Friday, 25 November 2016

नोट की कीमत तुम क्या जानो...

एटीएम से जब कड़क नोट बाहर आते हैं तो ये बहुत अच्छा लगता है लेकिन क्या कभी सोचा है कि नोट छापने में कितना पैसा लगता है? आखिर आरबीआई और सरकार मिलकर कितना खर्च करते हैं? आइए हम समझाते हैं आपको यह गणित - 

किस नोट की छपाई में कितना पैसा?
05 रुपये का नोट छापने में 50 पैसा खर्च होता है
10  रुपये के लिए 0.96  पैसे की लागत आती है
50 का नोट छापने में 1 .81 रुपये का खर्च है
100  का नोट छापने में 1.79  रुपये की लागत आती है
500 और1000 रुपये के नोट (जो बंद हो चुके हैं) छापने में 3.58 और 4.06 रुपये का खर्च आता था।
10 के सिक्के की छपाई में 6.10 रुपये खर्च होते हैं।
2016 जून तक रिजर्व बैंक ने 2120 करोड़ करेंसी नोट छपे हैं, जिसके लिए करीब 3421 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
पेपर छापने वाला सिर्फ एक कारखाना
देश में नोट के पेपर छापने वाला एकमात्र कारखाना मध्यप्रदेश के होशांगाबाद में स्थित 'सिक्योरिटी पेपर मिल' है। इसकी स्थापना 1968 में हुई थी और यह सिर्फ 2.8 मैट्रिक टन पेपर बना सकता है। बाकी के पेपर जर्मनी, जापान और ब्रिटेन से मंगवाए जाते रहे हैं। 2015 में होशांगाबाद में एक नया यूनिट खोला गया और मैसूर सिक्योरिटी प्रेस के पास एक नए करंसी पेपर बनाने वाले प्लांट का काम शुरू किया गया। मैसूर वाली फैक्ट्री करीब 12,000 मैट्रिक टन नोट के लिए इस्तेमाल होने वाला कागज बना पाएगा।

नोट छापने वाली पहली फैक्ट्री नासिक में
देश का पहली नोट छापने वाली फैक्ट्री नासिक में 1926 में स्थापित की गई थी और वह 1928 से नोट छाप रही है। इसके बाद 1975 में देवास, मध्य प्रदेश में दूसरी, 1999 में मैसूर में तीसरी और 2000 में सालबोनी, पश्चिम बंगाल में चौथी नोट छापने वाली प्रेस की स्थापना की गई।  हालांकि जो नए 2000 और 500 के नोट आ रहे हैं उनमें से कुछ देश में बने हुऐ हैं।

यह भी जान लीजिए 
-  जिस कागज पर छपाई होती है उसका बेहद छोटा सा हिस्सा ही देश में बनता है।
- होशंगाबाद एसपीएम में सिर्फ पांच फीसदी करेंसी पेपर की छपाई ही होती है
- ज्यादातर कागज और स्याही जर्मनी की जीएस्की एंड डेवरेंट या ब्रिटेन की दे ला रू कंपनी से मंगवाया जाता है।

Friday, 11 November 2016

सुनो टाइगर, ट्रंप आ गया

2014 में ट्रंप की मुलाकात हुई थी इवानोविच से
विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के नए मुखिया डोनाल्ड ट्रंप महिलाओं की 'ठर्की' छवि किसी से छुपी नहीं है। वह महिलाओं के लिए 'प्यार' बरसाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान न जाने कितनी महिलाओं ने ट्रंप पर संगीन आरोप लगाए। किसी ने कहा कि वह जबरन स्मूच करता है तो किसी ने बताया कि ट्रंप बिना इजाजत के भी महिलाओं की चेंजिंग रूम में घूस जाता है। वह किसी के लिए 'सेक्शुअल दरिंदा’ है तो किसी के लिए हवसी इंसानी।  बहरहाल अब सच यह है कि वह अमेरिका के नए राष्ट्रपति हैं। अब जब वह अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं तब कुछ महिलाएं विरोध भी कर रही हैं वहीं कुछेक डरी हुई हैं । इन सब के बीच अमेरिका से कोसों दूर बैठा एक दिग्गज फुटबॉलर भी है, जो ट्रंप के आने से संभवतः डर गया है। दरअसल, ट्रंप सर्बिया की महिला टेनिस खिलाड़ी एना इवानोविच की खूबसूरती के दीवाने हैं। दीवानगी भी ऐसी कि तीन साल पहले 70 वर्षीय ट्रंप ने सर्बिया के प्रधानमंत्री इविका डाकिक से मुलाकात के दौरान इवानोविच की खूबसूरती की तारीफ कर डाली। डोनाल्ड ट्रंप की 2014 में सर्बिया के प्रधानमंत्री से मुलाकात व्यापारिक निवेश को लेकर हुई थी। उन्होंने इस दौरान पूर्व नंबर एक खिलाड़ी इवानोविच में काफी दिलचस्पी दिखाई। यही नहीं, ट्रंप ने यहां तक कह दिया था कि मैंने अपनी जिंदगी में अब तक जितनी महिलाओं को देखा है उनमें से इवानोविच सबसे खूबसूरत हैं।' वर्तमान में विदेश मंत्री डाकिक ने बताया कि तब ट्रंप 15 मिनट तक इवानोविच और उनकी खूबसूरती के बारे में ही बात करते रहे। इवानोविच ने हाल ही में जर्मनी के फुटबॉलर बास्टियन श्वांटाइगर से शादी की है। टाइगर ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल को अलविदा कह दिया है। बास्टियन श्वांटाइगर 2014 में विश्व चैंपियन बनी जर्मनी की टीम के अहम सदस्य थे।


