नहीं हो सकता। वेलेंटाइन डे हवस की पूर्ति के लिए सिर्फ एक समझौता बन कर रह गया है, जिसका मतलब जीवन भर पछताना ही होता है।

आर्यावर्त: चुनाव विशेष : स्वार्थ की नींव पर थर्ड फ्रंट..

आर्यावर्त: चुनाव विशेष : स्वार्थ की नींव पर थर्ड फ्रंट..

Wednesday, 12 February 2014

स्वार्थ की नींव पर थर्ड फ्रंट.. दीपक कुमार

पिछले कुछ दिनों से भारतीय राजनीति में  थर्ड फ्रंट यानि तीसरे मोर्चे की हनक खूब सूनाई दे रही है। एक बात तो साफ है कि राजनीति में रूचि रखने वाले लोग थर्ड फ्रंट के बारे में बखूबी जानेते होंगे और अगर जो राजनीति के इतिहास में रूचि रखते होंगे वह यह भी  जानते होंगे कि थर्ड फ्रंट यानि ​तीसरे मोर्चे की नींव धोखे और स्वार्थ पर टिकी है। हालांकि वर्तमान दौर में इसके गठन को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के रथ को रोकने से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि इस मोर्चे की सार्थकता और वास्तविकता क्या है? क्या अब फिर तीसरे मोर्चे के उभरने की गुंजाइश पैदा हो गई है?
 क्योंकि यह सच है कि तीसरे मोर्चे को भारत पर शासन करने का मौका मिला था, उस घटना को 2 दशक से भी अधिक समय बीत भी चुका है। फिर भी अगर 2014 के चुनाव के परिणामस्वरूप यदि त्रिशंकु संसद अस्तित्व में आती है तो तीसरे मोर्चे की सरकार की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। एक बात यह भी है कि हाल के विधानसभा चुनावों में दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) ने सरकार बना कर जहां प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों को एक तरफ धकेला है, वहीं तीसरे मोर्चे के लिए स्थान भी सृजित कर दिया है। ऐसे में तीसरे मोर्चे यानि थर्ड फ्रंट को नई जोश और नई उम्मीद भी मिली है। इसलिए इस मोर्चे को लेकर चहलकदमी बढ़ गई है। बहरहाल वर्तमान स्थिति यह है कि थर्ड फ्रंट में 11 दल साथ आए। इनमें चारों वाम दल, सपा, जदयू, अन्नाद्रमुक, बीजद, अगप, झारखंड विकास मोर्चा, जनता दल (एस) शामिल हैं। मौजूदा लोकसभा में इनकी कुल ताकत 92 सीटों की है।

