Thursday, 23 March 2017

किस करना कोई इनसे सीखे..

आपको फिल्म थ्री इडियट का वह सीन तो याद ही होगा, जिसमें चतुर रामलिंगन अपने प्रिंसिपल के लिए तारीफ के दो शब्द बोलता है। उस सीन के एक डायलॉग में चतुर अपने समय का सदुपयोग कैसे करें,ये प्रिसिपल से सीखने की सलाह देता है। अगर उस सीन के एक डायलॉग की तर्ज पर कोई आपसे पूछ कि आप लोगों को इमरान हाशमी से क्या सीखने की सलाह देंगे तो आपका जवाब संभवत: होगा — कोई किस करना इमरान हाशमी से सीखे।

जी बिलकुल, इमरान हाशमी ने देश की जनता को किस ​की किस्मों के बारे में बताया। इमरान ने फिल्मी दुनिया में उस दौर में कदम रखा जब देश 2003 विश्वकप के फाइनल में हार का गम मना रहा था। तभी इमरान ने लोगों को जीने की वजह बताई। क्रिकेट के दीवाने देश के लोगों की घोर निराशा को इमरान हाशमी ने आशा में बदलने का काम किया। उन्होंने बताया​ कि 22 गज की पिच से निकलकर सिनेमाहॉल के परदे की ओर नजर घूमाओ, सब फील गुड होगा। इस फील गुड से आपको शायद अटल बिहारी बाजपेयी की याद आ गई होगी। बहरहाल, ये भी जान लीजिए कि बाजपेयी जी के इंडिया शाइन के सपने को इमरान ने भी चमकाया। उन्होंने अपने टैलेंट से हर उम्र के मर्दों को खुश किया। वो अलग बात है कि वो सब छुप के उनके टैलेंट को देखते थे।  दरअसल, अपने 14 साल के फिल्मी कैरियर में किस को लेकर कई प्रयोग किए। 33 से अधिक फिल्में कर चुके इमरान को अपने टैलेंट के बारे में बखूबी पता है । इसी गंभीरता को देखते हुए उन्होंने किस आॅफ लाइफ नामक बायोपिक भी ला दी।  

उन्होंने किसी भी हीरोइन से कभी भेदभाव नहीं किया। मल्लिका सेहरावत से लेकर प्राची देसाई तक को उन्होंने अपने किसिंग टैलेंट का लोहा मनवाया। हालांकि बीच में अजहर, शंघाई जैसी फिल्मों में जब वह दिखे तब लगा कि वह पूरी फिल्म में गंभीर रहेंगे। लेकिन बीच—बीच में उन्होंने किसिंग सीन से प्रशंसकों को निराश नहीं किया।बहरहाल, आज इमरान का जन्मदिन है, उनके बारे में विभिन्न वेबसाइट पर कई तरह की जानकारी आप सभी को दी जाएगी। इसलिए मैं ज्ञान बखारने से बेहतर इमरान हाशमी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देना पसंद करूंगा ।


Wednesday, 22 March 2017

मियां, तुम तो बहुत गरीब हो...

कहते हैं, प्यार में अमीरी— गरीबी नहीं देखी जाती है! शायद यही वजह है कि जब भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्जा को पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से प्यार हुआ तो उन्होंने उनकी गरीबी नहीं देखी। हालांकि ये भी हो सकता है कि मलिक ने सानिया और उनकी फैमिली को अपनी अमीरी दिखाने के लिए फिल्म कूली नंबर 1 वाले गोविंदा की तरह दूसरे किसी की प्रॉपर्टी को अपना बता दिया होगा और अब सानिया अपनी बेवकूफी सार्वजनिक न करना चाहती हों बहरहाल , वर्तमान में स्थिति यह है कि जितना पैसा सानिया को भारत के लिए टेनिस खेलने के मिलते हैं उसका 12वां हिस्सा उनके पति शोएब मलिक को पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड सैलरी के रूप में देती है। जी हां, सानिया मिर्जा की सालाना सैलरी 3 करोड है जबकि मलिक मात्र 26 लाख पाते हैं। सानिया जहां भारत की टॉप टेनिस प्लेयर हैं वहीं मलिक ग्रेड बी के प्लेयर हैं।  