फिर भी महिलाओं की पसंद ट्रंप!
यौन उत्पीड़न के तमाम आरोपों के बावजूद बड़ी संख्या में महिला वोटरों ने डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस पहुंचने में मदद की। ‘सीएनएन’ के एक्जिट पोल के मुताबिक अपनी प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को 54 प्रतिशत महिला वोट हासिल होने के साथ ट्रंप को 42 प्रतिशत महिला वोटरों का साथ मिला जिससे उनकी जीत का रास्ता मजबूत हो गया। वहीं 53 प्रतिशत श्वेत महिला वोटरों ने रिपब्लिकन उम्मीदवार का समर्थन किया उनमें अधिकतर (62 प्रतिशत) कॉलेज नहीं पहुंची हैं। चुनाव के नतीजों ने पूर्वानुमानों को खारिज कर दिया कि महिलाओं के खिलाफ ट्रंप की लिंगभेदी और अभद्र टिप्पणी से महिला वोटर दूर हो जाएंगी।







Thursday, 27 October 2016

इस लड़ाई में ऑस्ट्रेलिया कहां?


अगर कोई आपसे सवाल पूछे - लंबे समय तक क्रिकेट की बादशाहत किस टीम के पास रही है ? निश्चित ही आपका जवाब ऑस्ट्रेलिया होगा। और इस जवाब में दम भी है क्योंकि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट ने लगभग तीन दशक तक विश्व क्रिकेट पर एकछत्र वर्चस्व बनाए रखा। जीत की जो बयार ऑस्ट्रेलियाई टीम में चली उस टीम को एलन बॉर्डर और स्टीव वॉ से लेकर रिकी पोटिंग तक ने संभाला।  हालांकि समय - समय पर उन्हें हार भी मिली लेकिन इससे कंगारूओं की ख्याति पर असर नहीं पड़ा। वह अपने अग्रेसन और जुझारू क्रिकेट को हमेशा ही निखारते रहे। चार बार वनडे क्रिकेट की विश्व चैंपियन कोई देश बन जाए और टेस्ट क्रिकेट की रैंकिंग में करीब एक दशक तक नंबर वन रह जाए तो समझ लीजिए उस टीम में जो भी खिलाड़ी आ रहा है अपना बेस्ट देकर जा रहा है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब ऑस्ट्रेलियाई टीम हर बार हार के नए रिकॉर्ड बनाती है। अभी हाल ही में दक्षिण अफ्रीका ने वनडे में 5-0 से हराकर ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के अच्छे दिन की ताबूत में आखिरी कील दे मारी है। दरअसल, ऑस्ट्रेलियाई टीम अभी एक त्रासदी के दौर से गुजर रही है। टीम में कप्तान स्टीवन स्मिथ को छोड़ दें तो कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं नजर आ रहा है जो ऑस्ट्रेलिया को नई संजीवनी दे सके। कंगारू टीम की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसके अनुभवी पूर्व खिलाड़ी भी वर्तमान खिलाड़ियों को क्रिकेट की बारीकियां सीखाने की बजाए आपस में ही भिड़े हैं। मसलन, अभी कुछ दिनों पहले ही पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क ने एक टीवी इंटरव्यू में साथी खिलाड़ी और ऑलराउंडर शेन वॉटसन को टीम का 'ट्यूमर' बताया था तो अब वॉटसन के दोस्त और तेज गेंदबाज मिशेल जॉनसन ने क्लार्क को ही जहरीला बता दिया है। हालांकि वॉटसन ने इस पूरे मामले पर अभी कुछ ऐसा नहीं बोला है जिससे, सुर्खियां बन जाएं।  तर्क देने वाले यह कह सकते हैं कि जॉनसन की आत्मकथा आ रही है शायद इसलिए वह ऐसा बयान दे रहे हैं। लेकिन सच यह है कि 73 टेस्ट मैच खेल चुके जॉनसन और पूर्व कप्तान माइकल क्लार्क के रिश्तों मेंं 2013 के बाद से ही खटास आ गई थी। बहरहाल, जॉनसन ने दावा किया है कि