    लेकिन यह भी सच है कि  केंद्र में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बगैर स्थिर सरकार बनाने की क्षेत्रीय दलों की तमाम प्रयासों के बावजूद भी महत्वकांक्षा अब तक पूरी नहीं हो पाई है ऐसे में वह समयसमय पर हुंकार भरते भी हैं। यहां यह समझना होगा कि जबजब तीसरे मोर्चे ने हुंकार भरी है उसके पीछे कांग्रेस की मंशा या समर्थन रहा है। अगर अतीत को टटोलें तो यह मालूम होता है कि इनकी हुंकार में कांग्रेस की आवाज साफ दिखाई देती है। तीसरे मोर्चे की क्षेत्रीय पार्टियों की ये कोशिशें 1977, 1989 और 1996 में छोटी अवधि के लिए सफल रही थीं,  लेकिन इसमें भी सत्ता के शीर्ष पर उस दौर के पूर्व कांग्रेसी नेता ही रहे थे। मोरारजी देसाई 1977 में जनता पार्टी सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे, इसके बाद चरण सिंह प्रधानमंत्री बने और दोनों ही पूर्व कांग्रेसी नेता थे। 1989 में वीपी सिंह जनता दल के पहले और चंद्रशेखर दूसरे प्रधानमंत्री बने और दोनों ही पूर्व कांग्रेसी नेता थे। सही मायने में एच.डी.देवेगौड़ा पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, लेकिन एक बात यह भी है कि  जब 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी थी, उस वक्त भाजपा (161+26) 13 दिन की ही सरकार बना सकी और कांग्रेस (140) ने कोई कोशिश ही नहीं की। ऐसे में जनता दल, सपा, टीडीपी के नेशनल फ्रंट (79) और लेफ्ट फ्रंट (52) ने अन्य दलों के साथ मिलकर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी। लेकिन उनके बाद जल्द ही पूर्व कांग्रेसी आई.के.गुजराल ने एक बार फिर पद संभाल लिया। मतलब साफ है कि अब तक थर्ड फ्रंट अगर सत्ता तक पहुंची है तो अधिकांश बार कांग्रेसी चेहरे ने ही देश के प्रधान बनने का सुख पाया है।
   अगर अतीत की बात को छोड़कर वर्तमान के आईने में देखें तो यह समझना होगा कि मौजूदा क्षेत्रीय दलों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के अलावा कोई भी ऐसा दल नहीं है, जिसके प्रमुख पूर्व कांग्रेसी हैं। लेकिन इन दलों की भूमिका तीसरे मोर्चे की सरकार में कम ही लगती है। क्योंकि  सभी गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा पार्टियां तीसरे मोर्चे में  शामिल नहीं होंगी, कुछ पाटियां एक-दूसरे को फूटी आंख भी नहीं सुहातीं। उदाहरण के तौर पर तृणमूल कांग्रेस किसी भी स्थिति में वामपंथियों के साथ चलने को तैयार नहीं जबकि द्रमुक और अन्नाद्रमुक हमसफर नहीं हो सकतीं। इसी तरह सपा और बसपा एक दूसरे को राजनीतिक दुश्मन मानते हैं। यानि की जहां एक रहेगा वहां दूसरा नहीं। यहां एक मुहावरा सटीक बैठ सकता है — 'एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकते हैं।' ऐसे में तीसरा मोर्चा कमजोर ही होगा। लेकिन यह भी है कि राजनीति में सब कुछ संभव है।
   एक स्याहा सच यह भी है कि  एआईएडीएमके की जयललिता और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह जैसे क्षेत्रीय नेताओं का स्वभाव अस्थिर है जो कि प्रस्तावित मोर्चे को साथ लाने में मुश्किलें पैदा करेगा। तीसरे मोर्चे पर फैसला होने से पहले ही एआईएडीएमके के लोग जयललिता का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए लेने लगे थे, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में खुद को पेश करते आए हैं। उनका यह तर्क है कि जब देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो वह क्यों नहीं। अगर मुलायम सिंह के उस बयान पर गौर किया जाए जिसमें उन्होंने  चुनाव बाद तीसरे मोर्चे के गठन का जिक्र किया है, तो उसमें से एक बात निकल कर सामने आती है- जिसमें मुलायम सिंह यह सोचते हैं कि अगर कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तो वह फिर से अपने पुराने साथी यानि कांग्रेस के साथ चले जाएंगे और अगर नहीं आई तो तीसरे मोर्चे का विकल्प खुला है। यानि वो दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं।
इन क्षेत्रीय दलों के नेताओं की सबसे बड़ी समस्या है कि सभी के अपने अहंकार और स्वार्थ हैं और ये इन दोनों चीजों से कोई समझौता नहीं करना चाहेंगे। जब प्रधानमंत्री के चुनावों का मौका आएगा तो यह समस्या विकराल रूप से उनके सामने खड़ी होगी। ऐसे में उन्हें अपने अहम को काबू में रखना होगा। अगर उनकी सरकार बन भी जाती है तो इसको चलाना भी समस्या बन जाएगा क्योंकि सभी क्षेत्रीय दिग्गज पहले की भांति अलग-अलग दिशाओं में इसे खींचेंगे और अपने-अपने समर्थन का भारी मोल मांगेंगे। अगर चुनाव बाद तीसरे मोर्च का स्वरूप बढ़ता भी है तो उसमें एनसीपी, नेशनल कांन्फ्रेंस जैसी पार्टियों का विलय हो सकता हैं, जिसके प्रमुख पहले से ही प्रधामनंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं। यानि इस मोर्चे में आने वाले नए चेहरे भी प्रधानमंत्री बनने के सपने लेकर ही आएंगे। ऐसे में इस मोर्चे में इस पद के लिए नुराकुश्ती होनी तय है। अतीत का अनुभव बताता है कि कोई भी मोर्चा कांग्रेस या भाजपा के बाहरी समर्थन के बिना सरकार नहीं बना पाया।
एक बात यह भी है कि  तीसरे मोर्चे में जाने की सबकी अपनी मजबूरी है। मसलन, जहां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं लेकिन राजग से अलग होने के फलस्वरूप उनकी पार्टी काफी कमजोर हो गई है। बिहार में स्थिति यह है कि वहां की जनता अब नीतिश को लालू यादव के नक्शेकदम पर चलते हुए देख रही है। उच्च जाति के लोग नीतिश सरकार से  निराश हैं। नीतिश कुमार के आशा के विपरीत उच्च जातियां अभी भी भाजपा के साथ डटी हुई हैं। कांग्रेस-राजद-लोजपा का गठबंधन भी उनके लिए कड़ी चुनौती बन कर उभर रहा है। ऐसे में खुद को कोने में धकेल दिया गया महसूस करते हुए नीतिश  ने फिर से तीसरे मोर्चे में जाना जरूरी हो गया था। वहीं मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उत्तर प्रदेश में खुद को फिसलन भरी स्थिति में पा रहे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के लिए भी इस नाव पर बैठना जरूरी था। क्योंकि यह सच है कि यूपी में जनता अखिलेश सरकार की बेवकूफियों से परेशान है। वहीं बंगाल सहित पूरे देश में वामपंथ सुसुप्त अवस्था में है। उसकी हर चाल उसी पर भारी पड़ रही है। अब वामपंथ को अपने अस्तित्व को बचाने का खतरा है। ऐसे में उनके लिए भी एक ऐसे प्लेटफॉर्म की जरूरत थी जिसपर खड़ा होकर वह एक बार फिर अपनी राजनीति को संवार सकें। जिन स्थानीय क्षत्रपों की लोकसभा चुनाव में बेहतर संभावनाएं बताई जा रही हैं, उनमें सिर्फ जयललिता ही इस प्रस्तावित तीसरे मोर्चे में हैं। लेकिन चुनाव के बाद भाजपा के नेतृत्व वाला राजग अगर केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में होता है, तो अम्मा उसके साथ नहीं होंगी, इसकी भी गारंटी नहीं है?
यह ठीक है कि इस मोर्चे में शामिल होने वाले दलों के बीच कोई बड़ी प्रतिस्पर्धा नहीं है। इसके बावजूद इस जमावड़े के प्रति निश्चय के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता! अभी न तो इसका स्वरूप तय है और न ही इन दलों की प्रतिबद्धता के बारे में ठोक-बजाकर कुछ कहा जा सकता है। मसलन, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह केंद्र में सरकार बनाने का संकेत तो देते रहे हैं, लेकिन अगले चुनाव के बाद वह कांग्रेस को समर्थन नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसी तरह नीतीश कुमार कांग्रेस से धोखा खाने के बाद मजबूरी में ही इस मोर्चे में आए हैं और भाजपा से अलग होने के बाद लोकसभा चुनाव में उनके लिए भी कठिन चुनौती होगी। बीजद, रालोद और जनता दल जैसी पार्टियों से बड़ी भूमिका निभाने की बहुत उम्मीद नहीं है। हां यह जरूर है कि वाम दल के प्रतिबद्धता के बारे में निश्चय के साथ कहा जा सकता है। लेकिन हाशिये पर रह गए कम्युनिस्ट लोकसभा चुनाव में ऐसा क्या कर लेंगे, जिससे वे दूसरे समानधर्मा दलों को अपने साथ जोड़ सकें?
बहरहाल जो भी हो, फिर भी हमारी शुभकामनाएं इस नए 'तीसरे मोर्चे' के साथ जरूर रहेगी।
लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं।
दीपक कुमार—09555403291
ईमेल- deepak841226@gmail.com