जानिए भारतीय क्रिकेटरों की कितनी है कमाई

बीसीसीआई द्वारा जारी अनुबंध में बताया कि ग्रेड ए के खिलाडि़यों की मैच के जरिए 2 करोड़ रुपए प्रति वर्ष कमाई हो रही है। वहीं ग्रेड बी के खिलाड़ी मैच खेलकर 1 करोड़ प्रति वर्ष कमा रहे हैं। जबकि ग्रेड सी के खिलाड़ी 50 लाख प्रति वर्ष कमाई कर रहे हैं। इससे पहले यह राशि क्रमश: 1 करोड़, 50 लाख और 25 लाख रुपए थी।   

जानिए पाक क्रिकेटरों की कितनी है कमाई

वहीं पाकिस्‍तान के क्रिकेटरों की कमाई की बात करें तो सितंबर 2016 से अगस्‍त 2017 के बीच इनकी सैलरी पिछले साल से 10 फीसदी बढ़ी। इसके बावजूद कैटेगरी ए के खिलाडि़यों को प्रति टेस्‍ट मैच 4 लाख पाकिस्तानी रुपए मिलते हैं जबकि वनडे में 3 लाख और टी 20 में 1.25 लाख पाकिस्तानी रुपए की कमाई होती है। वहीं सालाना कमाई की बात करें तो ग्रेड ए के खिलाडि़यों की 60 लाख है। पाक प्लेयर्स की रकम अगर भारतीय रुपए में कन्वर्ट करें तो और कम हो जाता है। 

ग्रेड ए में कौन – कौन से भारतीय खिलाड़ी हैं शामिल

ग्रेड ए – विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी, आर अश्विन, अजिंक्‍य रहाणे, चेतेश्‍वर पुजारा, रविंद्र जडेजा, मुरली विजय शामिल हैं। यानी इन खिलाडि़यों की क्रिकेट खेलकर सालान कमाई 2 करोड़ है। यानी इन खिलाडि़यों की मंथली इनकम 17 लाख के करीब होती है।

ग्रेड ए में कौन – कौन से पाक खिलाड़ी हैं शामिल

कैटेगरी ए - मिस्‍बाह उल हक, यूनिस खान, मोहम्‍मद हफीज, अजहर अली, मोहम्‍मद आमिर, यासिर शाह शामिल हैं। क्रिकेट खेलकर इनकी सालाना कमाई 60 लाख है। यानी मंथली इनकम 5 लाख होती है।  

ग्रेड बी की कमाई के बारे में

पाक क्रिकेट की ग्रेड बी- अहमद शहजाद, असद शफीक, सोहैल खान, शोएब मलिक, बाबर आजम, सरफराज अहमद, वहाब रियाज, शामी असलम शामिल हैं। इन खिलाडि़यों की मासिक इनकम 345,000 होती है। यानी ये खिलाड़ी साल में 42 लाख तक की कमाई क्रिकेट खेलकर करते हैं।  

भारतीय क्रिकेट की ग्रेड बी–  रोहित शर्मा, केएल राहुल, भुवनेश्‍वर कुमार, मोहम्‍मद शमी, ईशांत शर्मा, उमेश यादव, रिधिमान साहा, जसप्रीत बुमराह और युवराज सिंह शामिल हैं। क्रिकेट खेलकर ये खिलाड़ी 1 करोड़ रुपए सालाना कमाई करते हैं । अगर मंथली इनकम में देखें तो यह 8 लाख 35 हजार तक की होती है।