माइकल क्लार्क की अगुवाई में कंगारू टीम जहरीली हो गई थी। जॉनसन ने साथ ही कहा कि टीम के कई खिलाड़ी क्लार्क के नेतृत्व में नहीं खेलना चाहते थे। 2013 में भारत दौरे से पहले कोच मिकी आर्थर द्वारा दिए गए टास्क को नहीं कर पाने की वजह से प्रतिबंधित होने वाले चार खिलाड़ियों में से एक जॉनसन ने बताया कि 2011 में रिकी पोंटिंग के कप्तान छोड़ने के बाद से ऑस्ट्रेलियाई टीम खंडित हो गई थी।  जॉनसन ने कहा,  यह निश्चित ही शानदार बदलाव था लेकिन यह एक टीम नहीं थी। टीम गुटों में बंट गई थी और यह बेहद जहरीला था। यह धीरे-धीरे तैयार हो रहा था लेकिन सभी इसको देख सकते थे। टीम का हर सदस्य इसको महसूस कर रहा था। उस वक्त कुछ भी नहीं किया जा सका। उन्होंने आगे कहा कि यह सुखद नहीं था लेकिन जब आप अपने देश के लिए खेलते हैं तो माना जाता है कि आप एंन्जॉय करेंगे। जॉनसन ने आगे कहा कि हम सब के लिए यह बेहद ही खराब अनुभव और समय रहा। जॉनसन और क्लार्क के रिश्तों में 2013 के बाद खटास आ गई। इस पर जॉनसन ने कहा कि मुझे इस बारे में नहीं पता कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन हां मैं भी अन्य लोगों की तरह महसूस कर रहा था। 35 वर्षीय जॉनसन ने अपनी बायोग्राफी रीजिलिएन्ट में क्लार्क संग अपने रिश्तों का जिक्र किया है।  यह लड़ाई किस हद तक जाएगी और इसमें अभी और कौन-कौन से किरदार कूदेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।  बहरहाल, इन सब के बीच यह तो स्पष्ट हो गया है कि ऑस्ट्रेलिया के पूर्व खिलाड़ी अभी अपनी सारी एनर्जी आपसी लड़ाई में लगा रहे हैं और टीम की तरक्की से किसी को कोई वास्ता नहीं रह गया है।

Sunday, 23 October 2016

ट्रंप में हमारी दिलचस्पी क्यों?

अमेरिका में किसकी सरकार बनेगी, इस पर जितनी बहस वहां हो रही है उससे कहीं ज्यादा चर्चा भारतीय सोशल मीडिया पर है। भारतीय सोशल मीडिया पर आए दिन हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप ट्रेंड कर रहे हैं।  एक सर्वे में पता चला है कि इन दिनों भारत का हर चौथा यूजर अमेरिका चुनाव से संबंधित ट्वीट कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अस्सी फीसदी ट्वीट या फेसबुक पोस्ट रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के लिए हो रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या सच में भारतीय सोशल मीडिया के धुरंधर अमेरिका की राजनीति में इतनी दिलचस्पी रख रहे हैं या फिर इसका कुछ और हीं खेल है? आइए हम समझाते हैं इस गणित को। दरअसल, चुनाव को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी मीडिया मुगल डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कब्जा जमा रखा है और उन्होंने इसका जाल भारत तक फैलाया है। डोनाल्ड ट्रंप ने करीब साल भर पहले ही इसकी शुरुआत कर दी थी। यहां तक कहा जाने लगा था कि डोनाल्ड ट्रंप किसी पार्टी के नहीं, ट्विटर के उम्मीदवार हैं। बहरहाल, भारत में ट्रंप के लिए काम उत्तर प्रदेश के नोएडा से साइबर टीम कर रही है। “जनमत कॉनेक्ट” नाम की इलेक्शन कैंपेन मैनेजमेंट करने वाली ये टीम अमेरिकी प्रवासी भारतीयों को ट्रंप के पक्ष में समर्थन देने के लिए कॉंटेंट डेवलपमेंट का काम कर रहे हैं। इस टीम के क्रिएटिव हैड गिरीश पाण्डेय के मुताबिक “जनमत कॉनेक्ट” की टीम इंडिया सपोर्ट ट्रंप, ट्रस्ट ट्रंप और गियर अप ट्रंप तीन तरह के अभियान के लिए कॉन्टेंट डेवलपमेंट कर रही है।  इस काम को करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप की समर्थक मेरिमा विचर भी सहयोग दे रही हैं। वह ट्रंप के ऊपर एक किताब लिख चुकी हैं और उनके चुनावी अभियान प्रबंधन की टीम का अहम हिस्सा हैं।  इस टीम का मकसद अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीय वोटरों को लुभाना होता है। अमेरिकी चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ और जिक्र करना इसी रणनीति का हिस्सा है। यहां से टीम कई तरह के सलाह देती है।