Saturday, 1 February 2014

सलमान खान की क्यों नहीं हुई जय हो? - दीपक कुमार

24 जनवरी को जब फिल्म जय हो  रिलीज हुई तो सबके मन में एक ही सवाल था कि यह फिल्म कितनी कमाई करेगी? सबकी नजरें इस बात पर थी कि यह फिल्म कृष’ ,’ चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘धूम 3 को कमाई में पीछे छोड़ती है कि नहीं । मेरे जैसे तमाम लोग इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि यह फिल्म नए कीर्तिमान दर्ज कराएगी। कमाई के मामले में और कुछ नहीं तो 400 करोड़ क्लब में तो प्रवेश कर ही जाएगी।  लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक ही झटके में सारे अरमान टूट गएं और सलमान खान की यह फिल्म कमाई करने के लिए तरसने लगी? सलमान की जो फिल्में वीकेंड में ही 100 करोड़ की हो जाती थी या करीब होती थी उसमें अचानक क्यों सेंध लग गई, और किसने लगाई है यह सेंध
क्योंकि मामला सलमान खान से जुड़ा है तो सवाल उठना लाजमि ही है। सलमान का नाम आते ही फिल्म इंडस्ट्री में 100 करोड़ क्लब की फिल्मों का जिक्र शुरू हो जाता है। और हो भी क्यों न? सलमान खान ने ही तो फिल्मों के कमाई को मुद्दा बनाया। वर्ना पहले कौन जानता और समझता था कि कौन सी फिल्म कितना कमाई कर गई। फिल्मों की कमाई को लेकर न तो लोगों को समझ होती थी और न ही कोई दिलचस्पी। दर्शकों को तो सिर्फ और सिर्फ फिल्म की कहानी, संगीत , संवाद, किरदार से मतलब होता था लेकिन अचानक सलमान की 'वॉन्टेड और 'दबंग' ने फिल्मों की सफलता और कमाई की परिभाषा ही बदल दी।

