Sunday, 1 March 2015

उपेक्षा के आगोश में नेशनल गेम्स


  • पिछले दिनों केरल में आयोजित हुए राष्ट्रीय खेलों में तमाम रिकॉर्ड टूटे और बने। कई सितारों ने फलक पर जगह बनाई और तमाम खिलाड़ियों की चमक फीकी रही। खेल का रोमांच चरम पर रहा, खिलाड़ियों ने जीतोड़ प्रदर्शन कर पदक जुटाए। लेकिन, कमी थी तो महज उनको सराहने वाले दर्शकों की। वह न टीवी चैनलों की फटाफट खबरों का हिस्सा बने और न ही अखबारी सुर्खियां। जहां रणजी और आईपीएल क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी भी भगवान जैसा दर्जा पा जाते हैं, वहां भविष्य के ओलंपिक सितारों ने गुमनामी में ही पदक जीते और हार गए। यही है हमारा खेलों के प्रति रवैया! यहां क्रिकेट तो धर्म है और अन्य खेलों की चर्चा धर्म विरुद्ध! यह राष्ट्रीय खेलों की त्रासदी है कि उन्हें न तो मीडिया में कोई जगह मिल रही है और न ही दर्शक उन्हें देखने पहुंच रहे हैं। सच तो यह है कि इन खेलों की चर्चा तभी होती है, जब यहां से निकले किसी खिलाड़ी को ट्रेन से धक्का दे दिया जाता है या फिर वह आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर होता है। यहां यह बताना जरूरी है कि राष्ट्रीय खेलों के आयोजन के पीछे मकसद था कि गली- मुहल्ले से निकले खिलाड़ियों के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया जाए जिसके जरिए वह एशियन गेम्स- कामनवेल्थ और ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में जाकर भारत का नाम रोशन कर सकें।
  •  लेकिन अफसोस, यह टूर्नामेंट आज खुद अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। इस स्थिति के कई कारण हैं। दरअसल, हर स्तर पर इन खेलों का गला घोंटा जा रहा है। आयोजन में राजनीतिक हस्तक्षेप, घोटालेबाजी और यहीं से निकले बड़े खिलाड़ियों की उपेक्षा इनमें प्रमुख हैं। बहरहाल, केरल में आयोजित हुए 35वें राष्ट्रीय खेलों में भी पिछले संस्करणों जैसी हीं समस्याएं सामने आईं। शीर्ष खिलाड़ियों ने अलग अलग कारणों से नाम वापस ले लिए, स्टेडियम पूरी तरह तैयार नहीं थे, सचिन तेंदुलकर की मौजूदगी के बावजूद उद्घाटन समारोह फीका रहा और सबसे ऊपर आयोजकों पर बुनियादी ढांचे के विकास में भ्रष्टाचार के आरोप लगे।  बावजूद इसके खिलाड़ियों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन जारी रखा। लगातार तीसरे साल सेना खेल नियंत्रण बोर्ड (एसएससीबी) पदक तालिका में पहले स्थान पर रहा। हालांकि मेजबान केरल ने कुल 162 पदकों के साथ सबसे ज्यादा पदक जीते और प्रतियोगिता में अपना अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया। खेल के पहले कुछ दिन तैराकों का दबदबा रहा जिन्होंने तरणताल में कई पुराने रिकार्ड डूबो दिए तो कुश्ती में हरियाणा ने अपना दबदबा कायम रखते हुए 18 स्वर्ण जीते।  वहीं जीतू राय और विजय कुमार के शानदार प्रदर्शन के सहारे एसएससीबी ने शूटिंग के 26 में से कुल 15 स्वर्ण पदक अपने नाम किए। अगर नए चेहरों की बात करें तो तैराकी प्रतिस्पर्धाओं में सबसे बड़े स्टार स्थानीय तैराक सजन प्रकाश रहे जिन्होंने छह स्वर्ण पदक जीते। शानदार प्रदर्शन की वजह से प्रकाश को अपने राज्य में ‘गोल्डन शार्क’ का नाम मिला। लेकिन इस शार्क को भविष्य में क्या इनाम और पहचान मिलेगा यह भी उसके प्रतिभा पर निर्भर करेगा। वहीं एशियाई खेलों के कांस्य पदक विजेता मध्य प्रदेश के संदीप सेजवाल और एसएससीबी के मधु पीएस ने चार-चार स्वर्ण पदक जीते। महिला वर्ग में रिचा मिश्रा और 15 साल की माना पटेल ने क्रमश: चार और तीन स्वर्ण पदक अपने नाम किए। एशियाई खेलों की पदक विजेता टिंटू लुका (800 मीटर और 4 गुना 400 मीटर रिले) और ओपी जैशा (5,000 मीटर एवं 10,000 मीटर) ने केरल के शानदार प्रदर्शन का नेतृत्व किया। लिंग परीक्षण में असफल रहने के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध के खिलाफ  कानूनी लड़ाई लड़ रहीं ओडिशा की दूती चंद मीट रिकार्ड बनाकर 100 मीटर में चैंपियन बनीं। अपने खिलाड़ियों को राज्य सरकारों ने कमोबेश सराहा होगा लेकिन केंद्र में इसकी चर्चा भी नहीं हुई।  बावजूद इसके खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन के जरिए शीर्ष पर बैठे क्रिकेट के दीवानों को बताया है कि प्रतिभा, सुविधा और चर्चा की मोहताज नहीं है। 

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