सोशल फ्रेंडली हैं अमेरिकी युवा
एक अमेरिकी संगठन के शोध में पता चला कि वहां 18 से 24 साल तक के युवाओं के बीच सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा संपर्क सूत्र है। यह वर्ग सबसे पहले सोशल मीडिया पर कोई भी जानकारी हासिल करता है। इस आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 34 प्रतिशत बताई जाती है। अमेरिका में हुई एक अन्य रिसर्च के अनुसार 15 से 25 वर्ष की आयु के लोग 41 प्रतिशत हैं और वह अपने किसी भी राजनीतिक कार्य के लिए सोशल मीडिया पर ही चर्चा करना उचित समझते हैं। ये युवा सोशल वेबसाइट पर तो अपने विचारों को प्रकट करते ही है, साथ ही मोबाइल के एप्स पर भी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बारे में टिप्पणियां और उनके वीडियो शेयर करते है।



Tuesday, 13 September 2016

साहेब के खौफ का भ्रम...

शहाबुद्दीन की रिहाई के कुछ ही घंटों बाद मेरे एक मित्र ने कॉल कर मुझसे पूछा, क्या सच में 'साहेब' की वापसी से सीवान सहम गया है? चूंकि मैं सीवान से हूं तो संभवतः मेरे मित्र ने मुझमें ग्राउंड रिर्पोटर जैसा कुछ देखा होगा। हालांकि मेरे लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल नहीं था फिर भी बोलने से पहले काफी वक्त लिया। दरअसल, इस सवाल ने एक ही झटके में होश संभालने के बाद के उस 15 साल के काल को सामने लाकर रख दिया, जिसका मैं किसी से कभी जिक्र करना पसंद नहीं करूंगा। वो 15 साल, जिसमें मैंने हत्या और रंगदारी के रोज नए-नए किस्से सुने और हर दिन हत्या करने के तरीकों के बारे में अखबारों में पढ़ा। वो 15 साल, जिसमें मैं क्या,कोई भी शहाबुद्दीन को उनके नाम से नहीं बल्कि 'साहेब' से जानता और संबोधित करता था और अगर किसी ने गलती से शहाबुद्दीन  बोल दिया फिर तो उसकी खैर नहीं। घर वालों से लेकर बाहर वाले तक खामोश रहने की नसीहत देते रहे।  यह जितना सच है उससे कहीं अधिक सच यह है कि अब सीवान में वैसी स्थिति नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ लोग साहेब रिहाई के  बाद भय का दंभ भर रहे हों लेकिन उन्हें भी बखूबी एहसास है कि यहां अब बच्चा- बच्चा शहाबुद्दीन को साहेब नहीं बल्कि शहाबुद्दीन को नाम से बोलने का माद्दा रखता है।  इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि भय का माहौल अगर शहाबुद्दीन ने बनाया तो वह सिर्फ सीवान शहर तक ही सीमित था। शहाबुद्दीन इसलिए रॉबिनहुड बना क्योंकि लालू यादव जैसे स्वार्थसाधक राजनीतज्ञ की शरण में था और दूसरी खास बात उसके साथ रही कि वह  मुसलमान है।
  अगर उसके भय की बात करें तो जो लोग सीवान को जानते हैं उन्हें बखूबी पता है। सच तो यह है कि सीवान का पड़ोसी जिला गोपालंगज है और वहां कभी सतीश पांडे के आगे साहेब का 'स्पार्क' नहीं चला तो जिले में ही सुरेश चौधरी, गुड्डु पंडित, अयुब-रईस और अजय सिंह जैसों अपराधियों ने चुनौती दी। यह बात 11 साल पहले की थी ।