  तो विषयांतर होने से पहले यह समझना जरूरी है कि सलमान आखिर क्यों हीरो से जीरो हो गएंहालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे राजनीतिक रंग देने में जरूर लगे हैं कहा जा रहा है कि फिल्म रिलीज से कुछ दिन पहले  भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से सलमान की मुलाकात उन्हें भारी पड़ गई। क्योंकि सलमान खान एक मुसलमान हैं और कुछ असमाजिक तत्वों की नजर में नरेंद्र मोदी एक कट्टर हिंदू के साथ मुस्लिम भक्षक हैं। दरअसल, हमारे देश में इस दौर में एक फैशन सा चल गया है कि नरेंद्र मोदी से जुड़ी हर चीज को या हर व्यक्ति को राजनीतिक रंग देना अनिवार्य है।
लेकिन सच कुछ और ही हैं.. क्योंकि यह सच है कि  सलमान की पिछली कई फिल्मों की तुलना में 'जय हो' की कोई चर्चा नहीं हो रही है। इरोज इंटरनेशनल  और सोहेल खान प्रोडक्शन के बैनर तले बनी इस फिल्म ने ओपनिंग वीकेंड में कुल 101.6 करोड़ का वर्ल्डवाइड क्लेक्शन किया है। फिल्म की निर्माता कंपनी का कहना है कि 'जय हो' ने वीकेंड तक भारत में कुल 90 करोड़ तो ओवरसीज में 22.36 करोड़ रुपए कमाए हैं। फिल्म ने भारत में ओपनिंग डे यानि फिल्मी फ्राइडे पर 17.75 करोड़ तो शनिवार को 16.68 करोड़ रुपए कमाए। फिल्म के क्लेक्शन में रविवार को 64 फीसदी का उछाल आया और इस दिन भारत में 'जय हो' ने 26.25 करोड़ रुपए कमाए।
सलमान खान की 'एक था टाइगर', 'दबंग' और 'बॉडीगार्ड' जैसी फिल्में ब्लॉकबस्टर रही हैं। लेकिन, 'जय हो' को फिल्मीं पंडित 'असफल' मान रहे हैं। उनके मुताबिक, 2013 में पूरे साल बड़े बजट वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाती रहीं। शाहरुख खान की 'चेन्नई एक्सप्रेस', रितिक रोशन की 'कृष 3' और साल के आखिर में आमिर खान की 'धूम 3' ने फिल्म बिजनेस में नए कीर्तिमान स्थापित किए। इसलिए सलमान की नई फिल्मे के लिए पैमाना काफी ऊंचा हो गया है।

एक कारण यह भी है कि पिछले साल की सभी ब्लॉंकबस्टर फिल्मों की लागत सौ करोड़ से ज्यादा थी, लेकिन सलमान की 'जय हो' का बजट केवल 75 करोड़ रुपए ही था। लिहाजा यह उन फिल्मों का रिकॉर्ड नहीं तोड़ सकती है। वैसे, सलमान ने फिल्म की असफलता की जिम्मेदारी ली है। लेकिन इस असफलता के ठोस कारण फिल्‍म के अंदर ही हैं।
फिल्म की असफलता का एक कारण  सलमान और डेजी शाह की फीकी केमेस्ट्री है। फिल्म की लीड जोड़ी सलमान और डेजी शाह को रोमांस करते देखने पर लगता है कि दोनों से जबर्दस्ती रोमांस करवाया जा रहा हो। वैसे भी कोरियोग्राफर डेजी शाह की ये पहली फिल्म है और ऐसे में दर्शकों को भी उनसे कोई खास उम्मीद नहीं है। खास कर 'तेरे नैना' गाने में इनकी केमेस्ट्री बहुत ही फीकी लगी है। अब स्वभाविक है कि रोमांस के नाम पर दर्शक बोर तो नहीं होना चाहेगें।