ग्रेड सी के खिलाडि़यों का हाल

भारत के ग्रेड सी – शिखर धवन, अंबाति रायडू, अमित मिश्रा, मनीष पांडे, अक्षर पटेल, करूण नायर, हार्दिक पटेल , आशीष नेहरा, केदार जाधव, यजुवेंद्र चहल, पार्थिव पटेल, जयंत यादव, मनदीप सिंह , धवल कुलकर्णी, शर्दुल ठाकुर, रिषभ पंत शामिल हैं। इन खिलाडि़यों को बीसीसीआई से सालाना 50 लाख रुपए मिलते हैं। यानी ये खिलाड़ी क्रिकेट से 4 लाख 15 हजार रुपए हर महीने कमाई करते हैं।  

पाक के ग्रेड सी – अनवर अली, फवाद आलम, इमरान खान, हैरिस सोहेल, मोहम्‍मद रिजवान, मोहम्‍मद इरफान, शान मसूद, उमर अकमल शामिल हैं। इन खिलाडि़यों की 2 लाख के करीब मासिक कमाई होती है। इस लिहाज से सालाना कमाई देखें तो 24 लाख होती है।  


Tuesday, 21 March 2017

करोड़पति नहीं, लखपति हैं यूपी के नए सीएम योगी

यूपी के नए आदित्य नाथ योगी के बारे में आपने बहुत कुछ सुना होगा लेकिन आज हम उनके बारे में कुछ खास बात बताते हैं। आदित्यनाथ की पहचान फायरब्रांड नेता के रूप में रही है।  गोरखनाथ मंदिर के महंत वैद्यनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, जिसके बाद वे राजनीति में आए। साल 2014 में गोरखनाथ मंदिर के महंत अवैद्यनाथ की मौत के बाद वे यहां के महंत यानी पीठाधीश्वर चुन लिए गए। योगी आदित्यनाथ भाजपा के सांसद होने के साथ हिंदू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं।



कारों के हैं शौकीन
योगी आदित्‍यनाथ के बारे में बात करें तो शादीशदुा नहीं हैं। उनकी संपत्ति की बात करें तो उनके पास अपना घर और जमीन नहीं है। इसके बावजूद उन्हें कार रखने का शौक है। 2004 में योगी के पास एक क्वालिस, एक टाटा सफारी और एक मारुति एस्टीम कार थी। 2009 में उन्होंने अपनी कारें बदलीं। उन्होंने एस्टीम और क्वालिस को हटाकर अपने गैरेज में एक नई सफारी और एक  फोर्ड आइकॉन खरीदा।

72 लाख की संपत्ति
योगी आदित्‍यनाथ ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हलफनामे में 72 लाख की संपत्ति का एलान किया। इसमें 3 लाख की टाटा सफारी, 21 लाख की टोयोटा फॉर्च्यूनर और 12 लाख की इनोवा शामिल थी। दिलचस्‍प बात यह है कि 20 साल के पॉलिटिकल करियर होने के बावजूद वे आजतक करोड़पतियों की कैटेगरी में
नहीं आए हैं।

हथियार के हैं शौकीन
योगी आदित्‍यनाथ को हथियार रखने का शौक है। 2004 में उनके पास महज 30 हजार रुपए के हथियार थे। 2009 में उन्होंने पुराने हटाकर 1 लाख 80 हजार की नई रिवॉल्वर और राइफल खरीदीं। 2004 में योगी के पास कुल 9 लाख 60 हजार की संपत्ति थी। तब उनके पास एक 10 हजार रुपए की रिवॉल्वर और 20 हजार रुपए
की राइफल थी।

45 हजार की गोल्ड ज्वैलरी
2004 में जहां उनके पास एक अंगूठी तक नहीं थी, वहीं 2014 में उनके पास 45 हजार की गोल्ड ज्वैलरी थी। योगी अष्ट धातु के कुंडल और सोने की चेन पहनना पसंद करते हैं।