यह तब की बात है जब साहेब की खूब चलती थी और जंगलराज के वह मुख्य किरदार थे।  अब तो ऐसा कुछ है भी नहीं। शहाबुद्दीन का कथित आतंक भी खत्म हो चुका है। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया की आवाज भी मुखर हो चली है। ललकारने वाले बहुत हैं।ऐसे में जो लोग यह समझ रहे हैं कि 11 साल बाद एक बार फिर से उसका भय सीवान के लोगों में आ गया है तो निश्चित ही वह भ्रम में हैं। जिन लोगों में भय का जो भ्रम है वह जितनी जल्द हो सके इस पट्टी को उतार लीजिए।     


हिंदी दिवस पर खासः सिंहासन की सीढ़ियों पर बैठी राजभाषा

गांधीजी ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहा था, तो इसी हिंदी की खड़ी बोली को अमीर खुसरो ने अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करने का माध्यम बनाया था, लेकिन दुर्भाग्य है कि जिस हिंदी को लेखकों ने अपनाया, जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की शान बताया, उसे देश के संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं, सिर्फ राजभाषा का दर्जा दिया गया। हालांकि मौजूदा दौर में हिंदी का वर्चस्व देश-विदेश में बढ़ा है। देश की राजभाषा अब धीरे-धीरे, पर दृढ़ता से, राष्ट्रभाषा के सिंहासन की सीढ़ियां चढ़ती दिख रही है..

किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्र पहचान उसके साथ जुड़ी एक ऐसी भाषा से भी होती है, जो उस पूरे राष्ट्र में आसानी से बोली, सुनी और समझी जाती है। भारत जैसे विविध भाषा-भाषी राष्ट्र में निर्विवाद एक ऐसी भाषा, जो देश के अधिकांश हिस्सों मे बोली और समझी जाती हो और जिसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देकर देश की स्वतंत्र पहचान से जोड़ा जाए, यह बड़ा कठिन कार्य था। 14 सितंबर 1949 को एक महत्वपूर्ण निर्णय के द्वारा देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी को राजभाषा का सम्मानित दर्जा दिया गया। उस दौरान भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर, 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए तीन महत्वपूर्ण बातें कही थीं। पहली, किसी विदेशी भाषा को अपनाकर कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता।
दूसरी, कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती। और तीसरी, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने, अपनी आत्मा को पहचाने के लिए हमें हिंदी को अपनाना चाहिए। गांधी जी ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। 1918 में हिंदी साहित्य सम्मलेन की अध्यक्षता करते हुए गांधी जी ने कहा था कि हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। 1949 में जब हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था तब तय किया गया था कि 26 जनवरी, 1965 से सिर्फ हिंदी ही भारतीय संघ की एकमात्र राजभाषा होगी। लेकिन 15 साल बीत जाने के बाद जब इसे लागू करने का समय आया तो तमिलों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। बकायदा 13 अक्तूबर 1957 को हिंदी विरोध दिवस के रूप में मनाया। उस समय तमिलनाडु, मद्रास, केरल और अन्य जगह हिंदी के विरुद्ध फैल रहे आंदोलन दंगों का रूप लेने पर आमादा हो गए थे। पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने फैसला लिया कि जब तक सभी राज्य हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप मे स्वीकार नहीं करेंगे, अंग्रेजी हिंदी के साथ राजभाषा बनी रहेगी। इसका परिणाम यह निकला कि आज भी हिंदी अस्तित्व के लिए लड़ रही है। जानकार मानते हैं कि अगर आज भी पूरा हिंदुस्तान एक होकर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए राजी हो जाए, तो संविधान में उसे यह स्थान मिल सकता है।
अमीर खुसरो की हिंदी
अमीर खुसरो ने हिंदी को अपनी मातृभाषा कहा था। इसके बाद हिंदी का प्रसार मुगलों के साम्राज्य में भी हुआ। हिंदी के प्रचार-प्रसार में संत संप्रदायों का भी विशेष योगदान रहा, जिन्होंने इस जनमानस की बोली की क्षमता और ताकत को समझते हुए अपने ज्ञान को इसी भाषा में देना सही समझा। भारतीय पुनर्जागरण के समय भी राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन और महर्षि दयानंद जैसे महान सामाजिक नेताओं ने हिंदी का प्रसार किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी गद्य को मानक रूप प्रदान किया। महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और सुमित्रानंदन पंत जैसे रचनाकारों ने भी हिंदी का प्रसार किया।