गीत संगीत के नाम पर फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे दर्शक अपना कॉलर ट्यून भी बना सकें। 'बाकी सब फर्स्ट क्लास', 'फोटोकॉपी' और टाइटल ट्रैक। इन सारे गानों में ना तो म्यूजिक अच्छा है और ना ही लिरिक्स। फिल्म रिलीज के पहले जब म्यूजिक लॉन्च किया गया था, तब भी इसे लोगों का अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला था और फिल्म में तो सब सामने ही आ गया है। अगर लोग 'जय हो' में 'ढिंका चिका'  (रेडी) जैसे गानों की उम्मीद करके फिल्म देखने गए हैं तो वो बहुत ही निराश होंगे।
एक बात और है कि सलमान पिछले 16 महीनों से बड़े पर्दे से दूर रहे, लेकिन इस दौरान वो बिग बॉस 7 के जरिए अपने फैन्स से जुड़े रहे। इस दौरान शाहरुख खान की 'चेन्नई एक्सप्रेस', ऋतिक रोशन की 'कृष 3' और आमिर खान की 'धूम 3' ने मसाला फिल्मों के मायने काफी हद तक बदल दिए हैं। 'चेन्नई एक्सप्रेस' दर्शकों को बांधे रखती है, वहीं 'धूम 3' की स्क्रिप्ट अच्छी थी। सलमान की इस फिल्म में फ्रेश कंटेंट की कमी है और स्क्रिप्ट काफी लचर है।
दरअसल, 'जय हो' एक टिपिकल सलमान टाइप फिल्म नहीं है। सलमान के फैन्स धमाकेदार एक्शन और रोमांस देखने सिनेमा हॉल का रूख करते हैं, लेकिन इस बार रोमांस बिल्कुल भी नहीं है और एक्शन भी साउथ-स्टाइल है। साथ ही इस फिल्म में उनकी इमेज लवर-ब्वॉय जैसी नहीं है, जैसा कि लोग पसंद करते हैं। 'दबंग' और 'रेडी' जैसी फिल्मों में भी सलमान के मस्ती भरे अंदाज को पसंद किया गया, लेकिन इसमें वो बात भी नहीं है।
एक और बात है ​कि शायद दर्शकों को सलमान खान जैसे एक्शन, ड्रामे मैन द्वारा सोशल वर्क या सोशल मैसेज करते हुए देख कर दर्शक नाखुश हुए होंगे। दर्शक यह नहीं चाहते कि सलमान खान जैसा पर्सना​लिटी यूथ आईकन कोई सोशल वर्क करे या समाजिक मुद्दों से जुड़ी फिल्म बनाएं। सच तो यह है कि सामाजिक मुद्दों की फिल्मों के लिए आमिर खान जैसे हीरो ही पसंद किए जाते हैं।
सलमान खान इस बार अपनी इस फिल्म की सफलता को लेकर खुद भी काफी शंका में थे। अपनी पिछली फिल्मों में वो काफी कॉन्फिडेंट थे और कहते रहते थे कि उनकी फिल्म जरूर अच्छा करेगी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं था।  उन्होंने एक शो में भी कहा था कि अब उन्हें डर लगने लगा है कि उनकी फिल्म नहीं चली तो क्या होगा।



सलमान -शाहरूख की दोस्ती ने भी इस फिल्म की असफलता में अहम भूमिका निभाई है। फिल्म पत्रकार सुधीर कुमार के अनुसार इस फिल्म की असफलता का एक कारण 'खान वॉर' का खत्म होना और इनकी दोस्ती है। दरअसल, इन दोनों खान की आपसी लड़ाई में दर्शकों की दिलचस्पी थी और वे सलमान खान की ओर सहानुभूति की नजर से देखने लगे थे। क्योंकि जिस दौर में इन दोनों खान की लड़ाई शुरू हुई उस दौर में शाहरूख अपने चरम पर थे और सलमान का करियर दांव पर था। लेकिन अचानक ही एक ही झटके में इन दोनों की कंट्रोवर्सी ने शाहरूख के फैन को सलमान की तरफ मोड़ दिया। लेकिन एक बार फिर इनकी दोस्ती से लोगों को झटका लगा है और एक बार फिर शाहरूख के फैन वापस अपने आईकन के पास लौट आए हैं। शायद यही वजह 'चेन्नई एक्सप्रेस' की सफलता का कारण भी बनी।