Monday, 20 March 2017

किसी प्रयोगशाला से कम नहीं रानी का फिल्‍मी कैरियर


बर्थड स्‍पेशल 

लड़की की आवाज में मधुरता के साथ – साथ एक अदब भी होनी जरूरी होती है लेकिन जब रानी मुखर्जी ने बॉलीवुड की दुनिया में कदम रखा तो लोगों ने उनकी आवाज को मर्द की आवाज करार दिया। लड़की के आवाज में भारीपान होना आलोचकों को भा नहीं रहा था। यही वजह थी कि मध्यम कद और सांवले रंग की रानी मुखर्जी ने बॉलीवुड में जब दस्तक दी, तो उनकी कद-काठी को देखकर हर किसी ने उन्हें हल्‍के में लिया। लेकिन रानी ने इसी को अपना हथियार बनाया और 1998 की फिल्म 'कुछ कुछ होता है'  में एक्‍टिंग के बल पर फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार जीतकर यह साबित कर दिया कि प्रतिभा का कोई कद या पैमाना नहीं होता। दरअसल, रानी मुखर्जी का फिल्‍मी कैरियर किसी सफल प्रयोगशाला से कम नहीं है। रानी ने फिल्‍मों और अपने किरदारों के साथ जितने प्रयोग किए उससे कहीं ज्‍यादा उनसे इंसाफ भी किया। बात चाहें फिल्‍म ब्‍लैक की दिव्‍यांग किरदार मिशेल मैकनैली की हो या फिर बंटी और बबली की चुलबुली बबली का किरदार हो। हर रोल में खुद को फिट किया और अपना लोहा मनवाया। यही वजह थी कि कुछ सालों में ही वह बॉलीवुड की रानी बन गईं। फिल्म 'ब्लैक' में रानी ने अभिनय प्रतिभा का शक्तिशाली सबूत दिया। जिसमें उन्होंने एक अंधी-बहरी लड़की का किरदार निभाया था। 



2004 के बाद बढ़ा रानी का कद

अगर देखा जाए तो रानी के लिए साल 2004 से फिल्मी कैरियर की सफल यात्रा शुरू हुई। रानी ने फिल्म 'युवा', 'हम-तुम' 'वीर जारा' ब्लैक, 'बंटी और बबली' 'कभी अलविदा न कहना' जैसी हिट फिल्में दीं। 2005 में रानी ने 50वें फिल्मफेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री दोनों ही पुरस्कार अपने नाम किए। एक ही साल में दोनों पुरस्कार जीतने वाली रानी पहली अभिनेत्री बनीं। वहीं 2005 में रानी के लिए तब सम्मा नित पल था जब उन्हेंर पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ भोजन का न्योता दिया गया था। रानी ने वर्ष 2006 में अन्य बॉलीवुड अभिनेत्रियों के साथ ऑस्ट्रेलिया के कॉमनवेल्थ खेलों में भारतीय परंपरा का प्रदर्शन किया। 2015 में रानी ब्रिटिश एशियन ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक चैरिटी डिनर में प्रिंस चार्ल्स के साथ शामिल हुई थीं।



Tuesday, 28 February 2017

ये डीयू है मेरी जान, यहां ‘अमृत मंथन’ होता है….

पिछले साल की बात है, जब जेएनयू विवाद सुर्खियों में था उसी दौरान मैं अपनी प्रेमिका के साथ मेट्रो में सफर कर रहा था। तभी प्रेमिका ने मुझसे पूछा ये जेएनयू में क्‍या हो रहा है?  यह पहली बार था जब हमने राजनीति मुद्दे पर गंभीरता से बात की थी। दरअसल, उससे राजनीति की बात तो करना चाहता हूं लेकिन वह‍ इसमें कम दिलचस्‍पी दिखाती है इसलिए मैं भी रिलेशनशिप को बोरिंग नहीं बनाना चाहता। बहरहाल, मुद्दे से भटकने से पहले उस सवाल के जवाब पर आते हैं। तब मैंने उसको बताया, ऐसे करम जेएनयू में ही होते हैं, डीयू इससे सुरक्षित है। जब मैंने यह जवाब दिया, तब‍ डीयू को लेकर मेरा भ्रम बोल रहा था। लेकिन वर्तमान दौर में अगर यही सवाल वह या कोई और मुझसे पूछ दे तो शायद मेरा जवाब कुछ और ही होगा।