हिंदी सिनेमा का योगदान
गीतकार गुलजार का दावा है कि हिंदी के प्रसार-प्रचार में सबसे बड़ा योगदान हिंदी सिनेमा का है। हिंदी फिल्मों की वजह से ही पूरे हिंदुस्तान में हिंदी संपर्क की भाषा मानी जाती है। अमेरिका में हिंदी पढ़ा रहीं अनिल प्रभा कुमार का कहना है कि वह अपने छात्रों को हिंदी सिखाने के लिए हिंदी गानों का सहारा लेती हैं। बताया कि कैसे वह भविष्काल पढ़ाने के लिए हिंदी गानों को इस्तेमाल करती हैं, जैसे हर दिल जा प्यार करेगा का प्रयोग होता है। इसी को एक्टिव वॉयस में पढ़ाने को वह कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है गाने का सहारा लेती हैं।

उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी भाषा जरूरी
महावीर प्रसाद द्विवेदी लका कहना था, ‘अपने देश, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है।’ महात्मा गांधी का कहना रहा, ‘अपनी भाषा के ज्ञान के बिना कोई सच्चा देशभक्त नहीं बन सकता। समाज का सुधार अपनी भाषा से ही हो सकता है। हमारे व्यवहार में सफलता और उत्कृष्टता भी हमारी अपनी भाषा से ही आएगी।’ कविवर बल्लतोल कहते हैं, ‘आपका मस्तक यदि अपनी भाषा के सामने भक्ति से झुक न जाए तो फिर वह कैसे उठ सकता है।’ डॉ. जॉनसन की धारणा थी, ‘भाषा विचार की पोशाक है। भाषा सभ्यता और संस्कृति की वाहन है और उसका अंग भी।’

हिंदी मीडिया घर-घर
आज भारत में हिंदी के अखबारों की प्रसार संख्या सबसे अधिक है।  यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, यानी हिंदी का अधिक प्रसार हो रहा है, इसमें कुछ हद तक विज्ञापन व बाज़ार की भी भूमिका है। आज तमाम विज्ञापन हिंदी या हिंग्लिश में जारी होते हैं, क्योंकि उपभोक्ता तो हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में ही सबसे अधिक हैं।  टीवी न्यूज चैनलों ने भी हिंदी को बढ़ावा दिया है। जबसे कार्टून नेटवर्क, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक, एनिमल प्लेनेट आदि ने अपने कार्यक्रम हिंदी में देना शुरू किए हैं, उन्हें देखनेवालों की तादाद दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ रही है।

परदेस में हिंदी की जलवा
मॉरिशस में 1834 से बिहार के छपरा, आरा और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, गोंडा आदि जिलों से कईं सैंकड़ों की तादाद में बंधुआ मजदूरों का आगमन हुआ। महात्मा गांधी जब 1901 में मॉरिशस आए तो उन्होंने भारतीयों को शिक्षा तथा राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रेरित किया। धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं के उदय होने से यहां हिंदी को व्यापक बल मिला। फिजी में पांच मई 1871 में गिरमिट प्रथा के अंतर्गत आए प्रवासी भारतीयों ने इस देश को जहां अपना खून-पसीना बहाकर आबाद किया, वहीं हिंदी भाषा की ज्योति भी प्रज्जवलित की। फिजी के संविधान में हिंदी भाषा को मान्यता प्राप्त है। कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज, अदालत तथा संसद में भी हिंदी भाषा का प्रयोग कर सकता है। नेपाल में हिंदी प्रेम हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काफी है। श्रीलंका में भारत से आई हिंदी पत्र-पत्रिकाएं जैसे बाल भारती, चंदा मामा, सरिता आदि बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। यहां के विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाई जा रही है। संयुक्त अरब अमीरात में एफएम रेडियो के कई ऐसे चैनल हैं, जहां चौबीसों घंटे नए अथवा पुराने हिंदी गाने बजते हैं। ब्रिटेन के लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिंदी पठन-पाठन की व्यवस्था है। बीबीसी से हिंदी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। अमेरिका में येन विश्वविद्यालय में सन 1815 से ही हिंदी की व्यवस्था है।