दरअसल, डीयू की गलियों में मैंने 3 साल बिताए हैं। साउथ कैंपस से लेकर नॉर्थ कैंपस तक कई सेमिनार और डिबेट शो अटेंड किया हूं। अपने सम्‍मानित टीचर्स के साथ क्‍लासरूम में तर्कसंगत बातें भी की हैं। वो सारे अनुभव मुझे यह मानने पर मजबूर करते थे कि डीयू में टॉलरेंस है! वो अलग बात है कि मैं जिस कॉलेज से पढ़ा हूं उसी कॉलेज के एक शिक्षक नक्‍सलियों से सांठगांठ के कारण जेल की हवा खा चुके हैं। मुझे तब का माहौल भी याद है। उन्‍हें बचाने के लिए कई वरिष्‍ट वाम नेताओं और शिक्षकों ने सेमिनार भी किए। तब शायद कुछ लोगों के लिए कोई जहर नहीं अमृत फैला रहा था। तब क्‍लारूम से लेकर कॉलेज के सेमिनार हॉल तक में अमृत की बातें कहीं जा रही थीं । इस अमृत मंथन में पढा़कू छात्रों को भी जोड़ा जा रहा था। उस वक्‍त भी एबीवीपी ने इस अमृत मंथन का विरोध किया था। लेकिन तब किसी ने यह बोलने की हिम्‍मत नहीं की थी कि माहौल जहरीला हो रहा है। तब किसी सेलेब ने अपने विचार नहीं रखे थे। शायद यही वजह थी कि मेरे लिए सब फीलगुड लगता था क्‍योंकि सीवान जैसे छोटे शहर से निकल कर यहां आने के कारण मेरे लिए यह सबकुछ नया था। लेकिन हां अब उसी अमृत को बहने से मजबूती से रोका जा रहा है और उसे रोकने वाले जहरीले, मौत के सौदागर और खून के दलाल लोग हैं।


तब के माहौल में मैंने न तो किसी कन्‍हैया को गरीबी से आजादी की मांग करने के लिए देखा था और न ही किसी तृप्‍ति में मंदिर में प्रवेश करने की जिद देखी थी। तब न ही पटेलों का कोई मसीहा हार्दिक बना था, न ही कोई पिता की शहादत को मोहरा बनाने वाली गुर थी। दरअसल, मंथन से निकलने वाले अमृत का दौर 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही शुरू हुआ है। अब हर दिन नए मोहरे, नए शब्‍द भी गढ़े जा रहे हैं। ऐसे मोहरे गढ़ने वाले कारीगरों को एक्‍सपोज करने वाले अंधभक्‍त, मोदीभक्‍त के नाम से जाने जा रहे हैं। उसी की एक कड़ी थी रामजस कॉलेज की घटना। स्‍वाभाविक है रामजस कॉलेज में देश के टूकड़े करने वाले अगर सेमिनार करेंगे तो अमृत मंथन के ही टिप्‍स बताएंगे। उन्‍हें किसने मेहमान बनाया और किसने मेजाबनी की, वो भी कहीं न कहीं इसी के हिस्‍सा रहे होंगे। बहरहाल, मैं भी मोदीभक्‍त की सूची में शामिल हूं लेकिन इन सब के बीच जो भ्रम डीयू से मेरा टूटा है, उसके लिए एबीवीपी को धन्‍यवाद कहना चाहूंगा। अब मैं इसी बहाने प्रेमिका को बोल सकता हूं, यह ये डीयू है, यहां अमृत मंथन होता है….