हिंदी का नया बाजार
यह सम्भावना जताई जा रही है कि 2017 तक भारत में इंटरनेट के उपयोगकर्ता 50 करोड़ हो जाएंगे, जिसमें से 49 करोड़ लोग मोबाइल फोन के माध्यम से इंटरनेट का उपयोग करेंगे। इस समय भारत में हर पांचवां उपयोगकर्ता हिंदी वाला है। यह हिंदी का नया बाजार है। ब्लॉगिंग, वेबसाइट्स के बाद फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल साइट्स ने बड़े पैमाने पर हिंदी समाज को जोड़ा, लोगों के बीच हिंदी में संवाद को संभव बनाया। सोशल मीडिया में हिंदी धीर-धीरे अपनी धाक जमाने में सफल हो रही है। इसके सकारात्मक संकेत दिखाई देने लगे हैं। इसने सबसे बड़ा मिथ यह तोड़ा है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं। आज कईं ऐसी साहित्यिक वेबसाइट्स हैं, ब्लॉग हैं जिनकी पाठक संख्या लाखों में है। वह भी बिना किसी सनसनी के, बिना अश्लीलता परोसे। जबकि यह आम धारणा रही है कि जो मूल्यहीन साहित्य होता है, जो लोकप्रियता के मानदंडों के ऊपर आधारित होता है उसका ही बड़ा पाठक वर्ग होता है। उदाहरण के रूप में जासूसी, रूमानी साहित्य की धारा का जिक्र किया जाता रहा है। लेकिन सोशल मीडिया ने यह दिखा दिया है कि अच्छे और बुरे साहित्य के सांचे अकादमिक ही हैं. फेसबुक जैसे माध्यम हों या ब्लॉग्स, वेबसाइट्स तथाकथित गंभीर समझे जाने वाले, वैचारिक कहे जाने वाले साहित्य के लिए पाठक कम नहीं हैं बल्कि बढे़ ही हैं। यह बात कही जा सकती है कि टीवी क्रांति के दौर में जो पाठक हिंदी से जुदा हो गया था, सोशल मीडिया ने उसकी वापसी करवा दी है। यह कहना अतियशयोक्ति नहीं होगी कि तरंग पर सवार हिंदी सही मायने में आज एक गांव से उठकर वैश्विक धरातल पर पहुंच गई है।

हिंदी आती है 80 करोड़ की समझ में
दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी तीसरे नंबर पर है। लेकिन इसे भारतीय कूटनीति की विफलता कहें या कुछ और, हिंदी संयुक्त राष्ट्र में प्रयोग की जानी वाली 6 अधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं हैं। जबकि दुनिया में तकरीबन 80 करोड़ लोग इस भाषा को समझ सकते हैं। साफ तौर पर बात करने वाले लोगों का आंकडा देखे तो हिंदुस्तान में 45 करोड़ नागरिक इसी में बात करते हैं। इस भाषा की वर्णमाला में 56 अक्षर हैं, जबकि शब्दों की संख्या बहुत अधिक।