Saturday, 28 January 2017

जेन्टल मैन से एक्सपेरिमेंटल मैन तक

अगर आपसे कोई सवाल पूछे - महेंद्र सिंह धोनी को किस लिए याद रखना चाहेंगेविकल्प हैं, 2011 विश्‍वकप में उस नेतृत्‍व के लिए जिसकी बदौलत 125 करोड़ की आबादी का सपना पूरा हुआ या उस प्रयोग के लिए जिसने पहले टी 20 विश्‍वकप के फाइनल में पाकिस्‍तान जैसी टीम के खिलाफ आखिरी ओवर औसत दर्जे के गेंदबाज जोगिंदर शर्मा से करवा डाला। या उस शख्सियत के लिए जिसने खुद को कभी टीम से उपर नहीं समझा। या फिर उस विवादों के लिए जिसके जरिए धोनी को फिक्सरसे लेकर स्‍वार्थीतक का तमगा मिल गया लेकिन वह मैदान से लेकर मैदान के बाहर तक हमेशा कुलही रहे। इन विकल्‍पों को सुनकर संभवत
आपका जवाब होगा : ऊपर दिए सभी।


जी हां, धोनी ने सिर्फ क्रिकेट खेला नहीं, जिया भी। 22 गज की पिच पर धोनी ने अपने खेल के जरिए दुनिया को वो सब कुछ दिखाया जिसके बारे में क्रिकेट के बड़े बड़े जानकार सोच नहीं सकते थे।  फिर चाहे वो 2011 वर्ल्ड कप फाइनल में खुद को युवराज से आगे बैटिंग करने का फैसला हो या फिर ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ बीच दौरे में ही संन्‍यास लेने का मामला हो। आमतौर पर कुर्सी छोड़ना आसान नहीं होता है, चाहें उसे कितनी ही फजीहत का सामना करना पड़ें।  बिरले ही होते हैं जो वक्त के पहले कुर्सी का मोह त्याग पाते हैं। ऐसे ही हैं धोनी जो अपने फैसलों से सभी को आश्चर्य चकित कर देते हैं। ऐसे फैसल कर धोनी एंज्‍वॉय भी करते हैं। श्रीलंका दौरे की बात
हैदौरे पर जाने से पहले धोनी मीडिया से मुखातिब हो रहे थे। तभी एक पत्रकार ने सवाल पूछ लिया, आप इतने अटपटे फैसले क्‍यों लेते हैं? इस पर माही ने मुस्‍कुराते हुए अपने ही अंदाज में जवाब दिया । उन्‍होंने कहा, इसलिए अटपटे प्रयोग करता हूं ताकि आप लोगों के पूर्वानुमान झूठे साबित हो सकें। यह काफी हद तक सच भी है। दरअसल, धोनी की कप्तानी में शायद वो कुछ भी नहीं था जो आमतौर पर क्रिकेट कप्‍तानों के टेक्स्ट बुक में होता है। अकसर टीम के कप्‍तान की छवि में गुस्‍सा , दबाव और एटीट्यूड देखने को मिलता हैं लेकिन बतौर कप्‍तान धोनी इसके बिल्‍कुल विपरीत थे। धोनी का गुस्‍सा और एटीट्यूड बिरले ही देखने को मिलता था, दबाव तो शायद ही किसी ने देखी हो। दबाव में तो धोनी और निखर जाते थे। ऐसे माहौल में लगता था जैसे उन्‍हें स्‍ट्रेटजी की पोटली हाथ लग गई हो। न जाने कितनी बार धोनी ने लोगों की रूकी हुई सांसों को आखिरी ओवर में जश्‍न में बदल दिया है, ये आंकड़े गिनने वालों को भी शायद याद न हो।

   धोनी की यही कला, उन्‍हें अन्य खिलाड़ियों से अलग बनाती है।  धोनी का खेल जिनता गहरा है कद भी उतना ही बड़ा है। किसी खिलाड़ी के लिए इससे बड़ी तारीफ क्या हो सकती है जो लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर ने की उन्होंने कहां यदि धोनी खिलाड़ी के रुप में संन्यास ले लेता तो ,मैं उसके घर के सामने धरने पर बैठ जाता मैं तब तक नहीं उठता जब तक वह खेलने के लिए सहमत नहीं होता। 