Thursday, 8 September 2016

उसके ठुमकों से टूटती हैं बेड़ियां


जब वह मंच पर ठुमके लगाती है तो पीछे बैठे 'मर्द' घूरते रहते हैं, उस पर वो पैसे सिर्फ इसलिए लुटाते हैं ताकि वह झुके और उसके स्तन का ऊपरी हिस्सा दिख सके या फिर उस ब्रा की स्ट्रिप ही दिख जाए, जिसके लिए घंटों से 'मर्द' उतावले हैं। वह जब दुपट्टा उतार कर बेफिक्र हो डांस करती है तब मोबाईल से वीडियो बनाने वाले मंच के करीब पहुंच जाते हैं। दबंग तो उसको जानबूझकर छु भी लेते हैं। जी हां, ये वो 'मर्द' हैं जो बेटियों के पैदा होने से बेहतर अपनी बीवी को बांझ रखना समझते हैं। ये वही 'मर्द' हैं जिन्हें अपने बेटे के लिए बहू आयात करनी पड़ती है। इसी समाज ने उस ठुमके लगाने वाली सपना चौधरी को जिंदगी और मौत के बीच में लाकर पटक दिया था। दरअसल, उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं होगा कि इस बंजर जमीं पर बेड़ियां तोड़ने वाली सपना जैसी बेटियां भी पैदा होती हैं। सपना सिर्फ रागिनी गाने वाली गायिका या डांसर ही नहीं है, वह हर बेड़ियों को अपने अंदाज में तोड़ने वाली महिला भी है। सपना ने उस खोखले समाज को अपने ठुमके पर नचाया, जिसमें बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक 'लड़की' के नाम पर हवस की लार टपका लेते हैं। सच तो यह है कि वहां के लोगों ने कभी न सपना को स्वीकारा और न ही उनके जैसी लड़कियों को, जो उनकी सोच से इतर बिंदास हो मंच पर आती हैं । जब समाज के ठेकेदारों को लग रहा था कि सपना समाज को गंदा कर रही हैं उसी दौर में उनके एक प्रशंसक ने ऐसे ही मजाक में पूछ लिया, अगर आपका पति आपको डांस करने से रोके तो क्या करेंगी? इस पर सपना ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, तब अपने पति नू छोड़ दूंगी और तुझसे ब्याह रचा लूंगी। सपना के इस जवाब ने एक ही झटके में तब उन आलोचकों को शांत कर दिया जो अब तक उनके मंच पर भड़काऊ डांस और गानों पर आंखें तो सेंक रहे थे लेकिन मुंह भी बिचका रहे थे। दरअसल, सपना को ऐसा ढोंगी समाज मंजूर नहीं है। वह अपने डांस की तरह बोल्ड और बेफिक्र रहना चाहती हैं। उन्हें यह नहीं परवाह की समाज क्या कहेगा? तभी तो एक इंटरव्यू में जब सपना से पत्रकार ने पूछा कि आप कैसी जिंदगी जीना पसंद करेंगी। इस पर उन्होंने तपाक से जवाब दिया, 'म्हारी जिंदगी का फंडा से,  जो भी अच्छा लाग्ये, करो। जो दिल नू सही लाग्ये, करो। जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। एक-एक मिन्ट को एक-एक साल की तरह जियो। बस किसी ना दिल मत दुखाओ और अगर गलती से ऐसा हो तो माफी भी मांग लो। ' वाकई सपना ऐसी ही जिंदगी जीती आ रही हैं। जब सपना को पता चला कि उनके एक गाने से खास जाति का दिल दुख गया तब उन्होंने माफी भी मांग ली लेकिन जो समाज बेटियों को पचा नहीं पाता है वह भला सपना के माफीनामे को क्यों सुने? उनके खिलाफ कानून से लेकर सोशल मीडिया तक अभियान छेड़ा गया। मां की गाली, बहन की गाली, वेश्या  और न जाने क्या-क्या... सपना के बारे में कहा गया। जिस 'मोर' के लिए वह नाचती रहीं उसने भी सपना का साथ छोड़ दिया। वह क्या कोई भी महिला सबकुछ बर्दाश्त नहीं कर सकती है। ऐसे में उन्हें शायद आत्महत्या का रास्ता ही नजर आया। बहरहाल, उन्होंने यहाँ भी मौत को नचाया और जिन्दगी की जंग जीत ली है। उम्मीद है उन बेड़ियों को तोड़ने के लिए वो फिर तैयार हैं।

इसलिए आहत हैं लोग
सपना के रागिनी ' बावली जात चमारा की' गाने से हरिजन जाति के लोग आहत हैं। दरअसल, इसमें 'चमार' और 'बावला' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। गांव की भाषा में चमार हरिजन को कहते हैं। जबकि बावला मतलब पागल होता है।


वह गाना भी सुन लीजिए, जो बन गई है सपना के गले की फांस



ये है सपना के लिए सभ्य समाज के लोगों के विचार
किराय की औरत अपनी ओकात भूल गई ।
-सपना पंडित कहिए चौधरी नहीं हरियाणा जाट बहुल क्षेत्र है हरियाणा में प्रसिद्ध होने तथा अपनी अश्लील हरकतो से जाटों को बदनाम करने के लिए सपना पंडित अपने नाम के साथ चौधरी शब्द लगाती है बावली जात चमारां की रागनी पंडित लखमी चंद ने बाबा भीमराव के और दलितों पिछड़े वर्ग के लोगों का अपमान करने के लिए लिखी थी इन दोनों पर मुकद्दमा दर्ज किया जाए

भददे कमेंट देखने के लिए https://www.youtube.com/watch?v=nSEe7NWlRXw लिंक के कमेंट में जाएं



यह है वह 'सॉलिड बॉडी' गाना, जिससे मशहूर हुईं सपना




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