Thursday, 5 January 2017

ये लड़की नहीं, मांस का लोथड़ा है

कहने को बहुत कुछ है, कहते भी बहुत कुछ हैं। हम बहुत बड़े ज्ञानी हैं, हमें हर मुद्दों की थोड़ी बहुत समझ है। हर मुद्दों की तरह महिला सशक्तिकरण पर भी बहुत कुछ लिख और बोल सकता हूं । निर्भया पर भी बहुत कुछ बोल चुका हूं तो बंगलूरू में लड़कियों के साथ जो हुआ उस पर चुप रहकर क्‍या करूंगा। हां, वो अलग बात है कि किसी लड़की को देख लिया तो मेरी हवस की नजरें टूट पड़ेंगी। और मौका मिला तो बाइक से उतरकर जबरदस्‍ती राह चलती लड़की को किस कर लूंगा। आखिर लड़कियां ही तो मेरे अंदर पनपने वाली आग में घी डालती हैं। इन्‍हें किसने अधिकार दिया है शॉट कपड़े पहनने का? इन्‍हें किसने अधिकार दिया है अकेली घूमने का ? इन्‍हें किसने अधिकार दिया है मेरे प्‍यार को न समझ पाने का ? अगर वह इन्‍हें अधिकार मानती हैं तो मेरा भी अधिकार है उनको अपनी मर्दानगी दिखाने का क्‍योंकि हमारी नजर में वो लड़की नहीं, मांस का लोथड़ा है। हम कैसे समाज में जी रहे हैं, हम कहां जा रहे हैं, हम क्‍यों जा रहे हैं। इन बातों को लेकर अब मंथन भी करने की हिम्‍मत नहीं होती। सरकारें और पुलिस प्रशासन का क्‍या दोष दें। हम उनसे उम्‍मीद भी अगर कर रहे हैं तो खुद को बेवकूफों की कतार में खड़ा कर रहे हैं। बस इतना जानता हूं कि ह‍म ऐसे समाज का गवाह बन रहे हैं जहां दरिंदगी के हर दिन नए रिकॉर्ड बन रहे हैं और जो देख रहे हैं उनमें खामोशी की परत और गाढ़ी होती जा रही है । वर्ना किसी लड़की को कोई बाइक सवार जबरन किस कर जाता है और जिंदा रह जाता है। हैरान हूं, इस दरिंदगी के बावजूद मैं इस सभ्‍य सोसाइटी का गवाह हूं। हैरान हूं, उन लोगों पर जो किसी न किसी तरह इस दरिंदगी के साथ हैं। उनमें शायद मेरे साथी भी हैं। लड़कियों को ही अब समझने की जरूरत है कि उसके ना का मतलब ना है, यह हमारी समझ में नहीं आता है। ऐसे डायलॉग हम सिर्फ फिल्‍मों में ही पसंद कर सकते हैं। या फिर दो - चार महिला सशक्ति के उदाहरण गिना कर संतोषक कर लेते हैं। लेकिन सच यह है कि हमारी नजरों में अगर लड़की ना बोलती है तो इसका सीधा मतलब रेप, गैंगरेप, एसिड अटैक से हो जाता है। कम से कम इस मामले में मैं खुद पर गर्व कर सकता हूं। क्‍योंकि मुझे इस ना की समझ है और प्रेमिका को भी मांस का लोथड़ा नहीं समझता हूं।  ऐसा नहीं है कि मुझे किसी के लिए मिसाल बनना है और न ही खुद की तारीफ में यकीन करना है। लेकिन हां, इसके जरिए किसी के दिमाग की शुि‍द्ध होती है तो उसका स्‍वागत करता हूं।

बंगलूरू की घटना का लिंक , देख लीजिए हैवानियत के इस नए नमूने को